
राजधानी दिल्ली में स्कूलों की प्रवेश प्रक्रिया के बीच Delhi High Court ने एक अहम फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि बच्चों को शिक्षा का अधिकार तो है, लेकिन इसके तहत किसी खास या पसंदीदा स्कूल में दाखिला पाने का अधिकार शामिल नहीं है। 25 मार्च को मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ ने यह फैसला दिया, जिसे अभिभावकों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टता के तौर पर देखा जा रहा है।
क्या कहा कोर्ट ने
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि Right to Education Act 2009 एक कल्याणकारी कानून है, जिसका मकसद हर बच्चे को शिक्षा तक पहुंच देना और स्कूलों को सामाजिक भेदभाव से मुक्त बनाना है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि अभिभावक अपने बच्चे के लिए किसी विशेष स्कूल में प्रवेश का दावा कर सकते हैं।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शिक्षा का अधिकार “स्कूल चुनने का अधिकार” नहीं है, बल्कि “शिक्षा पाने का अधिकार” है।
मामला क्या था
यह मामला एक महिला की याचिका से जुड़ा था, जिसने अपने बच्चे को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) कोटे के तहत एक निजी स्कूल में दाखिला दिलाने की मांग की थी। 2023-24 सत्र में कक्षा 1 के लिए आवेदन किया गया था, लेकिन स्कूल ने प्रवेश नहीं दिया, जिसके बाद मामला अदालत पहुंचा।
सिंगल जज की सुनवाई में यह माना गया कि स्कूल के पास इनकार करने का ठोस आधार नहीं था, लेकिन शैक्षणिक सत्र समाप्त हो जाने के कारण अगले सत्र में सीधे दाखिला देने से इनकार कर दिया गया।
अपील में क्या हुआ
बाद में याचिकाकर्ता ने डिवीजन बेंच में अपील कर मांग की कि बच्चे को 2024-25 सत्र में उसी स्कूल में कक्षा 2 में दाखिला दिया जाए। हालांकि अदालत ने इस मांग को खारिज कर दिया और कहा कि एक बार सत्र खत्म होने के बाद उसी स्कूल में दाखिले का अधिकार स्वतः समाप्त हो जाता है, खासकर जब बीच में कोई अंतरिम राहत या सीट सुरक्षित नहीं की गई हो।
शिक्षा विभाग की भूमिका
मामले के दौरान शिक्षा निदेशालय (DoE) ने बच्चे को एक दूसरे स्कूल में दाखिले का विकल्प दिया था, जो अभिभावक द्वारा चुनी गई प्राथमिकताओं में शामिल था। इसके बावजूद अभिभावक ने उस विकल्प को स्वीकार नहीं किया और केवल उसी निजी स्कूल में प्रवेश की मांग पर अड़े रहे।
सुनवाई के दौरान DoE ने सरकारी या नगर निगम स्कूल में दाखिला देने की भी पेशकश की, लेकिन इसे भी ठुकरा दिया गया।
ड्रॉ ऑफ लॉट्स पर विवाद
अभिभावक का दावा था कि मार्च 2023 में ड्रॉ ऑफ लॉट्स के जरिए बच्चे का चयन हुआ था, लेकिन डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन के दौरान स्कूल ने प्रवेश देने से इनकार कर दिया। बाद में स्कूल ने यह तर्क दिया कि पहले सामान्य श्रेणी की सीटें भरी जाएंगी, उसके बाद EWS कोटे के तहत दाखिला होगा। इसी विवाद को लेकर अदालत में याचिका दायर की गई थी।
फैसले का क्या मतलब
इस फैसले ने एक महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट कर दी है—शिक्षा का अधिकार हर बच्चे को स्कूल तक पहुंच की गारंटी देता है, लेकिन यह किसी विशेष या मनपसंद स्कूल में सीट सुनिश्चित नहीं करता।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह फैसला आने वाले समय में ऐसे मामलों के लिए एक मार्गदर्शक की तरह काम करेगा और अभिभावकों को यह समझने में मदद करेगा कि RTE के तहत अधिकारों की सीमा क्या है।




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