
QS वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2027 में इस बार भी भारत की कोई भी यूनिवर्सिटी दुनिया के शीर्ष 100 संस्थानों में जगह नहीं बना सकी। देश के लिए सबसे बेहतर प्रदर्शन IIT दिल्ली ने किया, जिसे 118वीं रैंक मिली। वहीं IIT बॉम्बे, जो पिछले वर्षों में भारत का शीर्ष संस्थान रहा है, इस बार 134वें स्थान पर पहुंच गया।
इसी बीच सामने आए आंकड़ों ने एक बड़ी चुनौती की ओर ध्यान खींचा है। देश के 23 भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) में फैकल्टी के करीब 38.4 फीसदी पद खाली हैं। उच्च शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षकों की कमी केवल पढ़ाई और शोध ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग पर भी असर डाल सकती है, क्योंकि QS रैंकिंग में Faculty-Student Ratio यानी शिक्षक-छात्र अनुपात एक महत्वपूर्ण मानदंड है।
23 IITs में 12,498 स्वीकृत पद, लेकिन करीब 4,800 खाली
उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश के सभी 23 IITs में फैकल्टी के 12,498 पद स्वीकृत हैं। 30 जनवरी 2026 तक इनमें से केवल 7,694 पदों पर नियुक्तियां थीं, जबकि 4,804 पद खाली थे। यानी कुल स्वीकृत पदों का लगभग 38.4 प्रतिशत हिस्सा अभी भी रिक्त है।
इसका अर्थ है कि हर पांच स्वीकृत पदों में से लगभग दो पदों पर शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं।
विस्तार के दौर में बढ़ी चुनौती
फैकल्टी की कमी ऐसे समय में सामने आई है, जब IITs लगातार अपने शैक्षणिक और शोध ढांचे का विस्तार कर रहे हैं। सरकार की योजना के अनुसार 2028-29 तक IITs में लगभग 6,500 नई सीटें जोड़ी जानी हैं।
वर्तमान में IITs में 1.35 लाख से अधिक छात्र अध्ययन कर रहे हैं। ऐसे में छात्रों की बढ़ती संख्या के अनुपात में नए शिक्षकों की नियुक्ति भी जरूरी मानी जा रही है।
किन IITs में सबसे ज्यादा फैकल्टी पद खाली?
आंकड़ों के अनुसार, कुछ IITs में रिक्त पदों की स्थिति काफी गंभीर है।
- IIT पटना में स्वीकृत पदों का 54.6% हिस्सा खाली है।
- IIT खड़गपुर में 51.3% पद रिक्त हैं।
- IIT (ISM) धनबाद में 48.4% पद खाली हैं।
- IIT गोवा में 45.8% और IIT गुवाहाटी में 42.2% पद रिक्त हैं।
इसके अलावा IIT मंडी में 39.9%, IIT कानपुर में 39%, IIT बॉम्बे में 38.4% और IIT दिल्ली में 38.3% फैकल्टी पद खाली हैं।
वहीं कुछ संस्थानों में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। IIT धारवाड़ में केवल 1.07%, IIT पलक्कड़ में 5.88%, IIT रोपड़ में 14.35%, IIT तिरुपति में 14.38% और IIT भिलाई में 15.1% पद रिक्त हैं।
QS रैंकिंग में शिक्षक क्यों हैं अहम?
QS वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग केवल शोध या प्रतिष्ठा के आधार पर तय नहीं होती। इसमें शिक्षक-छात्र अनुपात (Faculty-Student Ratio), शैक्षणिक प्रतिष्ठा, नियोक्ताओं की राय, रिसर्च साइटेशन, अंतरराष्ट्रीय फैकल्टी और छात्रों की संख्या जैसे कई मानकों को शामिल किया जाता है।
यदि किसी संस्थान में फैकल्टी की संख्या कम होती है, तो उसका असर सीधे शिक्षक-छात्र अनुपात पर पड़ता है, जिससे रैंकिंग प्रभावित हो सकती है।
भर्ती प्रक्रिया तेज, लेकिन आसान नहीं
खाली पदों को भरने के लिए कई IITs ने भर्ती प्रक्रिया शुरू कर दी है। हालांकि, संस्थानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती योग्य उम्मीदवारों की उपलब्धता है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, IITs को ऐसे उम्मीदवारों की आवश्यकता होती है जिनके पास उत्कृष्ट शोध अनुभव और उच्च गुणवत्ता वाली पीएचडी हो। लेकिन ऐसे उम्मीदवारों की मांग केवल IITs तक सीमित नहीं है। देश-विदेश की विश्वविद्यालयों, बहुराष्ट्रीय रिसर्च एवं डेवलपमेंट (R&D) लैब्स और डीप-टेक स्टार्टअप्स में भी उनकी भारी मांग रहती है।
इसी वजह से कई IITs प्रतिभाशाली शिक्षकों को आकर्षित करने के लिए विशेष भर्ती अभियान, रिसर्च सपोर्ट, स्टार्टअप सहयोग और बेहतर अकादमिक सुविधाएं उपलब्ध कराने पर काम कर रहे हैं।
आगे क्या है चुनौती?
भारत के IITs वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान लगातार मजबूत कर रहे हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में शीर्ष संस्थानों की बराबरी करने के लिए केवल बुनियादी ढांचे का विस्तार पर्याप्त नहीं होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च गुणवत्ता वाले शिक्षकों की समय पर नियुक्ति, बेहतर शोध वातावरण और वैश्विक सहयोग को बढ़ावा देना आने वाले वर्षों में सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी।
यदि फैकल्टी के खाली पदों को तेजी से भरा जाता है, तो इसका सकारात्मक असर न केवल छात्रों की पढ़ाई और शोध पर पड़ेगा, बल्कि भविष्य की वैश्विक विश्वविद्यालय रैंकिंग में भी भारतीय संस्थानों की स्थिति मजबूत हो सकती है।




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