
पारुल यूनिवर्सिटी ने एक बार फिर अपनी शोध क्षमता साबित की है। इस बार विश्वविद्यालय ने घाव भरने (Wound Healing) के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज की है। संस्थान ने पंचवल्कल से समृद्ध बायोइंजीनियर्ड ड्रेसिंग पर आधारित एक नवोन्मेषी शोध परियोजना शुरू की है, जिसे व्यापक सराहना मिल रही है। यह प्रोजेक्ट Gujarat State Biotechnology Mission (GSBTM) द्वारा स्वीकृत 29,88,570 रुपये के अनुदान से संचालित होगा। इसका उद्देश्य लिक्विड बैंडेज, हाइड्रोजेल, ट्यूल ड्रेसिंग और नैनोफाइबर स्कैफोल्ड टेक्नोलॉजी का उपयोग करते हुए अधिक प्रभावी और प्राकृतिक घाव की देखभाल समाधान विकसित करना है।
इस शोध का नेतृत्व डॉ. अनिथा एच. करेंगी। उनके साथ डॉ. अंजलि गम्भावा, डॉ. मैत्री सचिनवाला और डॉ. बीजल प्रजापति सह-अन्वेषक के रूप में जुड़ी हैं। टीम आयुर्वेद की प्राकृतिक औषधियों को आधुनिक बायोइंजीनियरिंग तकनीकों के साथ मिलाकर मरीजों के घाव भरने की प्रक्रिया को तेज और बेहतर बनाने पर काम कर रही है। इस बायोइंजीनियर्ड पद्धति का मूल आधार पारंपरिक आयुर्वेदिक पॉली-हर्बल फॉर्मूलेशन पंचवल्कल है, जो घाव भरने और एंटीमाइक्रोबियल गुणों के लिए जाना जाता है।
परियोजना में आधुनिक ड्रेसिंग तकनीकों का पंचवल्कल अर्क के साथ संयोजन कर उसका प्रभाव जांचा जा रहा है। शोध दल का लक्ष्य है कि पंचवल्कल की सफाई, शांतकारी और संक्रमण-रोधी विशेषताओं का उपयोग नैनोफाइबर स्कैफोल्ड और हाइड्रोजेल जैसे नए डिलीवरी प्लेटफॉर्म में किया जाए। यह नवाचार घाव उपचार क्षेत्र में बड़ी क्रांति ला सकता है, क्योंकि इससे उपचार क्षमता बढ़ेगी और ऊतकों के पुनर्जनन की प्रक्रिया तेज होगी।
GSBTM द्वारा प्रदान की गई फंडिंग इस बात की पुष्टि करती है कि यह प्रोजेक्ट पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक बायोमेडिकल इंजीनियरिंग के बीच अंतर को कम करने की बड़ी क्षमता रखता है। यह वैश्विक प्रवृत्ति के भी अनुरूप है, जहां प्राकृतिक, लेकिन वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित उपचारों पर अधिक जोर दिया जा रहा है।
पारुल यूनिवर्सिटी ने पूरे शोध दल की सराहना की है और कहा है कि यह नवाचार विज्ञान की सीमाओं को आगे बढ़ाएगा तथा एक प्रभावी वाउंड मैनेजमेंट (wound management) समाधान विकसित कर स्वास्थ्य सेवाओं और मरीजों के उपचार अनुभव में सुधार लाएगा।




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