
2025 के अंत तक आते-आते सस्टेनेबिलिटी अब कॉरपोरेट रणनीति की सहायक नहीं रही, बल्कि व्यवसाय संचालन की बुनियाद बन चुकी है। टेक्नोलॉजी और बिजनेस लीडर्स के लिए यह साल बड़े वादों का नहीं, बल्कि जमीन पर डिलीवरी का रहा।
जहां कुछ संगठन सस्टेनेबिलिटी को एक स्थायी संस्थागत क्षमता के रूप में अपना चुके हैं, वहीं कई कंपनियां अब भी बिखरे सिस्टम और अधूरे डेटा के बीच अपने लक्ष्यों को साधने की कोशिश कर रही हैं। ऐसे में 2026 की असली चुनौती रणनीति से आगे बढ़कर सिस्टम लेवल इंटीग्रेशन की होगी।
बदली भाषा, बदली प्राथमिकताएं
अगर 2024 सस्टेनेबिलिटी पर गंभीर बातचीत का साल था, तो 2025 उस बातचीत के परिपक्व होने का वर्ष साबित हुआ। अब चर्चा भावनात्मक नारों से हटकर डेटा क्वालिटी, इंटरऑपरेबिलिटी और ऑडिट-रेडी सिस्टम्स पर केंद्रित है।
यूरोप में CSRD के दायरे में कमी और अमेरिका में नेट-ज़ीरो नीतियों में ढील के बावजूद सस्टेनेबिलिटी की मांग कमजोर नहीं पड़ी। फर्क सिर्फ इतना है कि अब दबाव नियामकों से ज्यादा निवेशकों, बैंकों और ग्राहकों की ओर से आ रहा है।
कंपनियों से अब ऐसा डेटा मांगा जा रहा है जो फाइनेंशियल रिपोर्टिंग जितना भरोसेमंद हो। इससे सस्टेनेबिलिटी सीधे प्रतिस्पर्धा और पूंजी तक पहुंच से जुड़ गई है।
CIOs की नई जिम्मेदारी
इस बदलते परिदृश्य में CIO और टेक्नोलॉजी हेड्स की भूमिका और अहम हो गई है। सस्टेनेबिलिटी अब CSR का हिस्सा नहीं, बल्कि सप्लाई चेन की स्थिरता, सिस्टम रेज़िलिएंस और लो-कार्बन इकोनॉमी की तैयारी का सवाल है।
अब सवाल यह नहीं रह गया कि रिपोर्ट क्या कहती है, बल्कि यह है कि सिस्टम रियल-टाइम में क्या दिखा रहे हैं और उनसे कौन-से फैसले लिए जा रहे हैं।
रिपोर्टिंग से आगे बढ़कर फैसलों तक
2025 में सबसे बड़ा बदलाव यह रहा कि सस्टेनेबिलिटी डेटा अब डैशबोर्ड तक सीमित नहीं रहा। AI, एनालिटिक्स और जियोस्पेशियल टेक्नोलॉजी को जोड़कर कंपनियां अब ‘क्लाइमेट इंटेलिजेंस’ तैयार कर रही हैं।
AI का इस्तेमाल ऊर्जा खपत घटाने, उत्पादन शेड्यूल बेहतर करने और लॉजिस्टिक्स को कुशल बनाने में हो रहा है। डिजिटल ट्विन्स के जरिए इंफ्रास्ट्रक्चर और मैन्युफैक्चरिंग फैसलों का पर्यावरणीय असर पहले ही आंका जा रहा है।
स्थानीय प्रशासन भी जल प्रबंधन, ट्रांसपोर्ट और वेस्ट मैनेजमेंट में इन तकनीकों को अपनाने लगे हैं।
सस्टेनेबल AI का विरोधाभास
हालांकि, यहां एक विरोधाभास भी सामने आया है। सस्टेनेबिलिटी के लिए इस्तेमाल हो रही AI प्रणालियां खुद ऊर्जा और पानी की भारी खपत करती हैं। ऐसे में जरूरी हो गया है कि हर तकनीकी समाधान का कुल पर्यावरणीय लाभ साफ-साफ साबित किया जाए।
कई मामलों में ‘ग्रीन IT’ के दावे अधूरे या बहुत ऊपरी स्तर के डेटा पर टिके पाए गए हैं, जिससे विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं।
कहां दिखी ठोस प्रगति
राजनीतिक और आर्थिक अनिश्चितताओं के बावजूद, 2025 में कुछ सकारात्मक बदलाव साफ नजर आए। सस्टेनेबिलिटी डेटा की गुणवत्ता बेहतर हुई और कई कंपनियों ने इसे फाइनेंशियल डेटा जैसी गवर्नेंस के तहत लाना शुरू किया।
खरीद फैसलों में अब हार्डवेयर और क्लाउड सेवाओं के पूरे जीवनचक्र—उत्पादन से लेकर निपटान तक—को ध्यान में रखा जा रहा है।
सरकारी क्षेत्र में भी अप्रैल 2026 से लागू होने वाले डिजिटल वेस्ट ट्रैकिंग नियमों के चलते सस्टेनेबिलिटी मेट्रिक्स को टेंडर प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जा रहा है।
अब भी बाकी हैं बड़ी चुनौतियां
इसके बावजूद, महत्वाकांक्षा और अमल के बीच खाई बनी हुई है। कई संगठन सस्टेनेबिलिटी को अब भी एक अलग-थलग प्रोजेक्ट की तरह देखते हैं, न कि रोजमर्रा के ऑपरेशन का हिस्सा।
तकनीक, बिजनेस और पर्यावरण—तीनों की समझ रखने वाले प्रोफेशनल्स की कमी भी प्रगति की रफ्तार धीमी कर रही है।
2026: सस्टेनेबिलिटी का ‘ऑपरेशनल दशक’
2025 ने यह साफ कर दिया है कि अब सस्टेनेबिलिटी का अगला चरण इंटीग्रेशन, ऑटोमेशन और व्यवहार बदलाव से तय होगा। डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन और सस्टेनेबिलिटी अब अलग एजेंडा नहीं रहे।
आने वाले समय में कंपनियों को उनके वादों से नहीं, बल्कि उनके बनाए सिस्टम और उनके वास्तविक असर से परखा जाएगा।
जो संगठन सस्टेनेबिलिटी को इस हद तक अपने ऑपरेशन में शामिल कर लेंगे कि वह अलग से दिखाई ही न दे—वही 2026 और उसके बाद टिके रहेंगे।




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