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चैटजीपीटी के ख़िलाफ़ क्यों हैं भारत के बड़े मीडिया संस्थान? 

पिछले साल नवंबर में भारतीय न्यूज़ एजेंसी एशियन न्यूज़ इंटरनेशनल (एएनआई) ने ओपन एआई के ख़िलाफ़ एक मुक़दमा दायर किया था। ओपन एआई अमेरिकी स्टार्टअप है जिसने चैटजीपीटी बनाया है। एएनआई का आरोप है कि चैटजीपीटी ने उसके कॉपीराइट वाले कंटेंट को बिना इजाज़त इस्तेमाल किया है। अब इस मुक़दमे से ‘इंडियन एक्सप्रेस’, ‘द हिंदू’, ‘इंडिया टुडे’ और गौतम अदानी के स्वामित्व वाले एनडीटीवी समेत 10 से ज़्यादा सबसे पुराने भारतीय मीडिया प्रतिष्ठान जुड़ना चाहते हैं। 

ये मीडिया हाउस चैटजीपीटी और अन्य आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित तकनीकों के खिलाफ आलोचना कर रहे हैं। आखिर इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं? इसे इन बिंदुओं के ज़रिये समझा जा सकता है। 

मानव श्रम का प्रतिस्थापन: एक बड़ा कारण यह है कि AI आधारित टूल्स, जैसे चैटजीपीटी, पत्रकारिता और कंटेंट निर्माण के क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहे हैं। मीडिया संस्थान इस बात को लेकर चिंतित हैं कि इन तकनीकों के विकास से पत्रकारों और लेखक जैसी मानव श्रम की आवश्यकता कम हो सकती है। इसका मतलब है कि कई श्रमिकों को अपनी नौकरियां खोने का डर है, जो मीडिया उद्योग में पहले से ही आर्थिक दबाव और सख्त प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहे हैं।

सूचना की विश्वसनीयता और गुणवत्ता: चैटजीपीटी जैसे AI मॉडल से उत्पन्न सामग्री में कभी-कभी गलत या अधूरी जानकारी हो सकती है। इससे तथ्यात्मक सटीकता और समाचार की गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं। मीडिया संस्थान, जो अपने दर्शकों को सटीक और विश्वसनीय जानकारी प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, इस बात से चिंतित हो सकते हैं कि AI आधारित उपकरणों से उत्पन्न जानकारी की गुणवत्ता पर नियंत्रण बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।

नैतिकता और जिम्मेदारी: AI द्वारा जनरेट की गई सामग्री के बारे में नैतिक सवाल भी उठते हैं। उदाहरण के लिए, अगर चैटजीपीटी किसी संवेदनशील मुद्दे या विवादित विषय पर गलत जानकारी प्रदान करता है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? मीडिया संस्थान अपने दर्शकों की रक्षा करने और समाज में जिम्मेदारी से खबर फैलाने के प्रति प्रतिबद्ध रहते हैं, और AI की भूमिका को लेकर कई बार यह चिंता जताई जाती है कि इसे कैसे सही ढंग से नियंत्रित किया जाए।

प्रतिस्पर्धा और विज्ञापन राजस्व: जब AI द्वारा निर्मित कंटेंट का इस्तेमाल बढ़ता है, तो यह पारंपरिक मीडिया कंपनियों के लिए विज्ञापन राजस्व में प्रतिस्पर्धा पैदा कर सकता है। खासकर, अगर AI आधारित टूल्स से सस्ते या मुफ्त में सामग्री उत्पन्न की जा सकती है, तो इससे मीडिया संस्थानों को आर्थिक नुकसान हो सकता है।

विकसित देशों की टेक्नोलॉजी पर निर्भरता: चैटजीपीटी जैसी AI तकनीकें ज्यादातर विकसित देशों (विशेष रूप से अमेरिका) द्वारा विकसित की जा रही हैं। भारत जैसे देशों में यह चिंता हो सकती है कि वे इन तकनीकों पर अत्यधिक निर्भर हो जाएंगे, और उनकी स्वतंत्रता या स्वायत्तता पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा, कई बार यह भी आरोप लगाया जाता है कि इन तकनीकों में पश्चिमी दृष्टिकोण और पूर्वाग्रह हो सकते हैं, जो भारत जैसे विविध और बहुसांस्कृतिक समाज के लिए उपयुक्त नहीं हो सकते।

इन कारणों से कुछ भारतीय मीडिया संस्थान चैटजीपीटी जैसी तकनीकों को लेकर सतर्क हैं, लेकिन यह ध्यान देने योग्य है कि कुछ मीडिया संस्थान इन तकनीकों को अपनी कार्यप्रणाली में सुधार के लिए भी अपना रहे हैं, जैसे कि कंटेंट जनरेशन, ट्रेंड्स को समझने और पाठकों से जुड़ने के नए तरीके।

 

 

Asmita Sarkar

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