
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने बीते कुछ वर्षों में इंसानी जिंदगी के लगभग हर हिस्से को प्रभावित किया है। बात बातचीत के तरीकों की हो या काम करने के ढंग की, बदलाव साफ दिखाई देता है। जहां एक ओर AI ने काम को आसान बनाया है, वहीं दूसरी ओर इसके सामाजिक और मानसिक असर भी सामने आने लगे हैं। बढ़ता अकेलापन, ऑटोमेशन की वजह से नौकरी जाने का डर और भविष्य को लेकर अनिश्चितता अब आम चिंता बन चुकी है।
इन्हीं बदलावों के बीच एक दिलचस्प ट्रेंड उभरकर सामने आया है। भारतीय छात्र अब उन विषयों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं, जिन्हें पहले सीमित दायरे में देखा जाता था। साइकोलॉजी इसी बदलाव का बड़ा उदाहरण है।
सोशल साइंस से आगे बढ़कर करियर विकल्प
अब साइकोलॉजी को केवल एक सोशल साइंस विषय के रूप में नहीं देखा जा रहा। छात्र इसे ऐसे प्रोफेशन के तौर पर समझ रहे हैं, जो भविष्य में स्थिर और सम्मानजनक करियर दे सकता है। AI और ऑटोमेशन के चलते जहां कई पारंपरिक नौकरियों पर खतरा मंडरा रहा है, वहीं मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाओं की जरूरत लगातार बढ़ रही है।
यही वजह है कि कई भारतीय छात्र साइकोलॉजी की पढ़ाई के लिए विदेश का रुख कर रहे हैं, ताकि उन्हें बेहतर शिक्षा, वैश्विक अनुभव और आकर्षक सैलरी के साथ करियर शुरू करने का मौका मिल सके।
तेजी से बढ़ती दिलचस्पी, आंकड़े दे रहे हैं गवाही
मेंटल हेल्थ से जुड़े कोर्सेज को लेकर बढ़ती रुचि महज एक अस्थायी ट्रेंड नहीं है। एजुकेशन प्लेटफॉर्म्स के आंकड़े इस बदलाव को साफ दिखाते हैं। लेवरेज एडू के संस्थापक अक्षय चतुर्वेदी के अनुसार, 2020 से 2024 के बीच साइकोलॉजी और मेंटल हेल्थ प्रोग्राम्स के लिए पूछताछ में करीब दस गुना बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह रुझान 2025 में भी जारी है।
यूनिस्कॉलर्स के आंकड़े भी इसी दिशा की ओर इशारा करते हैं। केवल फॉल 2023 सेशन के लिए ही इन कोर्सेज में आवेदन लगभग पांच गुना बढ़े। प्लेटफॉर्म के सह-संस्थापक अमित सिंह मानते हैं कि छात्र अब साइकोलॉजी को ऐसी फील्ड के रूप में देख रहे हैं, जिस पर ऑटोमेशन का असर सबसे कम होगा। उनके मुताबिक, AI एक सहायक टूल हो सकता है, लेकिन इंसानी समझ, फैसले और सहानुभूति की जगह नहीं ले सकता।
सैलरी और रोजगार के मौके भी कर रहे आकर्षित
हालांकि ज्यादातर छात्र इस फील्ड को अपने इंटरेस्ट और समाज में योगदान की भावना से चुन रहे हैं, लेकिन सैलरी और रोजगार की संभावनाएं भी बड़ी वजह हैं। अमेरिका जैसे देशों में एक साइकोलॉजिस्ट की औसत सालाना सैलरी 80 से 85 लाख रुपये तक पहुंच सकती है। इसके अलावा, आने वाले वर्षों में इस पेशे की मांग में भी तेज बढ़ोतरी का अनुमान है।
भारतीय छात्रों के बीच साइकोलॉजी की पढ़ाई के लिए कुछ देश खास तौर पर पसंद किए जा रहे हैं—
अमेरिका: रिसर्च, क्लिनिकल साइकोलॉजी और न्यूरोसाइकोलॉजी के लिए अग्रणी।
ब्रिटेन: एक साल के मास्टर कोर्स और प्रोफेशनल मान्यता के स्पष्ट रास्ते।
ऑस्ट्रेलिया: काउंसलिंग और पढ़ाई के बाद काम के अच्छे अवसर।
यूरोप (जर्मनी, नीदरलैंड): कम खर्च में आधुनिक और क्वालिटी एजुकेशन।
भारत में भी बढ़ती मांग
विदेश से पढ़ाई करने के बाद छात्रों के पास न सिर्फ वहीं काम करने का विकल्प होता है, बल्कि भारत में भी अवसर तेजी से बढ़ रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और गैलप वर्ल्ड पोल के सर्वे बताते हैं कि करीब 26 प्रतिशत भारतीय अकेलापन महसूस करते हैं। यह आंकड़ा मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल्स की जरूरत को साफ दिखाता है।
भारत में स्थिति यह है कि एक लाख की आबादी पर औसतन 0.47 साइकोलॉजिस्ट ही उपलब्ध हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह कमी आने वाले समय में और स्पष्ट होगी। ऐसे में साइकोलॉजी की डिग्री रखने वाले प्रोफेशनल्स के लिए रोजगार की संभावनाएं मजबूत बनी हुई हैं।
भविष्य की जरूरत बनती साइकोलॉजी
AI के दौर में जहां मशीनें कई काम संभाल रही हैं, वहीं इंसानी भावनाओं और मानसिक स्वास्थ्य की जिम्मेदारी अभी भी इंसान के हाथ में ही है। यही कारण है कि साइकोलॉजी अब सिर्फ एक विषय नहीं, बल्कि भविष्य की जरूरत बनती जा रही है। भारतीय छात्रों के लिए यह फील्ड न केवल समाज में योगदान का मौका देती है, बल्कि एक सुरक्षित और टिकाऊ करियर का रास्ता भी खोलती है।




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