
वर्तमान में भारत में बच्चों और अभिभावकों के बीच जिस तरह के सम्बन्ध विकसित हो रहे हैं, उनमें हमारी शिक्षा प्रणाली की बहुत बड़ी भूमिका है। शिक्षा प्रणाली ने बच्चों को एक ऐसे उत्पाद के रूप में देखना शुरू किया है जिसका बाजार मूल्य ही महत्वपूर्ण हो। बच्चों की संवेदनात्मक जरूरतों और रचनात्मक पक्षों की उचित समय पर देखभाल न करने के कारण वे सामाजिक अलगाव का शिकार हो जाते हैं। इसमें बच्चे इतने व्यक्ति केन्द्रित हो जाते हैं कि वे हर समय दबाव में रहते हैं। वे अपने दबाव को किसी के साथ साझा नहीं कर पाते और अंत में बड़ी संख्या में वे अवसाद का शिकार होते जा रहे हैं।
बच्चों के लिए छुटियाँ एक ऐसा आजादी का समय होता है जिसमें वे अपनी रचनात्मकता को नए आयाम देते रहे हैं। देश के अधिकांश बच्चे छुट्टियों में साईकिल चलाना सीखते हैं। कई तरह के खेल सीखते हैं। किस्से कहानियां सीखते हैं। लेकिन अब परिवार छुट्टियों को गैरजरूरी मानने लगा है, इस दौर में भी वे बच्चों पर कैरियर का दबाव बनाकर रखते हैं। परिवार की मानसिकता यह हो गई है कि बच्चों का समय ‘बर्बाद’ नहीं होना चाहिए क्योंकि शिक्षा व्यवस्था ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से परिवार को समय का सदुपयोग सिर्फ किताबों को रटना ही बताया है। इसलिए परिवार हर समय बच्चे के हाथ में सिर्फ किताब देखना चाहता है। किताब भी बच्चे की रूचि की नहीं बल्कि स्कूल द्वारा परीक्षा को केंद्र में रखकर सुझाई गई होनी चाहिए।
छुट्टियों से पहले स्कूल बच्चों को इतना होमवर्क दे देता है कि बच्चा उसके अलावा कुछ दूसरा करने की सोच ही नहीं सकता। बच्चे इस होमवर्क से इतने तनाव में होते हैं कि कुछ बच्चे तो छुट्टियाँ शुरू होते ही कुछ दिन लगकर इस होमवर्क को ‘निपटाते’ हैं, कुछ बच्चे पूरी छुट्टियों में इसे लेकर तनाव में रहते हैं और अंत में किसी तरह उसे पूरा करते हैं। बच्चों को पूरी तरह से नियंत्रित किये जाने की कोशिश होती है।
इस प्रक्रिया में बचपन का जो प्रकृति, समुदाय और सृजन से सम्बन्ध था, वह दरकता-सा दिखाई देता है। बहुत से परिवार ऐसे भी हैं जो बच्चों के घर में रहने से सहज नहीं हैं। बच्चों की ऊँची आवाज़ें, उछलकूद से वे परेशान महसूस करते हैं। कई अभिभावकों को आप ऐसा कहते हुए सुन पायेंगे, ‘कब छुट्टियाँ पूरी हों और कब ये स्कूल जाएँ। हम तो तंग आ गए हैं।’ इसका कारण यह है कि परिवारों के दिन का समय बिना बच्चों का हम स्वीकार कर चुके हैं। बच्चों के लिए घर एक ऐसे हॉस्टल की तरह बनता जा रहा है जिसे सिर्फ खाना खाने और सोने के स्थान तक समझा जाने लगा है।
परिवार के साथ संबंध मशीनी होने के कारण बच्चों का समुदाय से दूर होना स्वाभाविक है। इसलिए समुदाय में उनके कोई दोस्त भी नहीं बन पाते हैं। स्कूल में प्रतियोगिता दोस्ती के विचार को ही धूमिल करते जा रही है। अब वे छुट्टियाँ किसके साथ बिताएं?
ऐसी स्थिति में परिवार को क्या करना चाहिए? सबसे पहले तो बच्चों को घर का महत्वपूर्ण सदस्य मानना चाहिए। उनकी छुट्टियों को सहजता से लिया जाए और हो सके तो उनके रचनात्मक कामों और खेलों में भागीदार बनना चाहिए। साल के कुछ ही तो दिन होते हैं जो बच्चों के साथ बिताए जा सकते हैं। उनके साथ अपने अनुभव साझा कीजिए। उन्हें घर के निर्णय लेने में भागीदार बना सकते हैं। सबसे अधिक जरूरत उन्हें प्रोत्साहित करने की है ताकि वे अपने आप को अकेला न समझें।
छुट्टियों के दिन बच्चों के साथ ऐसे गुजरने चाहिए कि उन चंद दिनों की ऊर्जा सालभर तक उनके मन को प्रेरित करती रहे। वे किसी समय एकांत के क्षण में अवसाद में जाने वाले हों तो छुट्टियों के क्षण उन्हें जीवन की तरफ खींच लायें। वे सहजता से अपने मन का दर्द परिवार को बता पाएं। वे परिवार से निर्णय लेने की क्षमता को भी सीख सकते हैं। बच्चों की छुट्टियाँ परिवार के लिए उलझन न होकर एक अवसर है संवेदनाओं के कमजोर होते धागों को मज़बूत करने का। – डॉ. संदीप मील




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