
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार की ओर से दिल्ली स्कूल एजुकेशन एक्ट 2025 को मौजूदा शैक्षणिक सत्र में लागू करने के तरीके पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने साफ किया है कि वह कानून के वैध उद्देश्यों में दखल नहीं देना चाहती, लेकिन यह भी कहा कि किसी भी कानून का क्रियान्वयन तय वैधानिक समयसीमा और व्यावहारिकता के अनुरूप होना चाहिए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकार के वकील को निर्देश दिया कि वह इस मामले में स्पष्ट निर्देश लेकर अगली तारीख पर कोर्ट को जानकारी दें। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार से यह भी पूछा कि सत्र 2025–26 के लिए पहले से लागू कानून के तहत स्कूल फीस को किस प्रक्रिया से मंजूरी दी गई थी। साथ ही यह सवाल भी उठाया कि नया अधिनियम सत्र 2025–26 पर पूर्व प्रभाव (रेट्रोस्पेक्टिव) से कैसे लागू किया जा सकता है। इस मामले की अगली सुनवाई 27 जनवरी को तय की गई है।
समयसीमा पर उठे सवाल
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह अधिनियम भले ही एक वैध रेगुलेटरी उद्देश्य से लाया गया हो, लेकिन इसके अमल के लिए जो समयसीमा अपनाई जा रही है, वह संदेह पैदा करती है। अदालत ने कहा कि मौजूदा शैक्षणिक सत्र पहले ही शुरू हो चुका है, ऐसे में बीच सत्र में नियमों को लागू करना व्यावहारिक मुश्किलें खड़ी कर सकता है।
निजी स्कूल संगठनों की याचिकाओं पर सुनवाई
यह टिप्पणी उस समय आई जब सुप्रीम कोर्ट निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों के संगठनों की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था। इन याचिकाओं में दिल्ली स्कूल एजुकेशन एक्ट 2025 के क्रियान्वयन और इससे जुड़े एक सर्कुलर को चुनौती दी गई है। इस सर्कुलर के तहत स्कूल स्तर पर समितियों के गठन और प्रस्तावित फीस को मंजूरी देने की प्रक्रिया तय की गई है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि नए नियमों को बिना पर्याप्त तैयारी और स्पष्ट दिशा-निर्देशों के लागू करने से स्कूलों के कामकाज और अभिभावकों दोनों पर असर पड़ सकता है।
फीस बढ़ोतरी पर रोक और सख्त प्रावधान
गौरतलब है कि दिल्ली स्कूल एजुकेशन एक्ट 2025 का उद्देश्य राजधानी में निजी स्कूलों द्वारा मनमानी फीस बढ़ोतरी पर रोक लगाना है। कानून में स्कूल फीस की सीमा तय करने, फीस वसूली में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और अभिभावकों व छात्रों को अनावश्यक परेशान करने पर सख्त कार्रवाई का प्रावधान किया गया है।
अधिनियम के तहत नियमों का उल्लंघन करने वाले स्कूलों पर 50,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। यदि कोई स्कूल बार-बार नियम तोड़ता है और जुर्माना अदा करने में विफल रहता है, तो सरकार को उसकी संपत्ति को सील करने और नीलाम करने तक का अधिकार दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय पर आई है, जब स्कूल फीस को लेकर अभिभावकों और स्कूल प्रबंधन के बीच विवाद लगातार सामने आ रहे हैं। अब सबकी नजरें 27 जनवरी की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह साफ हो सकता है कि नया कानून किस तरह और किस समयसीमा में लागू किया जाएगा।




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