
मुंबई के एक बड़े कॉरपोरेट दफ़्तर में तीन अलग-अलग पीढ़ियों की तस्वीर साफ दिखाई देती है। बोर्डरूम में बैठे 64 वर्षीय चेयरमैन उत्तराधिकार योजना की बारीकी पर नजर टिकाए हुए हैं। उसी मंज़िल पर 37 साल का मिलेनियल बिजनेस हेड एट्रिशन, एआई इंटीग्रेशन और तिमाही लक्ष्यों की चुनौती से जूझ रहा है। कॉरिडोर में आगे, 23 वर्ष की जेन Z कर्मचारी अपने स्किल डैशबोर्ड को हर घंटे रीफ्रेश करते हुए सोच रही है—क्या वह यहां लंबे समय तक रह पाएगी?
कागज़ पर भारतीय कॉरपोरेट ढांचा स्थिर और व्यवस्थित दिखता है। बूमर्स नेतृत्व में हैं, मिलेनियल्स मैनेजमेंट का भार उठा रहे हैं और जेन Z तेजी से एंट्री-लेवल रोल्स में आ रही है। लेकिन इस संरचना के अंदर एक बड़ा सवाल छिपा है—क्या युवा पीढ़ी वास्तव में वही सिस्टम संभालना चाहती है, जिसे वह विरासत में पा रही है?
अगली पंक्ति कौन संभालेगा?
लिबरलाइजेशन के दौर में कंपनियां खड़ी करने वाले बूमर्स आज भी बोर्डरूम में निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। 30–45 वर्ष के मिलेनियल्स ऑपरेशनल नेतृत्व का मुख्य आधार हैं। वहीं, जेन Z देश की नई हायरिंग में सबसे तेजी से बढ़ता समूह बन चुकी है।
लेकिन समस्या यहां से शुरू होती है। Deloitte के 2025 सर्वे के अनुसार, जेन Z में केवल 6% ही सीनियर लीडरशिप तक पहुंचना चाहती है। मिलेनियल्स की स्थिति भी आसान नहीं है—40% से अधिक लगातार तनाव की स्थिति में काम करते हैं। दोनों पीढ़ियों का मानना है कि वर्क-लाइफ बैलेंस प्रमोशन जितना ही महत्वपूर्ण है। यानी कॉरपोरेट सिस्टम को लीडर चाहिए, लेकिन लीडर बनना अब युवाओं की प्राथमिकता नहीं।
मिलेनियल्स का दबाव: महत्वाकांक्षा घटी, जिम्मेदारियां बढ़ीं
वर्तमान में कॉरपोरेट ढांचे का सबसे कठिन चरण मिलेनियल्स ही झेल रहे हैं। एआई की तेजी से बढ़ती मौजूदगी ने उन्हें नौकरी की असुरक्षा में धकेला है। सर्वे बताते हैं कि हर पांच में से एक मिलेनियल अपनी नौकरी को लेकर असुरक्षित है। करीब आधे कर्मचारियों को लगता है कि अगले 3–5 साल में एआई उनके रोल पर असर डाल सकता है।
नई स्किल्स सीखना भी आसान नहीं। केवल 40% कर्मचारी ही अपस्किल कर पाने की स्थिति में हैं। दूसरी ओर, परिवार, बच्चों की पढ़ाई और बुजुर्ग माता-पिता की जिम्मेदारियां मानसिक दबाव को और बढ़ाती हैं। वे सीख रहे हैं, दौड़ रहे हैं, बदल रहे हैं—लेकिन महत्वाकांक्षा अब पहले जैसी नहीं रही। यह मेहनत जुनून से ज्यादा मजबूरी बनती जा रही है।
जेन Z की चाहत: स्किल्स, लचीलापन और उद्देश्य
महामारी, सोशल मीडिया और जलवायु संकट के दौर से गुजरी जेन Z, नेतृत्व को पुराने नजरिए से नहीं देखती। उनके लिए पद से ज्यादा स्किल्स मायने रखते हैं, प्रतिष्ठा से ज्यादा लचीलापन और स्थायित्व से ज्यादा उद्देश्य। उनके लिए लीडरशिप का अर्थ है समझ, बैलेंस और स्पष्टता। ऐसा नेतृत्व जो जीवन को निगलने के बजाय जीवन के साथ चल सके। इसलिए वे भारी जिम्मेदारी वाले रोल से अक्सर दूरी बनाती हैं।
बूमर्स: अनुभव का पहाड़, समय की कमी
1946–1964 के बीच पैदा हुए बूमर्स अनुभव का विशाल भंडार लेकर बोर्डरूम में सक्रिय हैं, लेकिन उम्र जिस गति से बढ़ रही है, उनकी उपलब्धता उसी गति से घट रही है। बिजनेस लीडर हार्श मारीवाला का मानना है कि किसी भी संस्था के लिए संस्कृति और नेतृत्व की निरंतरता ही लंबी सफलता तय करती है—लेकिन यह तभी संभव है जब अगली पीढ़ी नेतृत्व की भूमिका लेने को तैयार हो।
एआई ने नेतृत्व की जमीन ही बदल दी
McKinsey की रिपोर्ट बताती है कि एआई एंट्री-लेवल काम को तेजी से बदल रहा है। पहले जो सीख अनुभव से आती थी, अब वह ऑटोमेशन की वजह से कम हो रही है।
इसका मतलब है कि भविष्य के लीडर कम उम्र में लेकिन ज्यादा तकनीकी और गहरी स्किल्स के साथ तैयार होंगे। हाइरार्की घटेगी और स्किल-आधारित नेतृत्व बढ़ेगा।
तो क्या कॉरपोरेट इंडिया तैयार है?
आने वाला समय तीनों पीढ़ियों के सहयोग पर टिका होगा। बूमर्स अपना विज़न देंगे, मिलेनियल्स स्थिरता और संस्कृति को संभालेंगे और जेन Z डिजिटल स्पीड तथा नई वैल्यूज लाएगी। नेतृत्व अब पद पर नहीं, बल्कि क्षमता पर आधारित होगा—कम आदेशात्मक, ज्यादा सहयोगी और अधिक लचीला। अब असली सवाल यही है—क्या हम ऐसा नेतृत्व मॉडल बना रहे हैं जिसे अगली पीढ़ी वास्तव में अपनाना चाहती है?




Add comment