
दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (DUTA) के पूर्व अध्यक्ष आदित्य नारायण मिश्र ने देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में जल्दी होने वाले व्यापक बदलावों को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि केंद्र सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में एक नया बिल पेश करने की तैयारी कर रही है, जो विश्वविद्यालयों के शासन, ढांचे और कामकाज को पूरी तरह बदल सकता है।
हालांकि बिल का विवरण अभी सार्वजनिक नहीं है, लेकिन शिक्षकों का मानना है कि यह प्रस्ताव नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 के मॉडल पर आधारित होगा। मिश्र के अनुसार, इस कानून के लागू होते ही विश्वविद्यालयों के मौजूदा एक्ट, नियम और ऑर्डिनेंस स्वतः खत्म हो जाएंगे, और पूरा प्रशासनिक ढांचा नए प्रावधानों के अनुसार बनाया जाएगा—चाहे वह शिक्षकों की सेवा शर्तें हों, स्टाफ स्ट्रक्चर हो या कोर्स डिजाइन करने की प्रक्रिया।
विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर खतरे की आशंका
मिश्र ने चेतावनी दी कि NEP में सुझाई गई बोर्ड ऑफ गवर्नर्स (BoG) जैसी व्यवस्था निजी संस्थानों में लागू होती है। यदि यही मॉडल सरकारी विश्वविद्यालयों पर लागू किया गया, तो यह उच्च शिक्षा प्रणाली में निजीकरण का बड़ा कदम साबित हो सकता है।
उन्होंने कहा कि सुधारों के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन इतने बड़े बदलावों को बिना व्यापक चर्चा और पारदर्शिता के लागू करना ठीक नहीं होगा। उन्होंने सरकार से अपील की कि प्रस्तावित बिल को सार्वजनिक किया जाए और शिक्षकों, छात्रों सहित सभी हितधारकों से राय ली जाए।
दिल्ली विश्वविद्यालय में गहराता हुआ वित्तीय संकट
आदित्य नारायण मिश्र ने बताया कि भारत जैसे देश में उच्च शिक्षा को सुलभ और किफायती बनाना सबसे बड़ी जरूरत है, लेकिन इसके विपरीत सरकारी फंडिंग में कमी के कारण स्थिति खराब होती जा रही है।
दिल्ली विश्वविद्यालय इस समय लगभग 50 करोड़ रुपये के घाटे से जूझ रहा है, जबकि कई संबद्ध कॉलेज भी गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। ऐसे में नए शासन मॉडल से चुनौतियां और बढ़ने की आशंका है।
उनका कहना है कि यदि नया बिल लागू हुआ तो UGC, AICTE जैसी संस्थाओं का भी विलय संभव है और उनकी जगह एक केंद्रीय संस्था बनाई जा सकती है। इससे विश्वविद्यालयों का पूरा ढांचा बदल जाएगा और इसका सीधा असर छात्रों व शिक्षकों पर पड़ेगा।
HECI बिल और NEP को लेकर गहरी चिंता
DUTA के मौजूदा सचिव वीमलेंदु तीर्थंकर ने हायर एजुकेशन काउंसिल ऑफ इंडिया (HECI) बिल को लेकर कहा कि बिल भले ही सार्वजनिक नहीं हुआ है, लेकिन NEP 2020 के कई प्रावधान विश्वविद्यालयों की लोकतांत्रिक संरचना को कमजोर कर सकते हैं।
उन्होंने कहा कि NEP लागू हुए चार साल हो चुके हैं। डूटा चार साल के अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम का विरोध नहीं कर रहा, लेकिन इसके क्रियान्वयन में कई खामियां सामने आई हैं। छात्रों की प्रतिक्रिया बताती है कि कोर्स स्ट्रक्चर, मूल्यांकन प्रणाली और अकादमिक बोझ को लेकर गंभीर समस्याएं हैं। उन्होंने मांग की कि इन मुद्दों का विस्तृत समीक्षा होना जरूरी है।
स्टाफ काउंसिल और अकादमिक निकायों की भूमिका घटने का खतरा
तीर्थंकर ने कहा कि यदि बोर्ड ऑफ गवर्नर्स लागू किया गया, तो इससे विश्वविद्यालयों की लोकतांत्रिक संरचना—जैसे एकेडमिक काउंसिल, एग्जिक्यूटिव काउंसिल और स्टाफ काउंसिल—की भूमिका कमजोर हो जाएगी। साथ ही शिक्षकों की सेवा शर्तों पर भी असर पड़ सकता है।
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि विश्वविद्यालयों पर 30% फंड खुद जनरेट करने का दबाव गरीब और पहली पीढ़ी के छात्रों के लिए उच्च शिक्षा को महंगा बना देगा। उनका कहना है कि एक वेलफेयर स्टेट में सरकार को शिक्षा पर निवेश बढ़ाना चाहिए, न कि फंडिंग में कटौती।




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