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NIT राउरकेला के शोधकर्ताओं ने विकसित की नई फूड सेफ्टी तकनीक, मिलावट की सटीक पहचान अब सेकंडों में

NIT राउरकेला के शोधकर्ताओं ने विकसित की नई फूड सेफ्टी तकनीक, मिलावट की सटीक पहचान अब सेकंडों में

NIT राउरकेला के शोधकर्ताओं ने विकसित की नई फूड सेफ्टी तकनीक, मिलावट की सटीक पहचान अब सेकंडों में

खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि सामने आई है। National Institute of Technology Rourkela (NIT राउरकेला) के शोधकर्ताओं ने एक नई पेटेंटेड तकनीक विकसित की है, जो खाने-पीने की चीजों में मिलावट का तेजी से पता लगाने और उसकी मात्रा मापने में सक्षम है। इस शोध को अंतरराष्ट्रीय जर्नल Food Chemistry में प्रकाशित किया गया है। ‘Method and System for Detecting and Quantifying Adulteration in Food Stuff’ शीर्षक से मिले इस पेटेंट के जरिए मसालों और अन्य खाद्य उत्पादों में मिलावट की पहचान पारंपरिक लैब टेस्ट की तुलना में ज्यादा तेज और कम लागत में की जा सकती है।

पारंपरिक जांच तरीकों में आमतौर पर केवल यह पता चलता है कि किसी उत्पाद में मिलावट है या नहीं, लेकिन नई तकनीक मिलावट की मात्रा भी बताने में सक्षम है। इसे रेगुलेटरी नियमों के पालन और इंडस्ट्री में क्वालिटी कंट्रोल के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह सिस्टम Artificial Intelligence और इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी की मदद से कुछ ही सेकंड में मिलावट के स्तर की पहचान कर लेता है, जिससे इसे क्वालिटी कंट्रोल लैब, फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स और नियमित जांच प्रक्रियाओं में इस्तेमाल किया जा सकता है।

शोधकर्ताओं ने फूरियर ट्रांसफॉर्म इन्फ्रारेड (FTIR) स्पेक्ट्रोस्कोपी को मशीन लर्निंग मॉडल्स के साथ मिलाकर फूड सैंपल्स के जटिल पैटर्न का विश्लेषण किया और उच्च सटीकता के साथ गड़बड़ियों की पहचान की। परीक्षण के दौरान टीम ने धनिया पाउडर में बुरादा (sawdust) मिलाने जैसी आम मिलावट को भी जांचा। इस तकनीक ने मिलावट का पता लगाने में लगभग 92 प्रतिशत तक की सटीकता हासिल की।

NIT राउरकेला के फूड प्रोसेस इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर Sushil Kumar Singh ने कहा कि यह तकनीक खाद्य उद्योग में लंबे समय से मौजूद एक बड़ी कमी को दूर करती है, जहां तेज और भरोसेमंद मिलावट जांच प्रणाली की जरूरत थी। उन्होंने बताया कि इस सिस्टम को मौजूदा क्वालिटी कंट्रोल प्रक्रियाओं में आसानी से जोड़ा जा सकता है, जिससे रियल-टाइम निर्णय लेना संभव होगा और बड़े उद्योगों के साथ-साथ छोटे और मध्यम उद्यम भी इसका लाभ उठा सकेंगे।

शोधकर्ताओं के अनुसार, पारंपरिक लैब तरीकों में अधिक मानव संसाधन, रसायन और समय की जरूरत होती है, जिससे लागत बढ़ जाती है। नई तकनीक सैंपल तैयार करने और जांच में लगने वाले समय को कम करती है, जिससे भारत जैसे मूल्य-संवेदनशील बाजारों में यह एक व्यवहारिक समाधान साबित हो सकती है।

प्रोजेक्ट के अगले चरण में इस तकनीक का पायलट स्तर पर उद्योगों में परीक्षण किया जाएगा और इसे मसालों से आगे बढ़ाकर अन्य खाद्य उत्पादों में मिलावट की पहचान के लिए भी विकसित किया जाएगा।

Asmita Sarkar

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