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ICAR Data Breach: Thousands of Scientists' Records Missing, Allegations of Conspiracy Raise Concern

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के हजारों वैज्ञानिकों के रिकॉर्ड गायब, लग रहे साजिश के आरोप

ICAR Data Breach: Thousands of Scientists' Records Missing, Allegations of Conspiracy Raise Concern

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और कृषि वैज्ञानिक भर्ती बोर्ड (ASRB) एक बड़े डेटा संकट से गुजर रहे हैं। संस्थान के सेंट्रल डेटा सेंटर से हजारों वैज्ञानिकों की भर्ती फाइलें, शोध परियोजनाएं, आंतरिक कम्युनिकेशन और बेहद संवेदनशील दस्तावेज अचानक गायब हो गए। हैरानी की बात यह है कि दिल्ली स्थित मुख्य सर्वर के बाद हैदराबाद के डिजास्टर रिकवरी सेंटर (NAARM) से भी पूरा बैकअप डेटा मिट गया। मामले में न तो ठोस कार्रवाई हुई और न ही किसी आधिकारिक रिपोर्ट को सार्वजनिक किया गया।

“ये साइबर अटैक नहीं, सोची-समझी साजिश”—वेणुगोपाल बदरवाड़ा

ICAR गवर्निंग बॉडी के पूर्व सदस्य और जाने-माने पशु-आनुवंशिकी विशेषज्ञ वेणुगोपाल बदरवाड़ा ने इस घटना को साधारण साइबर अटैक मानने से इनकार किया है। उनका आरोप है कि यह डेटा जानबूझकर मिटाया गया है और इसके पीछे भर्ती प्रक्रियाओं से जुड़ी गड़बड़ियों को छिपाने की कोशिश हो सकती है।

बदरवाड़ा ने इस मामले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी पत्र लिखा है और इसे “गंभीर संस्थागत विफलता” बताया।

रिकॉर्ड मिटने के आरोप और ICAR का जवाब

बदरवाड़ा ने वर्ष 2014 के बाद से ASRB की सभी भर्तियों का पूर्ण ऑडिट और समीक्षा की मांग उठाई है, खासकर उन मामलों की जिनमें पात्रता में छूट दी गई थी। 

इस पर ICAR के महानिदेशक एम. एल. जाट ने कहा कि ये आरोप बेबुनियाद हैं और बदरवाड़ा की “ऐसे पत्र लिखने की पुरानी आदत” है।

लेकिन बदरवाड़ा के अनुसार—दिल्ली का मेन सर्वर और हैदराबाद का रेप्लिकेशन सर्वर दोनों ही डेटा ब्रीच से प्रभावित हुए हैं।

कौन-कौन सा डेटा गायब हुआ?

सूत्रों के मुताबिक गायब हुए डेटा में ASRB द्वारा संचालित सभी भर्ती रिकॉर्ड, जूनियर टेक्निकल ऑफिसर से लेकर DDG तक के पदों से जुड़े दस्तावेज, जॉब एप्लीकेशन और रिसर्च प्रोजेक्ट फाइलें, आंतरिक ईमेल रिपॉजिटरी, वैज्ञानिकों के ईमेल डेटा, जो अब तक रिकवर नहीं हो सका, शामिल हैं। 

बताया जा रहा है कि अप्रैल 2025 में IASRI स्थित ICAR के केंद्रीय डेटा सेंटर पर साइबर अटैक हुआ, जिसके बाद कई महत्वपूर्ण डेटा सेट सिस्टम से हट गए।

“रिकॉर्ड मांगेंगे तो मिलेगा नहीं”—बदरवाड़ा

बदरवाड़ा ने दावा किया कि ICAR में डेटा-ब्रीच और भर्ती रिकॉर्ड का गायब होना, साथ ही डेटा सेंटर में अचानक स्टाफ परिवर्तन, यह दर्शाता है कि समस्या सिर्फ तकनीकी नहीं बल्कि एक गहरी गड़बड़ी का संकेत है।

उनके अनुसार, दिल्ली और हैदराबाद—दोनों सर्वर से डेटा मिटना अपने आप में “डिजिटल कवर-अप” की ओर इशारा करता है।

ASRB को खत्म करने की मांग

बदरवाड़ा ने अपनी शिकायत में कहा कि ICAR में लंबे समय से नेपोटिज़्म, फेवरिटिज़्म और मनमानी भर्तियों की शिकायतें होती रही हैं। डेटा गायब होने के बाद अब किसी भी भर्ती का रिकॉर्ड मांगना लगभग असंभव हो गया है। इसलिए, उन्होंने प्रधानमंत्री से मांग की है कि ASRB को समाप्त कर दिया जाए और इसकी जगह एक पारदर्शी, सुरक्षित और जवाबदेह भर्ती प्रणाली तैयार की जाए।

“चुप्पी ईमानदारी नहीं, बल्कि डर”

उनका कहना है कि ASRB पर सवाल इसलिए नहीं उठ रहे क्योंकि डेटा मिटने के बाद लोग विरोध भी नहीं कर पा रहे। इससे साफ संकेत मिलता है कि कई भर्ती रिकॉर्ड चुन-चुनकर डिलीट किए गए हैं।

सिस्टम फेल होने के संकेत

उनके पत्र में कई महत्वपूर्ण आंकड़े भी सामने आते हैं। पिछले 9 वर्षों में ASRB ने 1491 पदों पर भर्ती की यानी प्रतिवर्ष औसतन 166 रिक्रूटमेंट हुए। भर्ती प्रक्रियाओं पर सालाना 26.49 करोड़ रुपये खर्च हुए। इसका अर्थ यह हुआ कि हर भर्ती पर औसतन 15.95 लाख रुपये लगाए गए। इसके बाद भी पूरा भर्ती डेटा गायब होना गंभीर सवाल खड़ा करता है।

 

उन्होंने पूछा—जब अन्य वैज्ञानिक संस्थानों जैसे CSIR, ICMR, DRDO, ISRO को अलग भर्ती बोर्ड की जरूरत नहीं, तो फिर सिर्फ ICAR के लिए ASRB क्यों? 

UPSC के तहत भर्ती की मांग 

बदरवाड़ा ने सुझाव दिया कि कृषि वैज्ञानिकों की भर्ती UPSC के जरिए कराई जाए, ICAR में नियम-आधारित कैडर और डेटा मैनेजमेंट सिस्टम बनाया जाए तथा डेटा सिक्योरिटी, ऑडिट ट्रेल्स और थर्ड-पार्टी मॉनिटरिंग अनिवार्य की जाए। 

कार्रवाई पर सवाल

जुलाई 2025 में एक छह सदस्यीय समिति बनाई गई।

उसकी सिफारिश पर IASRI डायरेक्टर को रिटायरमेंट से 3 दिन पहले हटा दिया गया, डेटा सेंटर से जुड़े दो प्रिंसिपल साइंटिस्ट का ट्रांसफर कर दिया गया। इसके बाद केस को बंद कर दिया गया, जिससे कार्रवाई की पारदर्शिता पर और सवाल उठने लगे हैं।

 

ICAR और ASRB में रिकॉर्ड गायब होने का मामला सिर्फ एक साइबर अटैक से कहीं आगे का लग रहा है। संवेदनशील डेटा का गायब होना, बैकअप का मिटना और सीमित कार्रवाई—ये सभी संकेत संस्थागत जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाते हैं।

अब सवाल यह है कि क्या सरकार इस मामले में एक पारदर्शी जांच कराएगी और कृषि अनुसंधान की प्रतिष्ठा को सुरक्षित रखने के लिए ठोस कदम उठाएगी?

 

एडइनबॉक्स टीम

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