
दुनिया भर में आज आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल लर्निंग की तेज़ रफ्तार दिख रही है। कई देश स्कूल स्तर पर भी AI और तकनीक को तेजी से अपना रहे हैं। चीन जैसे देशों में बच्चों को शुरुआती कक्षाओं से ही AI की शिक्षा दी जा रही है। ऐसे समय में एक यूरोपीय देश ने ठीक उलटा कदम उठाकर वैश्विक बहस छेड़ दी है।
यह देश है Sweden, जहां स्कूलों में एक बार फिर किताबें लौट रही हैं और डिजिटल एजुकेशन मॉडल की समीक्षा की जा रही है।
डिजिटल एजुकेशन से वापसी की वजह
स्वीडन अपने उच्च शिक्षा मानकों के लिए जाना जाता है और 2009 से यहां स्कूलों में बड़े पैमाने पर डिजिटल लर्निंग लागू की गई थी। टैबलेट, स्मार्ट क्लासरूम और कंप्यूटर के जरिए बच्चों को पढ़ाना आधुनिक और उपयोगी माना गया।
लेकिन लगभग 15 साल बाद सरकार को महसूस हुआ कि यह प्रयोग बच्चों के सीखने की क्षमता पर अनचाहा बोझ डाल रहा है।
रिसर्च में सामने आया कि लगातार स्क्रीन पर पढ़ने से आंखों पर तनाव बढ़ रहा है और बच्चों का ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम हो रही है। तेज रोशनी वाली स्क्रीन ने याद रखने और समझने की दक्षता पर भी नकारात्मक असर डाला।
कई शिक्षक और अभिभावक इस बात से परेशान थे कि डिजिटल डिवाइस पढ़ाई से ज्यादा ध्यान भटकाने वाले बन गए थे। कक्षाओं में छात्र गेम खेलने और इंटरनेट पर समय बिताने लगे, जिससे उनकी स्कूली परफॉर्मेंस और सामाजिक कौशल दोनों प्रभावित होने लगे।
सरकार ने मानी गलती, अब लौट रही हैं किताबें
स्वीडिश अधिकारियों ने स्वीकार किया कि डिजिटल शिक्षा को तेजी से अपनाते समय दीर्घकालिक प्रभावों पर उतना ध्यान नहीं दिया गया।
स्थिति को सुधारने के लिए सरकार ने 104 अरब यूरो यानी लगभग 1100 करोड़ रुपये खर्च कर स्कूलों में फिर से किताबें उपलब्ध करानी शुरू कर दी हैं।
उद्देश्य यह है कि हर बच्चा किताब से पढ़ सके और स्क्रीन निर्भरता से दूरी बना सके। सरकार का मानना है कि किताबें न केवल एकाग्रता बढ़ाती हैं बल्कि पढ़ने-लिखने की बुनियादी स्किल को भी मजबूत बनाती हैं।
शैक्षणिक अधिकारियों के अनुसार, पिछले वर्षों में बच्चों में रीडिंग और राइटिंग स्किल का गिरना चिंता का विषय बन गया था। विशेषज्ञों ने बताया कि शुरुआती उम्र से ही टैबलेट और स्क्रीन पर निर्भरता ने स्किल डेवलपमेंट पर असर डाला।
डिजिटल बंद नहीं, लेकिन ‘संतुलन’ पर जोर
स्वीडन ने डिजिटल उपकरणों को पूरी तरह बंद नहीं किया है। सरकार का कहना है कि स्क्रीन का इस्तेमाल तभी होगा, जब उसकी वास्तविक जरूरत हो।
क्लासरूम में डिजिटल टूल्स का प्रयोग अब अधिक संतुलित, नियंत्रित और शिक्षण उद्देश्यों के अनुरूप किया जाएगा, ताकि तकनीक पढ़ाई में मदद करे, बाधा नहीं बने।
जब पूरी दुनिया शिक्षा के डिजिटलीकरण की ओर बढ़ रही है, स्वीडन का यह कदम एक महत्वपूर्ण संकेत देता है—तकनीक जरूरी है, लेकिन उसका संतुलित उपयोग उससे भी ज्यादा जरूरी।
किताबों की वापसी दिखाती है कि सीखने की मूल प्रक्रिया में अभी भी पारंपरिक साधन अधिक प्रभावी साबित हो सकते हैं।
स्वीडन के इस फैसले ने कई देशों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या डिजिटल एजुकेशन की दौड़ में कहीं बच्चों की मूल सीखने की क्षमता प्रभावित तो नहीं हो रही।




Add comment