
पत्रकारिता को लंबे समय तक ‘मैदान का पेशा’ माना जाता रहा है, जहाँ सीख सबसे ज़्यादा रिपोर्टिंग के दौरान होती थी। लेकिन बीते कुछ वर्षों में पत्रकारिता की पढ़ाई और ज़मीनी रिपोर्टिंग के बीच एक साफ़ दूरी दिखाई देने लगी है। विश्वविद्यालयों और मीडिया संस्थानों में पढ़ाए जा रहे पाठ्यक्रम अक्सर कक्षा तक सीमित रह जाते हैं, जबकि फील्ड जर्नलिज़्म की वास्तविकताएँ इससे कहीं अलग और चुनौतीपूर्ण हैं।
आज देश में पत्रकारिता और मास कम्युनिकेशन के सैकड़ों कोर्स चल रहे हैं। इनमें मीडिया थ्योरी, कम्युनिकेशन मॉडल, इंटरनेशनल मीडिया स्टडीज़ और डिजिटल टूल्स पर ज़ोर दिया जाता है। यह पढ़ाई ज़रूरी है, लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब छात्र न्यूज़रूम या फील्ड में उतरते हैं। ज़मीनी रिपोर्टिंग में उन्हें प्रशासन से संवाद, स्थानीय मुद्दों की समझ, स्रोतों के साथ भरोसे का रिश्ता और जोखिम भरे हालात में काम करने की समझ चाहिए होती है, जिसकी तैयारी कक्षा में बहुत सीमित रूप में हो पाती है।
क्लासरूम आधारित शिक्षा में अक्सर आदर्श परिस्थितियों की बात होती है, जबकि ज़मीनी पत्रकारिता समझौतों, दबावों और संसाधनों की कमी के बीच चलती है। ग्रामीण इलाकों की रिपोर्टिंग, पुलिस और प्रशासन से सूचनाएँ निकालना, या सामाजिक-सांप्रदायिक संवेदनशीलता वाले मुद्दों पर काम करना—ये सब अनुभव किताबों से नहीं, बल्कि मैदान से आते हैं। कई नए पत्रकार मानते हैं कि डिग्री लेने के बाद भी उन्हें रिपोर्टिंग की बुनियादी समझ न्यूज़रूम में जाकर ही मिली।
इस दूरी की एक वजह मीडिया संस्थानों की बदलती प्राथमिकताएँ भी हैं। डिजिटल मीडिया और 24×7 न्यूज़ साइकिल के दौर में संस्थान ऐसे पत्रकार चाहते हैं जो तुरंत कंटेंट दे सकें। ऐसे में प्रशिक्षण पर समय और संसाधन खर्च करने की परंपरा कमजोर हुई है। नतीजा यह है कि मीडिया संस्थान भी तैयार रिपोर्टर की उम्मीद करते हैं, जबकि शिक्षण संस्थान व्यावहारिक प्रशिक्षण की जिम्मेदारी पूरी तरह नहीं उठा पा रहे। इंटर्नशिप व्यवस्था इस खाई को पाट सकती थी, लेकिन व्यवहार में यह अक्सर औपचारिकता बनकर रह जाती है। कई जगह इंटर्न को सिर्फ़ डेस्क का काम या बिना क्रेडिट के फील्ड असाइनमेंट दिए जाते हैं। सीखने और मार्गदर्शन की जगह श्रम का सस्ता विकल्प बनने का आरोप भी लगते रहे हैं। इससे छात्रों में हताशा बढ़ती है और पेशे के प्रति मोहभंग भी।
वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि पत्रकारिता की पढ़ाई तब सार्थक होगी, जब कक्षा और मैदान के बीच संतुलन बने। पाठ्यक्रम में स्थानीय स्तर की रिपोर्टिंग, लंबे समय तक फील्ड अटैचमेंट और अनुभवी पत्रकारों की नियमित भागीदारी ज़रूरी है। साथ ही, मीडिया संस्थानों को भी नए पत्रकारों के प्रशिक्षण को निवेश की तरह देखना होगा, न कि बोझ की तरह।
कुल मिलाकर, पत्रकारिता की पढ़ाई और ज़मीनी रिपोर्टिंग के बीच बढ़ती दूरी सिर्फ़ शिक्षा का मुद्दा नहीं है, बल्कि मीडिया की विश्वसनीयता और भविष्य से जुड़ा सवाल है। अगर इस अंतर को समय रहते नहीं पाटा गया, तो पत्रकारिता की डिग्री और पत्रकार बनने की प्रक्रिया के बीच का फासला और गहरा होता जाएगा।




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