
पृथ्वी दिवस के अवसर पर शूलिनी यूनिवर्सिटी (Shoolini University) ने सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया। “हमारी शक्ति, हमारा ग्रह—विज्ञान और समुदाय के माध्यम से सतत विकास को प्रेरित करना” विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम में शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और छात्रों ने भाग लिया और विज्ञान आधारित समाधानों के साथ सामुदायिक भागीदारी की अहमियत पर चर्चा की।
यह सेमिनार विश्वविद्यालय के टैगोर सेमिनार हॉल में जीव विज्ञान और पर्यावरण विज्ञान संकाय की ओर से आयोजित किया गया, जिसमें नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज इंडिया (चंडीगढ़ चैप्टर) और सोसायटी फॉर प्रमोशन ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी इन इंडिया का सहयोग रहा।
उद्घाटन सत्र में पर्यावरणीय चुनौतियों पर चर्चा
कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में पृथ्वी दिवस के महत्व पर प्रकाश डाला गया और यह बताया गया कि बढ़ती पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए केवल तकनीक ही नहीं, बल्कि समाज की सक्रिय भागीदारी भी जरूरी है। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि वैज्ञानिक नवाचार को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं।
विशेषज्ञों ने साझा किए विचार
संस्थापक कुलाधिपति प्रो. पीके खोसला ने छात्रों और शोधकर्ताओं से अपील की कि वे सतत विकास के प्रति जिम्मेदार और सक्रिय भूमिका निभाएं। विज्ञान विभाग के डीन प्रो. सुनील पुरी ने संसाधनों के संतुलित और जिम्मेदार उपयोग को भविष्य के लिए जरूरी बताया।
वहीं पंजाब विश्वविद्यालय से जुड़े प्रो. केके भसीन, जो National Academy of Sciences India के चंडीगढ़ चैप्टर के सचिव भी हैं, ने कहा कि सतत विकास को आगे बढ़ाने में वैज्ञानिक संस्थानों की भूमिका बेहद अहम है। उनके मुताबिक, शिक्षा जगत, रिसर्च संस्थान और समाज के बीच बेहतर तालमेल से ही वैज्ञानिक ज्ञान को व्यवहारिक समाधान में बदला जा सकता है।
नैनो टेक्नोलॉजी की भूमिका पर भी चर्चा
Jaypee University of Information Technology (JUIT) के प्रो. पी.बी. बर्मन ने सतत विकास में नैनो टेक्नोलॉजी के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि ग्रीन नैनो टेक्नोलॉजी ऊर्जा, पर्यावरण संरक्षण, जल शोधन और कृषि जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।
इस सेमिनार के जरिए यह स्पष्ट संदेश सामने आया कि पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास केवल नीतियों तक सीमित नहीं रह सकता। इसके लिए विज्ञान, शिक्षा और समाज को मिलकर काम करना होगा। शूलिनी यूनिवर्सिटी का यह प्रयास छात्रों और शोधकर्ताओं को इस दिशा में जागरूक करने की एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।




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