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Sustainable Architecture: How Climate Change Is Transforming the Future of Building Design

सस्टेनेबल आर्किटेक्चर: जलवायु परिवर्तन के दौर में कैसे बदल रही है डिजाइन की सोच

Sustainable Architecture: How Climate Change Is Transforming the Future of Building Design

इतिहास में अच्छी वास्तुकला यानी आर्किटेक्चर ने हमेशा जलवायु, भौगोलिक परिस्थितियों और स्थानीय विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए इमारतों और जगहों को डिजाइन किया। इसका उद्देश्य ऐसे स्थान तैयार करना था जो आरामदायक होने के साथ-साथ ऊर्जा और संसाधनों के लिहाज से भी प्रभावी हों। हालांकि, यह सोच हमेशा एक जैसी नहीं रही। तेजी से बढ़ते शहरीकरण और लागत कम रखने के दबाव में कई निर्माण परियोजनाओं में लंबे समय के प्रदर्शन और पर्यावरणीय प्रभावों के बजाय तत्काल जरूरतों को प्राथमिकता दी गई।

उस समय ऊर्जा को आसानी से उपलब्ध संसाधन माना जाता था और पर्यावरण पर निर्माण के प्रभावों की समझ भी सीमित थी। इसलिए पृथ्वी के स्वास्थ्य और उससे जुड़े मानव स्वास्थ्य व कल्याण पर बहुत कम ध्यान दिया गया।

आज परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। अब यह समझ काफी गहरी हो चुकी है कि हमारे आसपास का निर्मित वातावरण यानी Built Environment पर्यावरण, जलवायु और मानव स्वास्थ्य को किस तरह प्रभावित करता है। इसी के जवाब में आर्किटेक्चर ने सस्टेनेबल डिजाइन (Sustainable Design) को अपनाया है। इसमें पर्यावरण की जिम्मेदारी, संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल और इमारत में रहने या काम करने वाले लोगों की सुविधा और स्वास्थ्य को एक साथ ध्यान में रखा जाता है।

पहले की पीढ़ियों के आर्किटेक्ट्स को सस्टेनेबिलिटी के बारे में सीमित जानकारी और प्रशिक्षण मिला था, लेकिन आज आर्किटेक्चर के छात्रों को प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर डिजाइन करने के लिए तैयार करना जरूरी है। इस बदलाव को समझना भविष्य की आर्किटेक्चर प्रैक्टिस को बेहतर बनाने के लिए महत्वपूर्ण है।

प्राकृतिक प्रणालियों के साथ तालमेल

सस्टेनेबल डिजाइन की सोच को 1970 के दशक में तेजी मिलने लगी। इसका एक कारण उस समय तेल की कीमतों में हुई बढ़ोतरी भी थी। इसी दौर में Passive Design और Solar-Efficient Design का विकास हुआ। इनका जोर मशीनों और कृत्रिम प्रणालियों पर ज्यादा निर्भर रहने के बजाय प्राकृतिक प्रणालियों के साथ तालमेल बनाकर इमारतों को डिजाइन करने पर था।

इसके प्रमुख सिद्धांतों में इमारत की सही दिशा तय करना, सूरज की रोशनी और छाया का बेहतर इस्तेमाल, Thermal Mass और Insulation का प्रभावी उपयोग और प्राकृतिक हवा के आने-जाने की व्यवस्था शामिल थी। इन तरीकों से ऊर्जा की जरूरत कम हुई और इमारतों के अंदर रहने वाले लोगों को अधिक आरामदायक वातावरण मिला। इससे उनके स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक असर पड़ा।

जहां मैकेनिकल सिस्टम की जरूरत होती थी, वहां ऊर्जा दक्षता पर जोर दिया जाने लगा। आज भी कार्बन उत्सर्जन कम करने यानी Decarbonisation की कोशिशों में ऊर्जा दक्षता की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है।

1980 के दशक तक सस्टेनेबिलिटी की अवधारणा और व्यापक हो गई। दुनिया भर में यह समझ विकसित होने लगी कि किसी इमारत के पर्यावरणीय प्रभाव को केवल उसके निर्माण के समय नहीं, बल्कि उसके पूरे जीवन चक्र के दौरान देखना चाहिए। इसी से Life Cycle Thinking की अवधारणा सामने आई।

इसमें निर्माण सामग्री कहां से आती है, इमारत कैसे बनाई जाती है, उसके इस्तेमाल के दौरान क्या प्रभाव पड़ता है और अंत में उसका क्या होता है—इन सभी पहलुओं का आकलन किया जाता है। डिजाइनर अब जैव विविधता पर पड़ने वाले प्रभावों को भी ध्यान में रखने लगे। इससे यह समझ विकसित हुई कि किसी इमारत का असर केवल उसके निर्माण क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आसपास के पारिस्थितिक तंत्र पर भी पड़ सकता है।

दोबारा इस्तेमाल को बढ़ावा

आज यह सोच और आगे बढ़कर Whole-of-Building और Whole-of-Life Approach में बदल गई है। अब इमारत के इस्तेमाल के दौरान होने वाला Operational Carbon और निर्माण सामग्री व निर्माण प्रक्रिया से जुड़ा Embodied Carbon, दोनों महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

Circular Design के सिद्धांत भी तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। इसमें निर्माण सामग्री के दोबारा इस्तेमाल, रीसाइक्लिंग और ऐसी इमारतों की डिजाइन पर जोर दिया जाता है जिन्हें भविष्य में आसानी से अलग करके उनके हिस्सों का दोबारा इस्तेमाल किया जा सके।

इससे खनन और जंगलों की कटाई जैसी संसाधन-आधारित प्रक्रियाओं पर निर्भरता कम की जा सकती है। इसके साथ ही लंबे समय में आर्थिक फायदे भी मिल सकते हैं। हालांकि, इन सभी पहलुओं को डिजाइन में शामिल करने से प्रक्रिया अधिक जटिल हो जाती है, लेकिन यह वैश्विक चुनौतियों से निपटने में आर्किटेक्ट की बढ़ती जिम्मेदारी को दिखाता है।

जलवायु परिवर्तन ने सस्टेनेबल डिजाइन की जरूरत को और ज्यादा महत्वपूर्ण बना दिया है। दुनिया भर में इमारतें करीब 40 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं, जबकि शहरों का योगदान 70 प्रतिशत से अधिक है। ऐसे में Built Environment में Net Zero Carbon हासिल करना जरूरी है। मौजूदा ज्ञान और तकनीकों की मदद से इसे हासिल करना पहले की तुलना में अधिक संभव भी हो गया है।

इस बदलाव को आगे बढ़ाने के लिए तीन प्रमुख रणनीतियां महत्वपूर्ण हो सकती हैं। पहली, Life Cycle-Based Design के जरिए Embodied Carbon और Operational Carbon दोनों को कम करना होगा।

दूसरी, इमारतों में ही नवीकरणीय ऊर्जा का उत्पादन बढ़ाना होगा। उदाहरण के लिए Building-Integrated Photovoltaics (BIPV) के जरिए सौर ऊर्जा पैदा की जा सकती है। अगर इसे ऊर्जा भंडारण यानी Energy Storage और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी सिस्टम के साथ जोड़ा जाए तो जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता काफी कम की जा सकती है।

तीसरी, जहां तुरंत पूरी तरह Net Zero हासिल करना संभव नहीं है, वहां Green Power Procurement या उपयुक्त Carbon Offsets के जरिए इस अंतर को कम करने की कोशिश की जा सकती है।

भविष्य में सस्टेनेबल इमारतों के साथ Resilience भी जरूरी

आने वाले समय में Resilience यानी आपदाओं और बदलावों को झेलने की क्षमता भी सस्टेनेबल डिजाइन जितनी ही महत्वपूर्ण होने वाली है। जलवायु में बदलाव, भू-राजनीतिक अनिश्चितता और तेजी से बदलती तकनीक के दौर में इमारतों को गर्मी की लहर, बाढ़, बिजली कटौती और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट जैसी परिस्थितियों का सामना करने और उनके अनुसार खुद को ढालने में सक्षम होना होगा।

इसके लिए Passive Survivability, Distributed Energy Systems और Flood-Resilient Planning जैसी डिजाइन रणनीतियां अपनाई जा सकती हैं। इसका दायरा केवल एक इमारत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे शहरी सिस्टम तक बढ़ेगा।

सस्टेनेबल आर्किटेक्चर में एक नई दिशा Regenerative Design की है। सस्टेनेबिलिटी का मुख्य उद्देश्य अब तक नुकसान को कम करना रहा है, लेकिन Regenerative Design इससे आगे जाकर सकारात्मक प्रभाव पैदा करने पर जोर देता है।

इसका मतलब ऐसी इमारतें और सिस्टम तैयार करना है जो जितनी ऊर्जा इस्तेमाल करें, उससे अधिक ऊर्जा पैदा कर सकें, जैव विविधता को बढ़ावा दें और पारिस्थितिक तंत्र को फिर से बेहतर बनाने में मदद करें। यानी सोच अब केवल नुकसान कम करने से आगे बढ़कर सकारात्मक बदलाव लाने की ओर जा रही है।

सस्टेनेबल आर्किटेक्चर के सामने प्रमुख चुनौतियां

सस्टेनेबल डिजाइन के लिए आज कई टूल और फ्रेमवर्क उपलब्ध हैं, लेकिन इसके बावजूद चुनौतियां बनी हुई हैं। भारत में GRIHA जैसे ग्रीन बिल्डिंग रेटिंग सिस्टम और Green Building Council की गाइडलाइंस सस्टेनेबल निर्माण को बढ़ावा देने में मदद कर रही हैं। वहीं दुनिया भर में Net Zero से जुड़ी प्रतिबद्धताएं सरकारी नीतियों और बिल्डिंग कोड को प्रभावित कर रही हैं।

इसके बावजूद निर्माण की अधिक लागत को लेकर धारणा, क्लाइंट्स के बीच सीमित जागरूकता और डिजाइन से जुड़ी विशेषज्ञता की कमी अभी भी सस्टेनेबल डिजाइन को बड़े स्तर पर अपनाने की रफ्तार को धीमा कर रही है।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए बेहतर शिक्षा और क्षमता निर्माण की जरूरत है। Architecture और Design के पाठ्यक्रमों में सस्टेनेबिलिटी को केवल एक अलग विषय के रूप में नहीं, बल्कि अलग-अलग विषयों और डिजाइन प्रक्रियाओं का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। इससे भविष्य के आर्किटेक्ट्स को इस बदलाव का नेतृत्व करने के लिए तैयार किया जा सकेगा।

अंततः सस्टेनेबल डिजाइन अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक बुनियादी जिम्मेदारी है। आर्किटेक्चर और डिजाइन के छात्रों को ऐसी शिक्षा व्यवस्था की जरूरत है, जो उन्हें सक्षम और प्रतिबद्ध शिक्षकों के माध्यम से सही मार्गदर्शन दे।

यूनिवर्सिटीज को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके पाठ्यक्रम में सैद्धांतिक और ऐतिहासिक ज्ञान के साथ-साथ नई तकनीक, नए टूल और आधुनिक डिजाइन तकनीकों को भी शामिल किया जाए। इसका उद्देश्य ऐसी अगली पीढ़ी के आर्किटेक्ट तैयार करना होना चाहिए, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए अधिक टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल निर्मित वातावरण तैयार कर सकें।

 

Asmita Sarkar

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