Edinbox Hindi

साहित्य के करीब रहकर ही बेहतर होगा भारतीय सिनेमा

गोवा में आयोजित 55वें भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का 28 नवंबर को समापन हो गया। नौ दिवसीय इस आयोजन में भारतीय फिल्म उद्योग के भविष्य और इसके विकास पर सार्थक चर्चा हुई। इस अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (IFFI) का मुख्य विषय ही था ‘युवा फिल्म निर्माता: भविष्य अभी है।’ इस दौरान निर्माता-निर्देशक मणिरत्नम ने भी सिनेमा को बेहतर बनाने से जुड़ी कुछ बातें साझा कीं। उन्होंने कहा कि साहित्य के करीब रहकर ही सिनेमा बेहतर बनेगा। 

दरअसल, 55वें भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) में ‘साहित्यिक कृतियों को आकर्षक फिल्मों में बदलना’ विषय पर एक मास्टरक्लास हुई। इसमें मणिरत्नम भी शामिल रहे। यहां निर्देशक गौतम वी. मेनन के साथ बातचीत के दौरान मणिरत्नम ने साहित्य को सिनेमा में ढालने की कला पर चर्चा की। इस बारे में उन्होंने फिल्म निर्माताओं और सिनेमा देखने वालों को एक कीमती सलाह दी। 

मणिरत्नम ने कहा, “मेरा मानना है कि सिनेमा और साहित्य के बीच का ग्राफ जितना करीब होगा, भारतीय सिनेमा उतना ही बेहतर होगा।’ साथ ही मणिरत्नम में इस बात पर भी जोर दिया कि फिल्म निर्माताओं को लिखे हुए शब्दों को आकर्षक दृश्य और कहानियों में बदलने की कला को निखारना चाहिए।

मणिरत्नम ने साहित्य को फिल्मों में ढालने की बारीकियों पर चर्चा करते हुए कहा, ‘फिल्में एक दृश्य माध्यम हैं, जबकि किताबें मुख्य रूप से कल्पनाशील होती हैं। एक फिल्म निर्माता को पाठक की कल्पना को जीवंत करने में अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।’  मणिरत्नम ने यह भी कहा कि स्क्रिप्ट में समायोजन की जरूरत हो सकती है, लेकिन इन बदलावों से कहानी का सार बदलने के बजाय कहानी को बेहतर बनना चाहिए।
 
मणिरत्नम ने बातचीत में यह भी बताया कि वह पौराणिक कथाओं और प्राचीन भारतीय इतिहास से प्रभावित हैं। इन चीजों ने उनके दृष्टिकोण को बहुत प्रभावित किया है। ऐसा होने पर उन्हें अपनी फिल्म के पात्रों को अनोखे तरीके से दिखाने में कामयाबी मिली। मणिरत्नम की फिल्म ‘पोन्नियिन सेल्वन’ उनका ऐसा ही एक बेहतरीन प्रयास रहा। इस फिल्म में वह चोल राजवंश की कहानी को शानदार तरीके से दिखाने में कामयाब रहे। बता दें कि  ‘पोन्नियिन सेल्वन’ कल्कि कृष्णमूर्ति के 1955 के उपन्यास  पर आधारित दो भागों में बनी फिल्म है। 

साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है, ठीक उसी तरह सिनेमा भी समाज का प्रतिबिम्ब है। अगर सिनेमा साहित्य के साथ जुगलबंदी करता है तो न सिर्फ सिनेमा का बेहतर विकास हो सकता है बल्कि समाज भी परिपूर्णता की ओर अग्रसर होगा।  

 

Asmita Sarkar

Add comment

Recent posts

Most popular

Most discussed