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महिला की मर्जी अहम: सुप्रीम कोर्ट ने गर्भपात पर रिप्रोडक्टिव ऑटोनॉमी को माना सर्वोपरि

महिला की मर्जी अहम: सुप्रीम कोर्ट ने गर्भपात पर रिप्रोडक्टिव ऑटोनॉमी को माना सर्वोपरि

महिला की मर्जी अहम: सुप्रीम कोर्ट ने गर्भपात पर रिप्रोडक्टिव ऑटोनॉमी को माना सर्वोपरि

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में महिलाओं के अधिकारों को लेकर साफ संदेश दिया है कि किसी भी महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने रिप्रोडक्टिव ऑटोनॉमी यानी प्रजनन संबंधी स्वतंत्रता को संविधान से जुड़ा मौलिक अधिकार बताते हुए 30 सप्ताह की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति दी है। इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि महिला का अपने शरीर और जीवन से जुड़े फैसले लेने का अधिकार, अजन्मे भ्रूण के अधिकारों से अधिक महत्वपूर्ण है।

अदालत ने अपने फैसले में दोहराया कि रिप्रोडक्टिव ऑटोनॉमी केवल एक कानूनी अवधारणा नहीं, बल्कि महिला की गरिमा, स्वतंत्रता और व्यक्तिगत पसंद से जुड़ा अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है, जिसमें अपने शरीर, यौन जीवन और प्रजनन से जुड़े फैसले लेने की आज़ादी भी शामिल है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई फैसलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि राज्य या समाज किसी महिला पर उसके निजी निर्णय थोप नहीं सकता।

रिप्रोडक्टिव ऑटोनॉमी का कानूनी आधार मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 में मिलता है। यह कानून महिलाओं को सुरक्षित और कानूनी तरीके से गर्भपात कराने की अनुमति देता है। समय के साथ इस कानून में बदलाव किए गए ताकि महिलाओं की बदलती सामाजिक और चिकित्सीय जरूरतों को बेहतर ढंग से समझा जा सके। साल 2021 में किए गए संशोधन के बाद इस कानून का दायरा और व्यापक हुआ।

संशोधित एमटीपी एक्ट के तहत अब विशेष परिस्थितियों में 24 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था को भी समाप्त करने की अनुमति दी जा सकती है। इसमें महिला के शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य को खतरा, भ्रूण में गंभीर असामान्यता या अन्य असाधारण परिस्थितियां शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ताजा आदेश में इन्हीं प्रावधानों और महिला की सहमति को सबसे अहम आधार माना।

कानूनी जानकारों के मुताबिक, यह फैसला महिलाओं के अधिकारों की दिशा में एक बड़ा कदम है। इससे यह संदेश जाता है कि कानून महिला को केवल मां के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में देखता है, जिसे अपने जीवन से जुड़े अहम फैसले लेने का पूरा हक है। यह फैसला आने वाले समय में ऐसे मामलों के लिए एक मजबूत मिसाल माना जा रहा है, जहां महिला की इच्छा और उसकी सेहत को प्राथमिकता देना जरूरी है।

Asmita Sarkar

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