
भारत के वैज्ञानिकों ने केमिस्ट्री के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। IIT Madras और Indian Institute of Science (IISc) Bengaluru के शोधकर्ताओं ने मिलकर एक नया कार्बन-फ्री मॉलिक्यूल तैयार किया है, जिसे विज्ञान जगत में एक महत्वपूर्ण खोज माना जा रहा है। यह नया मॉलिक्यूल मशहूर फेरोसिन (Ferrocene) मॉलिक्यूल के खास “सैंडविच” स्ट्रक्चर जैसा है और वैज्ञानिकों के सामने पिछले करीब 70 वर्षों से मौजूद एक बड़ी चुनौती का समाधान करता है।
फेरोसिन मॉलिक्यूल की खोज 1950 के दशक में हुई थी। इसका अनोखा स्ट्रक्चर वैज्ञानिकों के लिए लंबे समय से आकर्षण का केंद्र रहा है। इसमें एक आयरन एटम दो बड़े और चपटे कार्बन रिंग्स के बीच “सैंडविच” की तरह स्थित होता है। इसी वजह से इसे “सैंडविच मॉलिक्यूल” भी कहा जाता है। फेरोसिन का उपयोग आज दवाइयों, बैटरियों, इलेक्ट्रॉनिक्स और एडवांस्ड मटेरियल्स जैसे कई आधुनिक क्षेत्रों में किया जाता है।
केमिस्ट्री में कार्बन की भूमिका हमेशा बेहद खास मानी जाती है। ऑर्गेनिक केमिस्ट्री पूरी तरह कार्बन और उसके यौगिकों के अध्ययन पर आधारित है। कार्बन अपनी मजबूत बॉन्डिंग क्षमता की वजह से स्थिर और जटिल मॉलिक्यूल बनाने में सक्षम होता है। इसी कारण वैज्ञानिक लंबे समय से यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि क्या फेरोसिन जैसा सैंडविच स्ट्रक्चर बिना कार्बन के भी तैयार किया जा सकता है।
दुनियाभर के कई वैज्ञानिकों ने अलग-अलग तत्वों के साथ ऐसे मॉलिक्यूल बनाने की कोशिश की, लेकिन फेरोसिन जैसी स्थिरता और संरचना हासिल नहीं हो पाई। अब IIT Madras के शोधकर्ताओं सुंदरगोपाल घोष और स्तुति महापात्रा की अगुवाई में, IISc Bengaluru के वैज्ञानिक एलुवाथिंगल जेमिस के सहयोग से इस चुनौती को सफलतापूर्वक हल कर लिया गया है।
शोधकर्ताओं ने एक नया मॉलिक्यूल तैयार किया है, जिसमें आयरन की जगह ऑस्मियम धातु का उपयोग किया गया है। वहीं कार्बन रिंग्स की जगह बोरॉन आधारित रिंग्स को शामिल किया गया है। यह नया स्ट्रक्चर फेरोसिन जैसा दिखाई देता है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूरी तरह कार्बन-फ्री है।
इस खोज को प्रतिष्ठित साइंस जर्नल में प्रकाशित किया गया है, जिसे दुनिया की सबसे भरोसेमंद वैज्ञानिक पत्रिकाओं में गिना जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह अभी मुख्य रूप से एक अकादमिक सफलता है, लेकिन भविष्य में इसके कई व्यावहारिक उपयोग सामने आ सकते हैं।
रिसर्च टीम का कहना है कि शुरुआती परीक्षणों में यह नया मॉलिक्यूल काफी स्थिर पाया गया है। ऑस्मियम और बोरॉन रिंग्स के बीच मजबूत बॉन्डिंग देखी गई है, जिससे यह फेरोसिन की तुलना में अधिक मजबूत साबित हो सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज भविष्य में नए तरह के एडवांस्ड मटेरियल्स और हाई-परफॉर्मेंस केमिकल कंपाउंड्स विकसित करने का रास्ता खोल सकती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह उपलब्धि केवल भारतीय वैज्ञानिकों के लिए ही नहीं बल्कि वैश्विक केमिस्ट्री रिसर्च के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। आने वाले समय में इस खोज के जरिए ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स और मेडिकल साइंस जैसे क्षेत्रों में नई संभावनाएं विकसित हो सकती हैं।




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