
हैदराबाद विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने कृषि विज्ञान के क्षेत्र में एक उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। उन्होंने ऐसी पर्यावरण-हितैषी और संसाधन-कुशल तकनीक विकसित की है, जो भारत में आवश्यक तेल आधारित खेती (Essential Oil Farming) के भविष्य को नई दिशा दे सकती है।
इस शोध में बताया गया है कि यदि रोज़मेरी (Rosemary) पौधों पर नैनो आकार के मैक्रो और माइक्रो पोषक तत्वों का छिड़काव किया जाए, तो पारंपरिक उर्वरकों की तुलना में केवल 20–30% मात्रा का उपयोग करके ही पौधों की वृद्धि, तेल की पैदावार और गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार किया जा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुआ शोध
यह अध्ययन प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘Industrial Crops and Products’ में प्रकाशित हुआ है। यह परियोजना भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) द्वारा प्रायोजित की गई थी।
इस शोध को हैदराबाद विश्वविद्यालय के प्लांट साइंसेज विभाग और स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी ने मिलकर पूरा किया, जो एक शानदार इंटरडिसिप्लिनरी (अंतर्विषयक) सहयोग का उदाहरण है।
कैसे काम करती है यह नई तकनीक?
इस तकनीक में पारंपरिक उर्वरकों को यांत्रिक मिलिंग (Mechanical Milling) प्रक्रिया द्वारा नैनो कणों (Nano Particles) में बदल दिया जाता है। इससे पौधों को नाइट्रोजन, जिंक, लोहा, मैंगनीज़ और तांबा जैसे पोषक तत्व अधिक प्रभावी ढंग से उपलब्ध हो जाते हैं। परिणामस्वरूप पौधों की जड़ों और तनों का विकास बेहतर होता है, बायोमास बढ़ता है, और तेल की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार देखा गया।
शोध के अनुसार, इस प्रक्रिया से रोज़मेरी तेल में पाए जाने वाले मुख्य घटक 1.8-सिनिओल (1.8-Cineole) की मात्रा भी काफी बढ़ी, जो इसके सुगंध और औषधीय गुणों को बेहतर बनाता है।
सस्टेनेबल फार्मिंग की दिशा में नई उम्मीद
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तकनीक सस्टेनेबल फार्मिंग (Sustainable Farming) की दिशा में एक बड़ा कदम है। इससे किसान कम संसाधनों का उपयोग करके अधिक और बेहतर गुणवत्ता वाला उत्पादन कर सकेंगे।
यह तकनीक न केवल रोज़मेरी, बल्कि अन्य एरोमैटिक और कमर्शियल फसलों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है। इससे पर्यावरण-अनुकूल, लागत-कुशल और टिकाऊ कृषि प्रणाली को बढ़ावा मिलेगा।
आगे का रास्ता
विशेषज्ञों का मानना है कि नैनो-आधारित पोषक तकनीकें आने वाले समय में भारतीय कृषि की उत्पादकता बढ़ाने और पर्यावरणीय दबाव घटाने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। यदि इस तकनीक को बड़े स्तर पर अपनाया गया, तो यह भारत के कृषि और हर्बल उद्योग के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकती है।
हैदराबाद विश्वविद्यालय का यह नवाचार न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से अहम है, बल्कि यह भारतीय किसानों के लिए कम लागत में अधिक गुणवत्ता वाला उत्पादन देने की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह शोध यह साबित करता है कि आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक कृषि का मेल सस्टेनेबल और हरित भविष्य की कुंजी बन सकता है।




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