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MBA का क्रेज घटा? 2026 में दुनिया भर में 13% कम हुए आवेदन, भारतीय छात्रों की पसंद बदली

MBA Admission 2026: बेहतर नौकरी, अच्छी सैलरी और बड़े पदों पर पहुंचने के लिए एमबीए (MBA) को लंबे समय से एक लोकप्रिय डिग्री माना जाता रहा है। लेकिन अब इस डिग्री को लेकर छात्रों की प्राथमिकताएं बदलती दिखाई दे रही हैं। पढ़ाई पर होने वाला भारी खर्च, नौकरी के बाजार में अनिश्चितता और डिग्री के मुकाबले मिलने वाले फायदे को लेकर बढ़ती चिंता के बीच दुनिया भर में एमबीए के लिए आवेदन करने वाले छात्रों की संख्या में गिरावट दर्ज की गई है।

ग्रेजुएट मैनेजमेंट एडमिशन काउंसिल (GMAC) की अक्टूबर 2026 में जारी Application Trends Survey 2026 रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दो वर्षों में बढ़ोतरी के बाद 2026 में दुनियाभर में एमबीए कार्यक्रमों के लिए आवेदनों में 13 प्रतिशत की कमी आई है। करीब दो-तिहाई बिजनेस स्कूलों ने अपने यहां एमबीए आवेदनों में गिरावट दर्ज की है। रिपोर्ट में इसे पिछले एक दशक में गिरावट की सबसे बड़ी हिस्सेदारी बताया गया है।

यह बदलाव केवल एमबीए तक सीमित नहीं है। ग्रेजुएट मैनेजमेंट एजुकेशन (GME) के सभी कार्यक्रमों को मिलाकर देखें तो 2026 में वैश्विक आवेदनों में 10 प्रतिशत की गिरावट आई है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि मैनेजमेंट की पढ़ाई की मांग पूरी तरह खत्म हो रही है। रिपोर्ट बताती है कि छात्रों की पसंद, पढ़ाई के तरीके और विदेश में शिक्षा हासिल करने के लिए चुने जाने वाले देशों में बदलाव हो रहा है।

दो साल की बढ़ोतरी के बाद एमबीए आवेदनों में गिरावट

GMAC के आंकड़ों के अनुसार, 2024 और 2025 में वैश्विक एमबीए आवेदनों में क्रमशः 13 प्रतिशत और 2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी। लेकिन 2026 में यह रुझान बदल गया और आवेदनों में 13 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।

खास बात यह है कि आवेदन कम होने का असर किसी एक तरह के एमबीए कोर्स तक सीमित नहीं रहा। दो साल के फुल टाइम एमबीए कार्यक्रमों में आवेदनों की संख्या 13 प्रतिशत घटी, जबकि एक साल के एमबीए कोर्स में 11 प्रतिशत की कमी आई।

इसी तरह एग्जीक्यूटिव एमबीए में 18 प्रतिशत, फ्लेक्सिबल एमबीए में 23 प्रतिशत, ऑनलाइन एमबीए में 9 प्रतिशत और पार्ट टाइम एमबीए में 15 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि छात्र केवल पारंपरिक क्लासरूम पढ़ाई के बजाय ऑनलाइन या कम अवधि वाले कोर्स की तरफ नहीं जा रहे हैं, बल्कि एमबीए में दाखिला लेने के अपने फैसले पर भी दोबारा विचार कर रहे हैं।

विदेशी छात्रों के आवेदनों में भी बड़ी गिरावट

एमबीए के लिए अंतरराष्ट्रीय छात्रों की दिलचस्पी में आई कमी भी इस बदलाव का एक बड़ा संकेत है। GMAC की रिपोर्ट के अनुसार, दो साल के फुल टाइम एमबीए कार्यक्रमों में अंतरराष्ट्रीय उम्मीदवारों के आवेदनों में 28 प्रतिशत की गिरावट आई है। इसके मुकाबले घरेलू उम्मीदवारों के आवेदनों में 11 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।

इसका एक बड़ा कारण अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों की बदलती वीजा और इमिग्रेशन नीतियों को माना जा रहा है। इसके अलावा भू-राजनीतिक तनाव, आर्थिक अनिश्चितता और नौकरी के सीमित अवसर भी विदेशी यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने के फैसले को प्रभावित कर रहे हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में ग्रेजुएट मैनेजमेंट कार्यक्रमों के कुल आवेदनों में 25 प्रतिशत की गिरावट आई है। ब्रिटेन और कनाडा में भी आवेदनों में कमी दर्ज की गई। इसके विपरीत यूरोप (ब्रिटेन को छोड़कर) और पूर्वी एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के बिजनेस स्कूलों में आवेदनों की संख्या बढ़ी है।

भारतीय छात्रों की पसंद में बदलाव, यूरोप और एशिया बन रहे नए विकल्प

विदेश में एमबीए करने की योजना बनाने वाले भारतीय छात्रों की पसंद में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। पहले बड़ी संख्या में भारतीय उम्मीदवार अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों को प्राथमिकता देते थे, लेकिन अब यूरोप और एशिया के बिजनेस स्कूल भी उनकी पसंद में शामिल हो रहे हैं।

GMAC की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटेन को छोड़कर यूरोप के आधे से अधिक बिजनेस स्कूलों ने भारत को अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए अपना सबसे बड़ा स्रोत बताया है। पूर्वी और दक्षिण-पूर्व एशिया के 39 प्रतिशत कार्यक्रमों ने भी भारतीय छात्रों को अपने यहां अंतरराष्ट्रीय उम्मीदवारों का सबसे बड़ा समूह बताया।

इसके उलट अमेरिका के 41 प्रतिशत बिजनेस स्कूलों ने कहा कि भारतीय उम्मीदवारों के आवेदनों में उनके यहां सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई है।

भारत के भीतर भी एमबीए और दूसरे मैनेजमेंट कार्यक्रमों के प्रति आवेदन करने वाले छात्रों की संख्या में कमी आई है। फाइनेंशियल एक्सप्रेस की 2 नवंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में मैनेजमेंट कार्यक्रमों के कुल आवेदनों में 10 प्रतिशत की गिरावट आई है। घरेलू उम्मीदवारों के आवेदनों में 11 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई, जबकि सर्वे में शामिल करीब 60 प्रतिशत भारतीय मैनेजमेंट कार्यक्रमों ने आवेदन घटने की जानकारी दी।

इससे साफ है कि बदलाव केवल विदेशी यूनिवर्सिटी के चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत में भी छात्र एमबीए और मैनेजमेंट की पढ़ाई के विकल्पों पर नए सिरे से विचार कर रहे हैं।

पढ़ाई का खर्च और नौकरी की अनिश्चितता बन रहे बड़ी वजह

एमबीए आवेदनों में गिरावट के पीछे कई आर्थिक और व्यावहारिक कारण हैं। किसी प्रतिष्ठित बिजनेस स्कूल से एमबीए करने के लिए छात्रों को बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है। इसके अलावा दो साल के फुल टाइम कोर्स के दौरान कई उम्मीदवारों को अपनी नौकरी भी छोड़नी पड़ती है।

ऐसे में ट्यूशन फीस, रहने का खर्च, एजुकेशन लोन का ब्याज और नौकरी से मिलने वाली संभावित आय का नुकसान भी कुल खर्च में जुड़ जाता है। दूसरी ओर, पढ़ाई पूरी होने के बाद मनचाही नौकरी और बेहतर सैलरी मिलने की कोई गारंटी नहीं होती।

इसी वजह से उम्मीदवार अब एमबीए में दाखिला लेने से पहले यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि डिग्री पर खर्च की गई रकम के मुकाबले उन्हें कितना फायदा मिलेगा। इसे ही रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट (ROI) कहा जाता है।

GMAC की रिपोर्ट में भी इस बदलाव का जिक्र किया गया है। संगठन के अनुसार, उम्मीदवार अब मैनेजमेंट की डिग्री में निवेश करने से पहले उसकी लागत, नौकरी के अवसर और भविष्य में मिलने वाले लाभ को पहले से अधिक गंभीरता से देख रहे हैं।

बड़े और प्रतिष्ठित बिजनेस स्कूलों पर कम पड़ा असर

एमबीए आवेदनों में गिरावट का असर सभी बिजनेस स्कूलों पर एक जैसा नहीं रहा है। जिन संस्थानों में दाखिला प्रक्रिया अधिक प्रतिस्पर्धी है, वहां आवेदनों में अपेक्षाकृत कम कमी दर्ज की गई है।

GMAC सर्वे के आंकड़ों के विश्लेषण के अनुसार, ऐसे एमबीए कार्यक्रमों में आवेदनों में करीब 9 प्रतिशत की गिरावट आई, जहां 40 प्रतिशत से कम उम्मीदवारों को प्रवेश मिलता है। वहीं, ऐसे संस्थानों में जहां 85 प्रतिशत से अधिक आवेदकों को दाखिला मिलता है, वहां आवेदनों में 21 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।

इससे संकेत मिलता है कि प्रतिष्ठित और अधिक चयन प्रक्रिया वाले बिजनेस स्कूलों में छात्रों की दिलचस्पी अपेक्षाकृत बनी हुई है, जबकि कम चयनात्मक संस्थानों को ज्यादा चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि, इन आंकड़ों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि हर प्रतिष्ठित संस्थान में आवेदन या दाखिले की स्थिति समान है।

क्या एमबीए की डिग्री का महत्व कम हो रहा है?

एमबीए आवेदनों में गिरावट को इस डिग्री की उपयोगिता खत्म होने के रूप में देखना सही नहीं होगा। GMAC की रिपोर्ट बताती है कि मैनेजमेंट शिक्षा के प्रति छात्रों की सोच और उनकी पसंद में बदलाव आ रहा है। अब उम्मीदवार केवल डिग्री हासिल करने के बजाय ऐसे कोर्स चाहते हैं, जिनसे उन्हें नौकरी के लिए जरूरी कौशल और बेहतर करियर के अवसर मिल सकें।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि वैश्विक आवेदनों में कमी के बावजूद बिजनेस स्कूलों में दाखिला पाने वाले विद्यार्थियों की शैक्षणिक योग्यता, औसत क्लास साइज और प्रवेश की प्रतिस्पर्धा में कोई बड़ी गिरावट नहीं आई है।

ऐसे में आने वाले वर्षों में एमबीए संस्थानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती छात्रों को अपनी पढ़ाई की गुणवत्ता, फीस, प्लेसमेंट और करियर से जुड़े वास्तविक लाभ के बारे में भरोसेमंद जानकारी देना होगा। वहीं, छात्रों के लिए भी किसी संस्थान का चुनाव केवल उसकी लोकप्रियता या बड़े पैकेज के दावों के आधार पर करने के बजाय फीस, पाठ्यक्रम, प्लेसमेंट रिकॉर्ड और भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखकर करना जरूरी होगा।

Raish Ahmed

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