
दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) के सदस्य देशों की संसदों की मंजूरी से वर्ष 2010 में स्थापित साउथ एशियन यूनिवर्सिटी (SAU) ने बीते दो वर्षों में दाखिलों के मामले में बड़ी छलांग लगाई है। यूनिवर्सिटी में नए प्रवेश तीन गुना तक बढ़े हैं। इसके पीछे सबसे अहम वजह बाजार की मांग के अनुरूप नए ग्रेजुएशन और प्रोफेशनल कोर्स शुरू करना माना जा रहा है।
यूनिवर्सिटी ने हाल के वर्षों में बीटेक, इंटीग्रेटेड बीबीए-एमबीए और बीएस-एमएस जैसे कोर्स शुरू किए, जिन्हें छात्रों से अच्छा रिस्पॉन्स मिला। इसका असर न सिर्फ स्टूडेंट एनरोलमेंट पर पड़ा, बल्कि सदस्य देशों से मिलने वाली ग्रांट पर भी दिखा। साल 2025 में कई देशों ने लंबे समय बाद अपने हिस्से की राशि, एरियर समेत, जमा कराई है। मालदीव ने चार साल बाद ग्रांट दी, जबकि बांग्लादेश की ओर से पिछले चार वर्षों में सबसे ज्यादा योगदान इसी सत्र में आया।
हालांकि यूनिवर्सिटी में छात्रों का बड़ा हिस्सा भारतीय है। कुल छात्रों में करीब 90 प्रतिशत भारतीय हैं और मौजूदा सत्र में हुए नए दाखिलों में यह आंकड़ा 95 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
2026 सत्र के लिए क्या है SAU की योजना
यूनिवर्सिटी के प्रेजिडेंट प्रो. के.के. अग्रवाल के अनुसार, साउथ एशियन यूनिवर्सिटी में मास्टर ऑफ लॉ (LLM) की शुरुआत से ही अच्छी मांग रही है। इसी को देखते हुए शैक्षणिक सत्र 2026-27 से एलएलबी कोर्स शुरू करने का फैसला लिया गया है। एलएलबी में 60-60 सीटों के दो सेक्शन होंगे।
इसके अलावा जर्नलिज्म के क्षेत्र में भी बड़ा विस्तार किया जा रहा है। बैचलर और मास्टर लेवल पर जर्नलिज्म के नए कोर्स शुरू होंगे, जिनके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के दो स्टूडियो तैयार किए जा रहे हैं। बीबीए और एमबीए कोर्स में भी सीटें बढ़ाने की योजना है और हर कोर्स में एक अतिरिक्त सेक्शन जोड़ने पर काम चल रहा है।
टेक्नोलॉजी और मैनेजमेंट के मेल को ध्यान में रखते हुए मास्टर ऑफ डेटा साइंस कोर्स भी शुरू किया जाएगा, जिसमें कंप्यूटर साइंस और मैनेजमेंट दोनों की पढ़ाई होगी।
अब तक LLB क्यों नहीं था?
अब तक एलएलबी कोर्स शुरू न होने की बड़ी वजह अलग-अलग देशों की बार काउंसिल और उनके नियम रहे हैं। सवाल यह था कि पढ़ाई पूरी करने के बाद छात्र अपने देश में जाकर वकालत के लिए रजिस्ट्रेशन कैसे करेंगे। प्रो. अग्रवाल के मुताबिक, सभी सार्क देशों के एलएलबी सिलेबस का अध्ययन करने पर सामने आया कि करीब 90 प्रतिशत पाठ्यक्रम समान है। शेष 10 प्रतिशत के लिए अलग सेक्शन बनाए जाएंगे और संबंधित देशों के विशेषज्ञों द्वारा ऑनलाइन क्लासेज के जरिए पढ़ाई कराई जाएगी।
तेजी से बढ़ते एडमिशन
प्रो. अग्रवाल बताते हैं कि दो साल पहले एक सत्र में जहां करीब 400 नए एडमिशन हुए थे, वहीं ग्रेजुएशन लेवल के लोकप्रिय कोर्स शुरू होने के बाद 2024 में यह संख्या 600 और 2025 में 1104 तक पहुंच गई। उनका कहना है कि अगर यही रफ्तार बनी रही तो यूनिवर्सिटी की पूरी क्षमता भर जाएगी। फिलहाल SAU में करीब 4,000 छात्रों की क्षमता है। 2026 में संख्या बहुत ज्यादा बढ़ाने के बजाय नए और प्रासंगिक कोर्स पर फोकस रहेगा।
क्षेत्रीय हालात और छात्रों पर असर
बांग्लादेश समेत क्षेत्रीय राजनीतिक हालात को लेकर पूछे गए सवाल पर प्रो. अग्रवाल का कहना है कि यूनिवर्सिटी पर इसका सीधा असर नहीं पड़ता। हां, वीजा प्रक्रिया जरूर प्रभावित होती है, लेकिन वीजा जारी करने का फैसला भारत सरकार का होता है। हर देश को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के हिसाब से निर्णय लेने का अधिकार है। उन्होंने यह भी बताया कि अब अफगानिस्तान के छात्रों को फिर से वीजा मिलना शुरू हो गया है।
गौरतलब है कि साउथ एशियन यूनिवर्सिटी में अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, श्रीलंका और पाकिस्तान के छात्र दाखिला ले सकते हैं। फिलहाल पाकिस्तान से कोई छात्र नामांकित नहीं है, जबकि बांग्लादेश के करीब 20 छात्रों ने दाखिला लिया है।
नए कोर्स, बढ़ती ग्रांट और छात्रों की बढ़ती रुचि के साथ साउथ एशियन यूनिवर्सिटी धीरे-धीरे क्षेत्रीय उच्च शिक्षा के एक मजबूत केंद्र के रूप में उभरती दिख रही है।




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