
सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act), 2009 के तहत निजी गैर-अनुदानित स्कूलों में कमजोर और वंचित वर्गों के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत आरक्षण को भारत की सामाजिक संरचना में बदलाव लाने वाला कदम बताया है। न्यायालय ने कहा कि इस प्रावधान को केवल एक कानूनी प्रक्रिया न मानकर एक राष्ट्रीय मिशन के रूप में लागू किया जाना चाहिए।
“समानता, स्वतंत्रता और भाईचारे को व्यवहार में लाने का माध्यम”
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने अपने निर्णय में कहा कि RTE Act की धारा 12 केवल प्रशासनिक प्रावधान नहीं है, बल्कि यह संविधान के बुनियादी मूल्यों—समानता, स्वतंत्रता और भाईचारे—को जमीन पर उतारने का सशक्त उपकरण है। अदालत ने कहा कि साझा विद्यालय प्रणाली का विचार अपने आप में बेहद महत्वाकांक्षी है।
उनके अनुसार, यह व्यवस्था उस भारत की कल्पना करती है जहाँ किसी भी जाति, वर्ग, लिंग या आर्थिक स्थिति से आने वाले बच्चे एक ही पड़ोस के स्कूल में साथ बैठकर पढ़ें।
“न्यायाधीश और ऑटो चालक का बच्चा एक ही बेंच पर पढ़ सकता है”
न्यायालय ने इस प्रावधान का महत्व समझाते हुए कहा कि धारा 12 इस विचार को वास्तविकता में बदलती है कि एक बहु-करोड़पति का बच्चा या सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश का बच्चा, एक ऑटो रिक्शा चालक या सड़क किनारे सामान बेचने वाले के बच्चे के साथ एक ही कक्षा में, एक ही बेंच पर बैठकर शिक्षा ग्रहण कर सकता है।
अदालत के अनुसार, यही वह मॉडल है जो समाज में बराबरी, सम्मान और भाईचारे को मजबूत कर सकता है।
साझा स्कूल व्यवस्था समाजिक असमानताओं को कम करने में महत्वपूर्ण
पीठ ने कहा कि साझा शिक्षा प्रणाली समाज में गहराई से जमी सामाजिक असमानताओं को खत्म करने का एक असरदार तरीका है। पड़ोस के स्कूल की अवधारणा को राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली का हिस्सा होना चाहिए। यह वही मॉडल है जिसे कोठारी आयोग ने वर्षों पहले सुझाया था— सभी बच्चे, चाहे उनका आर्थिक या सामाजिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो, एक ही स्कूल में पढ़ें और एक गैर-विभाजित माहौल में सीखें।
अदालत ने कहा कि स्कूल एक साझा नागरिक स्थल होना चाहिए, जहाँ जाति, वर्ग और लिंग की दीवारें स्वतः टूट जाएं और वास्तविक समानता का वातावरण बने।
मामला कैसे शुरू हुआ?
यह मामला 2016 में बॉम्बे हाईकोर्ट के एक आदेश से जुड़ा है, जिसमें याचिकाकर्ता ने अपने बच्चों के लिए RTE के तहत 25% निःशुल्क शिक्षा कोटा में प्रवेश की मांग की थी।
हाईकोर्ट ने याचिका यह कहकर खारिज कर दी थी कि याचिकाकर्ता ने आवेदन ही गलत श्रेणी में भरा था। ऐसे मामलों में राहत देने से अदालतों में इसी तरह की याचिकाएँ बढ़ेंगी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा—व्यक्तिगत राहत अब संभव नहीं, पर बड़ा मुद्दा ज़रूरी
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आठ साल बीत जाने के बाद इस मामले में व्यक्तिगत राहत देना अब संभव नहीं है। इसके बावजूद अदालत ने इसे एक महत्वपूर्ण जनहित का मुद्दा मानते हुए RTE के क्रियान्वयन पर व्यापक चर्चा को ज़रूरी बताया।
अदालत ने कहा कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि भविष्य में किसी भी अभिभावक को ऑनलाइन या अन्य प्रक्रियात्मक त्रुटियों की वजह से अपने बच्चे के अधिकार से वंचित न होना पड़े।
25% आरक्षण सही तरीके से लागू हुआ तो समाज में आएगा बड़ा बदलाव
पीठ ने इशारा किया कि यदि धारा 12 को संवेदनशील और प्रभावी तरीके से लागू किया जाए तो वंचित वर्ग के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलेगी, समाज में आपसी समझ और सम्मान बढ़ेगा , भाईचारे की भावना मजबूत होगी।
अगली सुनवाई 6 अप्रैल 2026 को
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल 2026 के लिए निर्धारित की है, जहां धारा 12 के अनुपालन की प्रभावशीलता पर विस्तृत समीक्षा की जाएगी।




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