
गर्भवती महिला IPS अधिकारी उर्वशी सेंगर से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल उन्हें चल रही प्रशिक्षण प्रक्रिया में शामिल करने का आदेश देने से इनकार कर दिया है। हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि उनकी वरिष्ठता (Seniority) पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। साथ ही, अदालत ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) को निर्देश दिया है कि वह इस मामले की मूल याचिका पर कानून और तथ्यों के आधार पर जल्द सुनवाई करे।
यह मामला केवल एक अधिकारी के प्रशिक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि गर्भवती महिला IPS अधिकारियों के प्रशिक्षण से जुड़े 1993 के गृह मंत्रालय के नियम की वैधता पर भी महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि वर्तमान प्रशिक्षण सत्र का लगभग तीन सप्ताह का हिस्सा पूरा हो चुका है। ऐसे में इस चरण में अधिकारी को प्रशिक्षण में शामिल करना व्यावहारिक नहीं होगा, क्योंकि वह पूरे प्रशिक्षण का लाभ नहीं ले पाएंगी।
हालांकि, केंद्र सरकार ने अदालत को भरोसा दिलाया कि उर्वशी सेंगर की वरिष्ठता पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस आश्वासन को अपने आदेश का हिस्सा बनाया।
क्या है पूरा मामला?
उर्वशी सेंगर 2023 बैच की मध्य प्रदेश कैडर की IPS अधिकारी हैं। उन्होंने नवंबर 2023 में प्रशिक्षण का पहला चरण (Phase-I) पूरा किया। अप्रैल 2025 में Phase-II प्रशिक्षण के दौरान उनके गर्भवती होने की जानकारी पुलिस अकादमी को दी गई।
इसके बाद उन्हें 23 अगस्त 1993 के गृह मंत्रालय के कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) का हवाला देते हुए प्रशिक्षण बीच में छोड़ने को कहा गया। इस नियम के अनुसार यदि कोई महिला IPS प्रोबेशनर प्रशिक्षण के दौरान गर्भवती हो जाती है, तो उसका प्रशिक्षण रोक दिया जाता है और वह प्रसव के एक वर्ष बाद अगले बैच के साथ प्रशिक्षण पूरा कर सकती है। इस अवधि को असाधारण अवकाश (Extraordinary Leave) माना जाता है।
सितंबर 2025 में बच्चे के जन्म के बाद उर्वशी सेंगर ने मेडिकल फिटनेस के आधार पर बचा हुआ प्रशिक्षण पूरा करने की अनुमति मांगी, लेकिन सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी ने 1993 के नियम का हवाला देते हुए उनकी मांग अस्वीकार कर दी।
CAT से हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
इसके बाद उर्वशी सेंगर ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) का रुख किया। CAT ने 27 मई 2026 को अंतरिम आदेश देते हुए मेडिकल औपचारिकताएं पूरी होने की शर्त पर उन्हें प्रशिक्षण में शामिल करने की अनुमति दे दी थी।
हालांकि, पुलिस अकादमी ने इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने 22 जून 2026 को CAT के आदेश पर रोक लगा दी और कहा कि यह नियम महिला अधिकारी और उसके बच्चे दोनों के हितों को ध्यान में रखकर बनाया गया है।
इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उठाए अहम सवाल
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि यदि कोई महिला अधिकारी चिकित्सकीय रूप से पूरी तरह फिट है, तो केवल गर्भावस्था के आधार पर उसे प्रशिक्षण से क्यों रोका जाना चाहिए?
पीठ ने यह भी कहा कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए नियमों का उपयोग उनके अधिकार सीमित करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि हर महिला की मेडिकल स्थिति अलग होती है, इसलिए एक ही नियम सभी मामलों पर समान रूप से लागू करना उचित नहीं माना जा सकता।
केंद्र सरकार ने क्या कहा?
केंद्र सरकार ने अदालत में दलील दी कि यदि एक अधिकारी को विशेष छूट दी जाती है, तो भविष्य में ऐसे कई मामलों में समान मांगें उठ सकती हैं।
वहीं, उर्वशी सेंगर की ओर से पेश वकील ने कहा कि पहले भी कुछ मामलों में महिला अधिकारियों को राहत दी जा चुकी है। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने यह भी कहा कि इस विवाद से जुड़ी हाईकोर्ट में लंबित कार्यवाही वापस लेने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
1993 का नियम क्यों बना बहस का विषय?
याचिका में कहा गया है कि तीन दशक पुराने इस नियम की समीक्षा वर्तमान चिकित्सा विज्ञान और व्यक्तिगत मेडिकल फिटनेस के आधार पर की जानी चाहिए। इसमें यह भी तर्क दिया गया है कि Phase-II प्रशिक्षण मुख्य रूप से कक्षा आधारित अध्ययन, अकादमिक मॉड्यूल और संस्थागत प्रशिक्षण पर आधारित होता है, जिसमें अत्यधिक शारीरिक गतिविधियां नहीं होतीं।
याचिकाकर्ता ने यह भी उल्लेख किया है कि 2004 में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने महिला IAS अधिकारियों के लिए इसी प्रकार के नियमों में बदलाव कर दिया था। अब मेडिकल फिटनेस के आधार पर महिला IAS प्रोबेशनरों को प्रशिक्षण पूरा करने की अनुमति दी जाती है। ऐसे में IPS अधिकारियों के लिए 1993 का पुराना नियम जारी रहना समानता के सिद्धांत पर भी सवाल खड़े करता है।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम राहत देने से इनकार किया है, लेकिन मामले के मूल मुद्दे पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है। अब CAT इस याचिका पर विस्तृत सुनवाई करेगा और यह तय करेगा कि 1993 का नियम मौजूदा परिस्थितियों, आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था और संवैधानिक समानता के सिद्धांतों के अनुरूप है या नहीं।
यह फैसला भविष्य में गर्भवती महिला IPS अधिकारियों के प्रशिक्षण और सेवा नियमों को लेकर महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।




Add comment