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भारत का ‘मिशन 2070’: नेट ज़ीरो का महासंकल्प, चुनौतियाँ और भविष्य की नई तस्वीर

भारत का ‘मिशन 2070’: नेट ज़ीरो का महासंकल्प, चुनौतियाँ और भविष्य की नई तस्वीर

जब स्कॉटलैंड के ग्लासगो में ‘COP-26’ शिखर सम्मेलन चल रहा था, पूरी दुनिया की निगाहें भारत पर टिकी थीं। उस मंच से भारत ने एक ऐसी घोषणा की, जिसने न केवल विकसित देशों को चौंकाया बल्कि जलवायु परिवर्तन की लड़ाई में भारत को एक जिम्मेदार वैश्विक नेता के रूप में स्थापित कर दिया। वह घोषणा थी— साल 2070 तक भारत का ‘नेट ज़ीरो’ (Net Zero) बनने का संकल्प।

लेकिन सवाल यह है कि आखिर यह ‘नेट ज़ीरो’ है क्या? क्या 2070 तक भारत में पेट्रोल-डीजल या कोयले का इस्तेमाल पूरी तरह बंद हो जाएगा? और इस बदलाव का आपकी और हमारी जेब या सेहत पर क्या असर पड़ेगा? आइए, इस विस्तृत रिपोर्ट में इन सवालों की गहराई में उतरते हैं।

आखिर क्या है ‘नेट ज़ीरो’ का गणित?

अक्सर लोग ‘नेट ज़ीरो’ का मतलब ‘जीरो प्रदूषण’ समझ लेते हैं, जो कि पूरी तरह सही नहीं है।

सरल शब्दों में समझें तो यह एक संतुलन (Balance) की स्थिति है। इसका अर्थ यह है कि कोई देश वातावरण में जितनी कार्बन डाइऑक्साइड (ग्रीनहाउस गैस) छोड़ेगा, उतनी ही मात्रा को वह वापस सोखने का इंतजाम भी करेगा।

इसे ऐसे समझें—जैसे आप बैंक खाते से जितने पैसे निकालते हैं, अगर उतने ही वापस जमा कर दें, तो आपका बैलेंस बिगड़ेगा नहीं। ठीक वैसे ही, भारत अपनी फैक्ट्रियों और गाड़ियों से निकलने वाले धुएं को कम करेगा और बचे हुए प्रदूषण को पेड़ों या नई तकनीकों (Carbon Capture) के जरिए सोख लेगा। जब ‘उत्सर्जन’ और ‘सोखना’ बराबर हो जाएगा, तो हम ‘नेट ज़ीरो’ कहलाएंगे।

पीएम मोदी का ‘पंचामृत’ फॉर्मूला

भारत ने इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए केवल हवाई वादे नहीं किए, बल्कि एक ठोस कार्ययोजना पेश की, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘पंचामृत’ का नाम दिया। यह 2070 तक पहुँचने की सीढ़ी है, जिसके पांच मुख्य पड़ाव हैं:

2030 तक बड़ी छलांग: भारत अपनी गैर-जीवाश्म ऊर्जा (Non-fossil energy) क्षमता को 500 गीगावाट तक ले जाएगा।

आधी ज़रूरतें, हरी ऊर्जा से: 2030 तक देश की 50% बिजली की ज़रूरतें नवीकरणीय स्रोतों (सौर, पवन ऊर्जा) से पूरी होंगी।

कार्बन में कटौती: अब से लेकर 2030 तक कुल अनुमानित कार्बन उत्सर्जन में 1 अरब टन की कमी की जाएगी।

अर्थव्यवस्था की सफाई: अपनी अर्थव्यवस्था की कार्बन तीव्रता (Carbon Intensity) को 45% तक कम करना।

अंतिम लक्ष्य: साल 2070 तक नेट ज़ीरो के लक्ष्य को प्राप्त करना।

2050 क्यों नहीं? 2070 ही क्यों?

अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित देश 2050 तक नेट ज़ीरो होने की बात कर रहे हैं, तो भारत ने 20 साल और क्यों मांगे? यह एक कूटनीतिक और व्यावहारिक फैसला है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत अभी एक विकासशील अर्थव्यवस्था है। हमें अभी करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकालना है, सड़कें बनानी हैं, और हर घर तक 24 घंटे बिजली पहुंचानी है। इसके लिए अभी कुछ दशकों तक हमें कोयले (Coal) पर निर्भर रहना ही होगा। भारत का तर्क है कि पश्चिम के देशों ने पिछले 100 सालों में जमकर प्रदूषण फैलाया और विकसित हुए, इसलिए भारत को भी अपने विकास के लिए थोड़ा समय और ‘कार्बन स्पेस’ मिलना चाहिए। 2070 का लक्ष्य यथार्थवादी है, न कि जल्दबाजी में लिया गया फैसला।

बदलाव का रोडमैप: हम वहां कैसे पहुँचेंगे?

यह सफर आसान नहीं है, इसके लिए भारत को अपनी पूरी ऊर्जा प्रणाली (Energy System) का कायाकल्प करना होगा। इसकी रणनीति कुछ इस प्रकार है:

  1. सूरज और हवा से दोस्ती (Renewable Energy) भारत सौर ऊर्जा के मामले में पहले ही दुनिया में मिसाल कायम कर चुका है। 2030 तक 500 GW का लक्ष्य हासिल करने के लिए हर खाली छत और बंजर जमीन पर सोलर पैनल लगाने की मुहिम तेज होगी।
  2. ग्रीन हाइड्रोजन: भविष्य का ईंधन इस्पात (Steel) और सीमेंट जैसे भारी उद्योगों में बिजली से काम नहीं चलता, वहां कोयले की भट्टी चाहिए। इसके विकल्प के रूप में भारत ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ पर बड़ा दांव लगा रहा है। यह पानी से बनता है और जलने पर सिर्फ पानी छोड़ता है।
  3. इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की क्रांति सड़कों पर पेट्रोल-डीजल गाड़ियां कम और इलेक्ट्रिक गाड़ियां ज्यादा दिखेंगी। रेलवे का पूरी तरह विद्युतीकरण किया जा रहा है, जो डीजल इंजनों को इतिहास बना देगा।
  4. जंगल और हरियाली कार्बन सोखने का सबसे सस्ता तरीका है—पेड़। भारत सरकार वन क्षेत्र बढ़ाने पर जोर दे रही है ताकि प्राकृतिक रूप से कार्बन को सोखा जा सके।

चुनौतियां: राह में कितने कांटे?

सपने सुहाने हैं, लेकिन हकीकत की जमीन पथरीली है। भारत के सामने तीन सबसे बड़ी चुनौतियां हैं:

धन की भारी कमी: एक अनुमान के मुताबिक, 2070 तक नेट ज़ीरो होने के लिए भारत को लगभग 10 ट्रिलियन डॉलर (लाखों-करोड़ रुपये) की जरूरत होगी। इतना पैसा कहां से आएगा? विकसित देश मदद के वादे तो करते हैं, लेकिन झोली खाली रखते हैं।

कोयले से मोहभंग: भारत की 70% बिजली आज भी कोयले से बनती है। लाखों लोगों की रोजी-रोटी कोयला खदानों से जुड़ी है। रातों-रात इसे बंद करना अर्थव्यवस्था को ठप कर सकता है।

महंगी तकनीक: ग्रीन टेक्नोलॉजी अभी महंगी है। गरीब और मध्यम वर्ग के लिए महंगी बिजली या महंगी इलेक्ट्रिक कार खरीदना आसान नहीं होगा।

आम आदमी की ज़िंदगी पर असर

नेट ज़ीरो सिर्फ सरकारों का मामला नहीं है, यह आपकी ज़िंदगी भी बदलेगा:

सेहत: हवा साफ होगी। दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों में जो धुंध (Smog) दिखती है, उससे निजात मिलेगी, जिससे फेफड़ों की बीमारियां कम होंगी।

नौकरियां: पुरानी तरह की कुछ नौकरियां खत्म हो सकती हैं, लेकिन ‘ग्रीन इकोनॉमी’ में लाखों नई नौकरियां (जैसे सोलर टेक्नीशियन, EV मैकेनिक) पैदा होंगी।

जीवनशैली: हमारे घर बनाने के तरीके, सफर करने के साधन और बिजली खपत की आदतें बदल जाएंगी।

एक लंबी लेकिन ज़रूरी यात्रा

भारत का 2070 का लक्ष्य केवल एक तारीख नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित धरती सौंपने का वादा है। यह रास्ता खर्चीला और कठिन जरूर है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के खतरों को देखते हुए हमारे पास कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है।

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार, उद्योग जगत और आम नागरिक मिलकर इस ‘हरित क्रांति’ (Green Revolution) को कैसे अंजाम देते हैं। बिगुल बज चुका है, और भारत बदलाव की राह पर कदम बढ़ा चुका है।

एडइनबॉक्स टीम

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