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छत्तीसगढ़ में 12,489 शिक्षक भर्ती पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, विज्ञापन और आरक्षण रोस्टर रद्द

छत्तीसगढ़ में 12,489 शिक्षकों की भर्ती को लेकर हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने वर्ष 2023 में जारी भर्ती विज्ञापन में लागू आरक्षण व्यवस्था को अवैध ठहराते हुए उसे रद्द कर दिया है। हालांकि, इस फैसले से भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह समाप्त नहीं होगी और पहले से नियुक्त शिक्षकों को तत्काल नौकरी से नहीं हटाया जाएगा। उनकी नियुक्तियां और आगे होने वाली पदोन्नति सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले के अंतिम फैसले के अधीन रहेंगी।

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने 14 अक्टूबर 2026 को याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए कहा कि राज्य सरकार वर्ष 2012 की उस आरक्षण व्यवस्था और उससे जुड़े रोस्टर के आधार पर नई भर्ती नहीं कर सकती, जिसे हाई कोर्ट पहले ही असंवैधानिक घोषित कर चुका है। अदालत ने सरकार को कानून के अनुसार आरक्षण रोस्टर और रिक्त पदों की व्यवस्था पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया है।

यह मामला सहायक शिक्षक, शिक्षक और व्याख्याता के कुल 12,489 पदों पर भर्ती के लिए छत्तीसगढ़ व्यावसायिक परीक्षा मंडल (CG Vyapam) की ओर से 4 मई 2023 को जारी विज्ञापन से जुड़ा है। लिखित परीक्षा में सफल कुछ उम्मीदवारों ने पदों के श्रेणीवार बंटवारे और आरक्षण रोस्टर को चुनौती दी थी।

एसटी वर्ग के लिए 60% से ज्यादा पद आरक्षित होने पर उठे सवाल

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि भर्ती विज्ञापन में अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के लिए निर्धारित सीमा से अधिक पद आरक्षित किए गए थे। इससे सामान्य वर्ग, अनुसूचित जाति (SC) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के उम्मीदवारों के लिए उपलब्ध अवसर कम हो गए।

अदालत में पेश आंकड़ों के अनुसार, शिक्षक ई-कैडर के 1,113 पदों में से 698 पद एसटी वर्ग के लिए रखे गए थे। यह कुल पदों का लगभग 62.71 प्रतिशत था। वहीं, शिक्षक टी-कैडर के 4,659 पदों में से 3,105 पद एसटी वर्ग के लिए आरक्षित थे, जो लगभग 66.64 प्रतिशत है।

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि आरक्षण का यह बंटवारा लागू कानूनी व्यवस्था और संविधान में दिए गए समान अवसर के अधिकार के अनुरूप नहीं था। उन्होंने भर्ती विज्ञापन और उससे जुड़े आरक्षण रोस्टर को रद्द करने की मांग की।

2012 की आरक्षण नीति को हाई कोर्ट पहले ही कर चुका था रद्द

इस मामले की जड़ छत्तीसगढ़ सरकार की 29 नवंबर 2012 की अधिसूचना में है। इस अधिसूचना के जरिए राज्य में कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 58 प्रतिशत कर दिया गया था। इसके तहत अनुसूचित जाति के लिए 12 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति के लिए 32 प्रतिशत और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 14 प्रतिशत आरक्षण निर्धारित किया गया था।

हालांकि, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की खंडपीठ ने 19 सितंबर 2022 को इस अधिसूचना और इसके आधार पर तैयार किए गए मॉडल रोस्टर को असंवैधानिक ठहराते हुए रद्द कर दिया था।

इसके बावजूद राज्य सरकार ने 4 मई 2023 को 12,489 पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया, जिसमें उसी पुरानी आरक्षण व्यवस्था के आधार पर पदों का बंटवारा किया गया था। हाई कोर्ट ने अपने हालिया फैसले में इसी पर आपत्ति जताई और कहा कि पहले रद्द की जा चुकी व्यवस्था को नई भर्ती का स्वतंत्र और वैध आधार नहीं बनाया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लेकर क्या था विवाद?

2022 में हाई कोर्ट के फैसले के बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। सुप्रीम कोर्ट ने 1 मई 2023 को भर्ती और पदोन्नति की प्रक्रियाओं को जारी रखने की अनुमति दी थी, लेकिन उनसे जुड़े परिणामों को लंबित मामले के अंतिम फैसले के अधीन रखा था।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश पहले से लंबित प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाने के लिए था। इसे रद्द हो चुकी आरक्षण नीति के आधार पर नई भर्ती शुरू करने की अनुमति नहीं माना जा सकता।

हाई कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश वर्ष 2012 की आरक्षण अधिसूचना को दोबारा वैध नहीं बनाता। राज्य सरकार को भर्ती प्रक्रिया जारी रखने की अनुमति तो है, लेकिन उसे लागू कानून और अदालतों के निर्देशों का पालन करना होगा।

बैकलॉग पदों को लेकर सरकार की दलील भी चर्चा में

राज्य सरकार ने अदालत में कहा था कि कुल 12,489 पदों में से लगभग 3,740 पद बैकलॉग के थे, जबकि 8,743 पद नए थे। सरकार के अनुसार, बैकलॉग पदों के कारण अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित पदों का अनुपात अधिक दिखाई दे रहा था।

हालांकि, अदालत ने पाया कि सरकार बैकलॉग पदों के संबंध में पर्याप्त वैधानिक दस्तावेज और रोस्टर रिकॉर्ड पेश नहीं कर सकी। इसलिए इस दलील के आधार पर विवादित आरक्षण व्यवस्था को वैध नहीं ठहराया जा सकता था।

क्या 12,489 शिक्षकों की भर्ती अब रद्द हो जाएगी?

हाई कोर्ट के फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने पूरी भर्ती प्रक्रिया को समाप्त करने या पहले से नियुक्त शिक्षकों को नौकरी से हटाने का आदेश नहीं दिया है।

अदालत ने राज्य सरकार को भर्ती और पदोन्नति की प्रक्रिया कानून के अनुसार जारी रखने का निर्देश दिया है। साथ ही, नियुक्तियों और पदोन्नति को सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले के अंतिम निर्णय के अधीन रखा है।

यदि सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले के बाद आरक्षण रोस्टर, चयन सूची, नियुक्ति, वरिष्ठता या पदोन्नति में बदलाव जरूरी होता है, तो राज्य सरकार को कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई करनी होगी। इसका मतलब है कि मौजूदा शिक्षकों को फिलहाल राहत मिली है, लेकिन उनकी नियुक्तियों से जुड़े सभी विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।

Raish Ahmed

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