उत्तर प्रदेश शिक्षक पात्रता परीक्षा (UPTET) 2026 के अभ्यर्थियों को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने परीक्षा के दो विवादित सवालों को मूल्यांकन से बाहर करने का आदेश दिया है। ये दोनों सवाल ऐसे थे, जिनके दो-दो विकल्पों को उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग ने अंतिम उत्तर कुंजी में सही माना था। कोर्ट ने कहा कि ऐसे सवालों के आधार पर कुछ अभ्यर्थियों को अंक देना और बाकी को इससे वंचित रखना उचित नहीं है।
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने 28 अक्टूबर 2026 को कानपुर नगर के विजय सोनकर और तीन अन्य अभ्यर्थियों की याचिका पर यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने आयोग को प्रश्न संख्या 36 और 37 को मूल्यांकन से हटाने और परीक्षा को 150 के बजाय 148 प्रश्नों के आधार पर मानने का निर्देश दिया है। इस फैसले का लाभ केवल याचिकाकर्ताओं को नहीं, बल्कि सभी समान स्थिति वाले अभ्यर्थियों को मिलेगा।
UPTET 2026 के किन दो सवालों को हटाया गया?
यह विवाद UPTET 2026 के मास्टर प्रश्नपत्र के सवाल संख्या 36 और 37 से जुड़ा था। आयोग की अंतिम उत्तर कुंजी में प्रश्न संख्या 36 के विकल्प B और D, जबकि प्रश्न संख्या 37 के विकल्प A और D को सही माना गया था।
अभ्यर्थियों का कहना था कि जब एक सवाल के दो विकल्प सही स्वीकार किए गए हैं, तो केवल उन्हीं उम्मीदवारों को अंक देना उचित नहीं है जिन्होंने इन दोनों में से कोई एक विकल्प चुना था। जिन उम्मीदवारों ने दूसरे विकल्प चुने, उन्हें अंक नहीं दिए गए। याचियों ने मांग की थी कि दोनों सवालों को मूल्यांकन से हटाया जाए या सभी अभ्यर्थियों को समान लाभ दिया जाए।
आयोग की ओर से दलील दी गई कि याचियों ने सही माने गए विकल्प नहीं चुने थे और उन्होंने प्रोविजनल उत्तर कुंजी पर भी आपत्ति दर्ज नहीं कराई थी।
हालांकि, कोर्ट ने आयोग की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि जब परीक्षा कराने वाली संस्था खुद एक सवाल के दो उत्तर सही मानती है, तो उस सवाल का मूल्यांकन एक सही उत्तर वाले सामान्य बहुविकल्पीय सवाल की तरह नहीं किया जा सकता।
150 नहीं, 148 प्रश्नों के आधार पर होगी गणना
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि प्रश्न संख्या 36 और 37 को मूल्यांकन से बाहर किया जाएगा। इस तरह परीक्षा में कुल 148 प्रश्न ही मूल्यांकन के लिए रहेंगे। निर्धारित अर्हता प्रतिशत के अनुसार अब पास होने के मानक की गणना भी 148 प्रश्नों के आधार पर करनी होगी।
कोर्ट ने यह भी ध्यान दिलाया कि आयोग ने इसी परीक्षा में प्रश्न संख्या 38 को पहले ही मूल्यांकन से बाहर कर दिया था। ऐसे में प्रश्न संख्या 36 और 37 को अलग तरीके से देखने का कोई उचित आधार नहीं था।
अदालत ने UPTET 2018 से जुड़े शिमला सिंह मामले में दिए गए फैसले और सुप्रीम कोर्ट के अन्य निर्णयों का भी उल्लेख किया। कोर्ट के अनुसार, जब किसी सवाल में एक से अधिक सही उत्तर होने की स्थिति सामने आती है, तो उसे मूल्यांकन से हटाना सभी अभ्यर्थियों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित करने का उचित तरीका है।
याचिकाकर्ताओं के स्कोरकार्ड में पहले 82 अंकों के न्यूनतम अर्हता मानक के मुकाबले उनके अंक इससे कम थे। अब संशोधित मूल्यांकन में आयोग को निर्धारित प्रतिशत के आधार पर अर्हता मानक की दोबारा गणना करनी होगी।
आयोग को रिजल्ट और स्कोरकार्ड में करना होगा सुधार
कोर्ट ने आयोग को याचिकाकर्ताओं के अंकों की दोबारा गणना करने और जरूरत के अनुसार उनके परिणाम तथा स्कोरकार्ड में सुधार करने का निर्देश दिया है। साथ ही, समान स्थिति वाले सभी अभ्यर्थियों को भी इस फैसले का लाभ देने को कहा गया है।
इसका मतलब है कि संशोधित मूल्यांकन केवल उन चार उम्मीदवारों तक सीमित नहीं रहेगा, जिन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। सभी प्रभावित अभ्यर्थियों के परिणाम निर्धारित नियमों के अनुसार दोबारा तैयार करने होंगे।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि संशोधित परिणाम या पात्रता मिलने से किसी अभ्यर्थी को अपने आप शिक्षक पद पर नियुक्ति का अधिकार नहीं मिलेगा। नियुक्ति संबंधित भर्ती नियमों और अन्य पात्रता शर्तों के आधार पर ही होगी।
विशेष TET में शिक्षामित्रों को शामिल करने की मांग पर भी सुनवाई
इसी बीच, इलाहाबाद हाईकोर्ट में विशेष शिक्षक पात्रता परीक्षा (Special TET) में शिक्षामित्रों को शामिल करने की मांग से जुड़ा एक अलग मामला भी चल रहा है। इस मामले में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग से आगामी सामान्य TET परीक्षाओं का प्रस्तावित कार्यक्रम हलफनामे के माध्यम से मांगा है।
न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने वसीम अहमद सहित 221 शिक्षामित्रों की विशेष अपील पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया। मामले की अगली सुनवाई 2 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई है।
अपीलकर्ताओं ने 2 सितंबर 2026 को जारी शासनादेश और 3 सितंबर को प्रकाशित विज्ञापन को चुनौती दी है। उनका कहना है कि वे निर्धारित शैक्षणिक और प्रशिक्षण संबंधी योग्यताएं रखते हैं, लेकिन उन्हें विशेष TET में शामिल होने का अवसर नहीं दिया गया।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी है कि संविदा या दैनिक वेतन पर काम करने वाले विशेष शिक्षकों को परीक्षा में शामिल होने की अनुमति दी गई है, जबकि शिक्षामित्रों को इससे बाहर रखा गया है। उनके अनुसार, यह भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
पहले भी खारिज हो चुकी है शिक्षामित्रों की याचिका
विशेष TET में शामिल होने की मांग को लेकर शिक्षामित्र इससे पहले भी हाईकोर्ट पहुंचे थे। न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने 1 अक्टूबर 2026 को वसीम अहमद और 220 अन्य शिक्षामित्रों की याचिका खारिज कर दी थी।
एकल पीठ ने कहा था कि विशेष TET का उद्देश्य उन शिक्षकों को निर्धारित योग्यता पूरी करने का अवसर देना है, जो पहले से सेवा में हैं और जिन पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत TET पास करने की शर्त लागू होती है। शिक्षामित्रों की सेवा स्थिति नियमित रूप से कार्यरत शिक्षकों से अलग है। इसलिए केवल सामान्य TET में शामिल होने की पात्रता के आधार पर वे विशेष TET में शामिल होने का अधिकार नहीं मांग सकते।
इस फैसले के खिलाफ शिक्षामित्रों ने विशेष अपील दाखिल की है। अब खंडपीठ ने आयोग से आगामी सामान्य TET परीक्षाओं का कार्यक्रम मांगा है, ताकि यह पता चल सके कि शिक्षामित्रों को सामान्य परीक्षा में शामिल होने का अवसर कब मिल सकता है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि खंडपीठ ने अभी शिक्षामित्रों को विशेष TET में शामिल करने का अंतिम आदेश नहीं दिया है। फिलहाल आयोग से परीक्षा कार्यक्रम की जानकारी मांगी गई है और अपील पर सुनवाई जारी है।
UPTET अभ्यर्थियों और शिक्षामित्रों के लिए क्या है इसका मतलब?
UPTET 2026 के मामले में हाईकोर्ट का फैसला उन अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनका परिणाम दो विवादित सवालों के मूल्यांकन से प्रभावित हुआ था। अब आयोग को 148 प्रश्नों के आधार पर परिणाम की दोबारा गणना करनी होगी। इससे कुछ अभ्यर्थियों की अर्हता स्थिति बदल सकती है।
दूसरी ओर, विशेष TET का मामला उन शिक्षामित्रों के लिए महत्वपूर्ण है, जो विशेष परीक्षा में शामिल होने का अवसर मांग रहे हैं। उन्हें अब आयोग की ओर से सामान्य TET परीक्षाओं के प्रस्तावित कार्यक्रम और हाईकोर्ट की अगली सुनवाई का इंतजार है।
इस तरह इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने शिक्षक पात्रता से जुड़े दो अलग-अलग मुद्दे हैं। एक में परीक्षा के मूल्यांकन की गलती को सुधारने का निर्देश दिया गया है, जबकि दूसरे में शिक्षामित्रों की परीक्षा में भागीदारी को लेकर कानूनी विवाद अभी जारी है।



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