
किसानों की बढ़ती चुनौतियों और लगातार बदलते मौसम के बीच खेती का पारंपरिक तरीका अब किसानों की जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहा है। ऐसे में झांसी स्थित केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक एक ऐसी तकनीक पर काम कर रहे हैं, जो कम जमीन में अधिक पैदावार देकर किसानों की आय में बड़ा इज़ाफा कर सकती है। यह तकनीक है—एग्रो क्रॉपिंग।
कम जगह में दोहरी कमाई
विश्वविद्यालय परिसर के फार्म हाउस में वैज्ञानिक लगातार शोध कर रहे हैं कि किस तरह कम से कम जगह में एक साथ दो से अधिक फसलों को उगाया जा सके। एग्रो क्रॉपिंग तकनीक इसी विचार का विस्तार है। इसमें एक फसल की छांव में दूसरी फसल को उगाया जाता है, जिससे जमीन का अधिकतम उपयोग होता है और पैदावार भी बढ़ती है।
केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने कदम के पेड़ों पर आधारित एक मॉडल तैयार किया है। खास बात यह है कि कदम का पेड़ केवल पांच साल तक जीवित रहता है, और इस दौरान वह इतना घना हो जाता है कि इसकी छाया में हल्दी और अरबी जैसी फसलें आसानी से पनप जाती हैं। इससे किसानों को महंगी लकड़ी भी मिलती है और सब्जियों की अतिरिक्त आय भी।
बुंदेलखंड के किसानों के लिए बड़ी पहल
कृषि वैज्ञानिक प्रभात तिवारी बताते हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार बुंदेलखंड के किसानों की आय बढ़ाने के लिए नई तकनीकों को तेजी से अपनाने पर जोर दे रही है। इसी दिशा में एग्रो क्रॉपिंग का सफल प्रयोग झांसी में शुरू किया गया है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय की टीम गांव-गांव जाकर किसानों को इस तकनीक के बारे में जागरूक कर रही है। किसानों को समझाया जा रहा है कि किस तरह वे सीमित भूमि में भी दोहरी खेती कर लाभ कमा सकते हैं।
विश्वविद्यालय का दावा है कि झांसी के कई किसानों ने एग्रो क्रॉपिंग अपना ली है और इससे उनकी आमदनी लगभग दोगुनी होने लगी है। हल्दी और अरबी जैसी फसलों की अच्छी पैदावार मिलने से किसान अब अधिक स्थायी आय की ओर बढ़ रहे हैं।
कदम के पेड़ क्यों उपयोगी?
यह पेड़ तेजी से बढ़ता है और पांच साल में पूरी तरह तैयार हो जाता है। इसकी लकड़ी बाजार में अच्छी कीमत पर बिकती है। इसकी छाया अरबी, हल्दी और कई अन्य छाया-सहिष्णु फसलों के लिए अनुकूल होती है। पेड़ को कुछ दूरी पर लगाने से फसलों को पर्याप्त सूर्य प्रकाश और पोषक तत्व मिलते रहते हैं।
कृषि का बदलता स्वरूप
एग्रो क्रॉपिंग न केवल फसलों की पैदावार बढ़ाती है, बल्कि मिट्टी की नमी और उर्वरता को भी बनाए रखती है। विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले वर्षों में यह तकनीक कृषि क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव ला सकती है। सरकार और विश्वविद्यालय मिलकर इस मॉडल को और जिलों में विस्तार देने की तैयारी कर रहे हैं, ताकि अधिक किसान इसका लाभ उठा सकें।




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