
नई शिक्षा व्यवस्था के तहत अनुभव आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने की दिशा में ओडिशा के देवगढ़ जिले में एक खास पहल शुरू की गई है। यहां मरडंग स्थित एक विद्यालय में बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ खेती-किसानी के व्यावहारिक ज्ञान से भी जोड़ा जा रहा है। इस पहल को ग्रामीण शिक्षा और कौशल विकास के बेहतर उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है।
पढ़ाई के साथ खेत का अनुभव
इस कार्यक्रम को श्यामल सुवर्ण एग्रो के सहयोग से चलाया जा रहा है, जहां छात्रों के लिए सप्ताह में एक दिन कृषि कक्षा तय की गई है। इस दौरान बच्चे सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि खेत में जाकर जैविक खेती, सब्जी उत्पादन और जैविक खाद बनाने की प्रक्रिया को खुद करके सीखते हैं।
यह पहल ‘लर्निंग बाय डूइंग’ यानी करके सीखने की अवधारणा पर आधारित है, जो National Education Policy के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है। इसका मकसद छात्रों को सिर्फ सैद्धांतिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक ज्ञान भी देना है।
कृषि को बताया जा रहा भविष्य की नींव
कार्यक्रम के दौरान छात्रों को यह समझाया जा रहा है कि खेती केवल रोज़गार का जरिया नहीं, बल्कि राज्य और देश के विकास की मजबूत नींव है। वैज्ञानिक तरीके से खेती कर आज युवा, महिलाएं और उद्यमी नए अवसर बना रहे हैं। ऐसे में स्कूल स्तर पर ही कृषि शिक्षा से जुड़ाव भविष्य के लिए अहम माना जा रहा है।
पर्यावरण और स्वास्थ्य पर भी फोकस
इस पहल के जरिए बच्चों को जैविक खेती के महत्व से भी परिचित कराया जा रहा है। उन्हें बताया जा रहा है कि बिना रसायनों के खेती करना न सिर्फ पर्यावरण के लिए बेहतर है, बल्कि इससे स्वस्थ जीवनशैली भी अपनाई जा सकती है।
छात्रों ने साझा किए अपने अनुभव
इस कार्यक्रम से प्रेरित होकर छात्रों ने अपने अनुभव और उपलब्धियां देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पोस्टकार्ड के जरिए भेजी हैं। इसमें उन्होंने बताया कि इस तरह की शिक्षा से उन्हें नई चीजें सीखने और समझने का मौका मिला है।
देवगढ़ का यह प्रयोग दिखाता है कि अगर शिक्षा को जीवन से जोड़ा जाए, तो सीखने की प्रक्रिया ज्यादा प्रभावी हो सकती है। यह पहल न केवल बच्चों को व्यावहारिक कौशल दे रही है, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर और जागरूक नागरिक बनने की दिशा में भी आगे बढ़ा रही है।




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