
बढ़ती ट्यूशन फीस, जीवन-यापन की बढ़ती लागत, सख्त होते वीजा नियम और पढ़ाई के बाद करियर अवसरों को लेकर बढ़ती अनिश्चितता भारतीय छात्रों के विदेश में शिक्षा हासिल करने के फैसलों को तेजी से प्रभावित कर रही है। ऐसे माहौल में निवेश पर मिलने वाला लाभ (Return on Investment-ROI) छात्रों के लिए सबसे महत्वपूर्ण निर्णयकारी कारकों में से एक बनकर उभरा है।
IDP Education की नवीनतम ‘Emerging Futures’ रिपोर्ट के अनुसार, विदेश में पढ़ाई पर विचार कर रहे भारतीय छात्रों के लिए करियर परिणाम सबसे महत्वपूर्ण मानदंड हैं। रिपोर्ट में पाया गया कि 41 प्रतिशत छात्र शिक्षण गुणवत्ता और उद्योग से जुड़े कौशलों की तुलना में पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार मिलने की संभावना को अधिक महत्व देते हैं।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि विदेश में पढ़ाई का विचार छोड़ने वाले 43 प्रतिशत छात्रों ने ऊंची ट्यूशन फीस को सबसे बड़ी बाधा बताया। वहीं 32 प्रतिशत छात्रों ने बढ़ते रहने-खाने के खर्चों को कारण माना, जबकि 28 प्रतिशत ने वीजा से जुड़ी चुनौतियों का उल्लेख किया।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन चुनौतियों के बावजूद वैश्विक शिक्षा की मांग खत्म नहीं हो रही है, बल्कि छात्रों के फैसले लेने का तरीका तेजी से बदल रहा है।
अब देश नहीं, करियर परिणाम तय कर रहे फैसले
Career Mosaic की संयुक्त प्रबंध निदेशक मनीषा ज़वेरी का कहना है कि आज अंतरराष्ट्रीय शिक्षा से जुड़े निर्णय गंतव्य देश की लोकप्रियता के बजाय करियर परिणामों के आधार पर लिए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा, “आज के छात्र किसी देश या संस्थान का चयन करने से पहले रोजगार की संभावनाओं, पढ़ाई के बाद काम करने के अवसरों, संभावित वेतन और निवेश की भरपाई में लगने वाले समय जैसे सवालों पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं।”
ज़वेरी के अनुसार, पढ़ाई की लागत और वीजा प्रक्रिया की स्पष्टता अब सबसे महत्वपूर्ण निर्णय कारक बन गए हैं। इसका असर यह हुआ है कि विदेश में पढ़ाई की मांग घटने के बजाय विभिन्न देशों के बीच पुनर्वितरित हो रही है। आर्थिक रूप से सक्षम छात्र अभी भी महंगे और लोकप्रिय गंतव्यों को चुन रहे हैं, जबकि मध्यम आय वर्ग के छात्र अधिक चयनात्मक हो गए हैं और करियर परिणामों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि बढ़ती आर्थिक और आवागमन संबंधी बाधाएं मध्यम वर्ग के छात्रों की पहुंच को सीमित करती हैं, तो अंतरराष्ट्रीय शिक्षा का लाभ केवल पहले से विशेष सुविधाएं प्राप्त समूहों तक सीमित हो सकता है।
ज़वेरी ने कहा, “ऐसी स्थिति में विचारों की विविधता कम हो सकती है, सामाजिक गतिशीलता प्रभावित हो सकती है और भविष्य में नियोक्ताओं के लिए वैश्विक अनुभव रखने वाली प्रतिभाओं का दायरा भी सीमित हो सकता है।”
डिग्री से ज्यादा महत्वपूर्ण बन रहे कौशल
छात्रों की बदलती सोच का असर भर्ती प्रक्रियाओं में भी दिखाई दे रहा है। ज़वेरी के अनुसार, कंपनियां अब केवल विदेशी डिग्री को रोजगार क्षमता का संकेत नहीं मान रहीं, बल्कि उम्मीदवारों की वास्तविक क्षमताओं, इंटर्नशिप अनुभव, प्रोजेक्ट-आधारित सीखने और व्यावहारिक कौशलों को अधिक महत्व दे रही हैं।
उन्होंने कहा, “रोजगार बाजार तेजी से परिणाम-आधारित भर्ती मॉडल की ओर बढ़ रहा है, जहां रोजगार योग्य कौशल और वास्तविक कार्य अनुभव कई मामलों में अंतरराष्ट्रीय डिग्री जितने या उससे भी अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं।”
Xpheno के सह-संस्थापक कमल करंथ भी इस राय से सहमत हैं। उनका कहना है कि विदेश में शिक्षा से जुड़े फैसलों का मूल्यांकन अब दीर्घकालिक करियर अवसरों और इमिग्रेशन स्थिरता के आधार पर किया जा रहा है।
उन्होंने कहा, “छात्र और उनके अभिभावक अब विदेशी शिक्षा को वैश्विक करियर बनाने के प्रवेश द्वार के रूप में देखते हैं और पढ़ाई के बाद रोजगार तथा इमिग्रेशन संभावनाओं का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करते हैं।”
हालांकि अमेरिका अभी भी भारतीय छात्रों की पसंदीदा मंजिल बना हुआ है, लेकिन बदलती वीजा नीतियों और रोजगार संबंधी अनिश्चितताओं ने छात्रों को निवेश पर मिलने वाले लाभ को लेकर अधिक सतर्क बना दिया है।
इसी कारण कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, यूनाइटेड किंगडम और फ्रांस जैसे देशों की ओर छात्रों का आकर्षण बढ़ रहा है, क्योंकि वहां अपेक्षाकृत स्थिर इमिग्रेशन रास्ते और पढ़ाई के बाद काम करने के स्पष्ट अवसर उपलब्ध हैं।
GCC के बढ़ते विस्तार से बदल रहा टैलेंट का समीकरण
जहां कुछ लोग विदेश में पढ़ाई के लिए जाने वाले छात्रों की संख्या में संभावित कमी को प्रतिभा संकट के रूप में देखते हैं, वहीं करंथ का मानना है कि भारतीय कंपनियां बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल रही हैं।
उन्होंने भारत में तेजी से बढ़ रहे Global Capability Centres (GCCs) को इस बदलाव का बड़ा कारण बताया। उनके अनुसार, वैश्विक कंपनियां भारत में अपने परिचालन केंद्र स्थापित कर रही हैं, जिससे पेशेवरों को देश में रहते हुए ही अंतरराष्ट्रीय कार्य संस्कृति और वैश्विक परियोजनाओं का अनुभव मिल रहा है।
करंथ ने कहा, “अब पेशेवरों को अंतरराष्ट्रीय स्तर का अनुभव हासिल करने के लिए हमेशा विदेश जाने की आवश्यकता नहीं है। वे भारत में मौजूद वैश्विक केंद्रों के माध्यम से भी ऐसा अनुभव प्राप्त कर सकते हैं।”
Xpheno की Active Tech Jobs Outlook रिपोर्ट के अनुसार, भारत में GCCs की भूमिका लगातार बढ़ रही है। रिपोर्ट में बताया गया कि कुल तकनीकी भर्ती में नरमी के बावजूद GCCs की ओर से सक्रिय तकनीकी भर्ती मांग में सालाना आधार पर 31 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
उनके मुताबिक, कंपनियां अब ऐसे भर्ती मॉडल अपना रही हैं जो पारंपरिक डिग्रियों के बजाय उद्योग-तैयार कौशलों और दक्षताओं को प्राथमिकता देते हैं।
अंतरराष्ट्रीय शिक्षा का भविष्य कैसा होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय शिक्षा का अगला दौर रोजगार क्षमता, लचीलापन और विशेषीकृत कौशलों पर केंद्रित होगा।
ज़वेरी का कहना है कि आने वाले समय में छात्र ऐसे संस्थानों को प्राथमिकता देंगे जो स्पष्ट रूप से बेहतर करियर परिणाम, उद्योगों से जुड़ाव, किफायती शिक्षा और दीर्घकालिक प्रासंगिकता साबित कर सकें।
वहीं, करंथ का अनुमान है कि भविष्य में छात्रों का रुझान सामान्य स्नातकोत्तर कार्यक्रमों की बजाय ऐसे विशेष पाठ्यक्रमों की ओर बढ़ेगा जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित अर्थव्यवस्था की नई जरूरतों के अनुरूप हों।
उन्होंने कहा, “भविष्य में पेशेवर स्थायी रूप से बसने के उद्देश्य से विदेश नहीं जाएंगे, बल्कि विशेष कौशल हासिल करने के लिए अल्पकालिक और अत्यधिक विशेषज्ञता वाले कार्यक्रमों में भाग लेकर वापस भारत लौटेंगे, ताकि यहां उपलब्ध उच्च मूल्य वाले अवसरों का लाभ उठा सकें।”
जैसे-जैसे ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस दुनिया भर में शुरुआती स्तर की नौकरियों को बदल रहे हैं, विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय शिक्षा का भविष्य अब केवल प्रतिष्ठित संस्थानों की डिग्री पर नहीं, बल्कि करियर परिणामों, कार्यबल के लिए तैयार कौशलों और वास्तविक क्षमताओं पर निर्भर करेगा।




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