
भारत में खेती को अधिक टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल बनाने की दिशा में Indian Council of Agricultural Research (आईसीएआर) ने एक महत्वाकांक्षी योजना तैयार की है। इस वैज्ञानिक रोडमैप के तहत वर्ष 2030 तक रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में 25 प्रतिशत तक कमी लाने का लक्ष्य रखा गया है। इसका उद्देश्य खेती की लागत घटाना, मिट्टी की सेहत सुधारना और पर्यावरण पर पड़ने वाले दबाव को कम करना है।
गांव स्तर से होगी शुरुआत
आईसीएआर के अनुसार, इस लक्ष्य को चरणबद्ध तरीके से हासिल किया जाएगा। इसकी शुरुआत मौजूदा सीजन में उर्वरकों के उपयोग में करीब 5 प्रतिशत कमी लाने से होगी। इसके लिए “विलेज मॉडल” अपनाया जा रहा है, जहां किसानों को मृदा परीक्षण, संतुलित उर्वरक उपयोग और नई तकनीकों के बारे में प्रशिक्षित किया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि गांव स्तर पर जागरूकता और प्रशिक्षण से ही बड़े स्तर पर बदलाव संभव है, क्योंकि अधिकांश किसान पारंपरिक तरीकों पर निर्भर रहते हैं।
बायो-इनपुट्स और सटीक खेती पर जोर
इस योजना में जैव उर्वरकों (बायो-इनपुट्स) और Precision Farming (प्रिसिजन फार्मिंग) को प्रमुख आधार बनाया गया है। इसके जरिए फसलों को उनकी जरूरत के अनुसार ही पोषक तत्व दिए जाएंगे, जिससे अनावश्यक उर्वरक उपयोग कम होगा।
साथ ही, मॉडल गांव कार्यक्रम (MGMG) के माध्यम से तकनीक और वैज्ञानिक जानकारी सीधे किसानों तक पहुंचाई जाएगी। ध्यान इस बात पर है कि उत्पादन पर कोई नकारात्मक असर न पड़े, बल्कि गुणवत्ता और पैदावार दोनों बेहतर हों।
BNI तकनीक से नई उम्मीद
आईसीएआर के वैज्ञानिक Biological Nitrification Inhibition (बीएनआई) तकनीक पर भी काम कर रहे हैं। इस तकनीक के जरिए मिट्टी में नाइट्रोजन के बेहतर उपयोग को सुनिश्चित किया जाता है, जिससे उर्वरकों की जरूरत कम हो सकती है। शुरुआती आकलनों के मुताबिक, इससे उर्वरक उपयोग में 25 प्रतिशत तक कमी संभव है।
इसके अलावा, जलवायु-प्रतिरोधी और पोषक तत्वों से भरपूर नई फसल किस्मों के विकास पर भी जोर दिया जा रहा है।
संरक्षण कृषि के सकारात्मक परिणाम
आईसीएआर के प्रयोगों में संरक्षण कृषि (कंजरवेशन एग्रीकल्चर) के तहत उल्लेखनीय नतीजे सामने आए हैं। आंकड़ों के अनुसार, सिंचाई जल की खपत में 85 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई है, जबकि उर्वरक उपयोग में करीब 28 प्रतिशत की गिरावट आई है।
सबसे अहम बदलाव फसल अवशेष जलाने की घटनाओं में देखने को मिला है, जहां लगभग 95 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई। इससे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में करीब 46 प्रतिशत की गिरावट आई है। इन सुधारों का सीधा असर किसानों की आय पर भी पड़ा है, जो कई मामलों में लगभग दोगुनी तक बढ़ी है।
मिट्टी और पर्यावरण दोनों को फायदा
दीर्घकालिक अनुसंधानों से यह भी सामने आया है कि मिट्टी में कार्बनिक कार्बन और सूक्ष्मजीवों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। इससे मृदा की गुणवत्ता बेहतर हुई है और खेती लंबे समय तक टिकाऊ बन सकती है।
आईसीएआर का मानना है कि यह पहल न केवल किसानों के लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद होगी, बल्कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने और भारत के कार्बन न्यूट्रैलिटी लक्ष्यों को हासिल करने में भी अहम भूमिका निभाएगी।




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