
इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की बैटरी को तेजी से और सुरक्षित तरीके से चार्ज करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल हुई है। Indian Institute of Technology Gandhinagar (IIT गांधीनगर) के शोधकर्ताओं ने लिथियम-आयन बैटरियों के लिए एक नई अनुकूली (एडैप्टिव) चार्जिंग तकनीक विकसित की है, जो बैटरी की क्षमता को बनाए रखने के साथ-साथ उसकी उम्र बढ़ाने में मदद कर सकती है। इस शोध को प्रतिष्ठित पीयर-रिव्यू जर्नल Journal of Energy Storage में प्रकाशित किया गया है।
यह शोध मुख्य रूप से “लिथियम प्लेटिंग” की समस्या पर केंद्रित है, जिसे बैटरी की उम्र कम होने का एक प्रमुख कारण माना जाता है। लिथियम प्लेटिंग तब होती है जब बैटरी को बहुत तेजी से चार्ज किया जाता है, बेहद ठंडे मौसम में उपयोग किया जाता है या लंबे समय तक उच्च चार्ज स्तर पर रखा जाता है। ऐसी स्थिति में लिथियम ग्रेफाइट एनोड के भीतर जाने के बजाय उसकी सतह पर धातु की परत के रूप में जमा होने लगता है। इससे बैटरी की क्षमता घटती है और सुरक्षा संबंधी जोखिम भी बढ़ जाते हैं।
बैटरी सुरक्षा और फास्ट चार्जिंग पर फोकस
अध्ययन के प्रमुख लेखक और IIT गांधीनगर के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग के शोधार्थी शिव शंकर सिन्हा ने कहा कि इलेक्ट्रिक वाहन उपयोगकर्ताओं की सबसे बड़ी अपेक्षाओं में से एक फास्ट चार्जिंग है। हालांकि, अत्यधिक तेज चार्जिंग बैटरी के क्षरण की प्रक्रिया को भी तेज कर सकती है।
उन्होंने बताया कि इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए शोधकर्ताओं ने एक अनुकूलित पांच-स्तरीय एडैप्टिव मल्टी-स्टेप कॉन्स्टेंट करंट (MSCC) चार्जिंग रणनीति विकसित की है। पारंपरिक चार्जिंग सिस्टम जहां तय मानकों के अनुसार काम करते हैं, वहीं यह नया मॉडल बैटरी की वर्तमान स्थिति और तापमान के आधार पर हर चार्जिंग चक्र की शुरुआत में अपने चार्जिंग मानकों को स्वतः समायोजित करता है।
बैटरी की स्थिति के अनुसार बदलता है चार्जिंग पैटर्न
अध्ययन की प्रमुख अन्वेषक और IIT गांधीनगर के स्मार्ट पावर इलेक्ट्रॉनिक्स लैब की सहायक प्रोफेसर पल्लवी भारद्वाज ने कहा कि पारंपरिक बैटरी चार्जिंग प्रणालियां आमतौर पर स्थिर चार्जिंग पैटर्न का उपयोग करती हैं, जो बैटरी की बदलती स्थिति के अनुरूप खुद को नहीं बदल पातीं।
उन्होंने कहा कि बैटरियां स्थिर प्रणाली नहीं होतीं। उनका व्यवहार तापमान, उपयोग के इतिहास और उम्र के साथ बदलता रहता है। ऐसे में चार्जिंग तकनीक को भी इन कारकों को ध्यान में रखना चाहिए।
कैसे काम करती है नई एडैप्टिव चार्जिंग तकनीक?
यह नया फ्रेमवर्क एक स्मार्ट सुपरवाइजर की तरह काम करता है। यह मौसम और बैटरी की सेहत के आधार पर उस वोल्टेज स्तर की पहचान करता है जहां लिथियम प्लेटिंग शुरू होने की संभावना होती है। जैसे ही यह जोखिम सामने आता है, सिस्टम चार्जर को करंट कम करने का निर्देश देता है, जिससे बैटरी को होने वाले नुकसान और सुरक्षा संबंधी खतरों को कम किया जा सकता है।
शोधकर्ताओं ने इस तकनीक का परीक्षण व्यावसायिक रूप से उपलब्ध Panasonic NCR18650B निकेल-कोबाल्ट-एल्यूमीनियम लिथियम-आयन सेल्स पर किया। परीक्षण -5 डिग्री सेल्सियस से 25 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान और नई से लेकर 15 प्रतिशत तक क्षतिग्रस्त बैटरियों पर किया गया।
चार्जिंग क्षमता और दक्षता में सुधार
अध्ययन के अनुसार यह नई तकनीक पारंपरिक प्लेटिंग-अवेयर चार्जिंग पद्धति की तुलना में चार्ज क्षमता उपयोग में 10.65 प्रतिशत और चार्जिंग दक्षता में 0.55 प्रतिशत तक सुधार करने में सफल रही। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि यह प्रणाली अलग-अलग तापमान और बैटरी की उम्र संबंधी परिस्थितियों में लिथियम प्लेटिंग को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करती है।
भारत के EV सेक्टर के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह शोध?
भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार कई पहलें चला रही है। इनमें FAME योजना और Advanced Chemistry Cell Battery Storage Programme जैसे कार्यक्रम शामिल हैं। साथ ही देश में EV चार्जिंग नेटवर्क और बैटरी निर्माण क्षमता का भी तेजी से विस्तार हो रहा है।
ऐसे समय में यह नई चार्जिंग तकनीक इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी को अधिक टिकाऊ, सुरक्षित और किफायती बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि एडैप्टिव चार्जिंग सिस्टम बैटरी की कुल लागत कम करने, उसकी आयु बढ़ाने और भारत के उभरते इलेक्ट्रिक मोबिलिटी इकोसिस्टम को मजबूत बनाने में मददगार साबित हो सकते हैं।
इलेक्ट्रिक वाहनों के निर्माता जहां एक ओर तेज चार्जिंग और लंबी बैटरी लाइफ पर ध्यान दे रहे हैं, वहीं IIT गांधीनगर का यह शोध भविष्य की बैटरी तकनीकों के विकास में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।




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