हरियाणा में लड़कियों की शिक्षा और रोजगार के रास्ते में घरेलू जिम्मेदारियां बड़ी बाधा बनकर सामने आई हैं। घर के काम, परिवार की देखभाल और सामाजिक अपेक्षाओं के कारण कई लड़कियां अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख पातीं। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के 2025-26 के आंकड़ों के हवाले से सामने आए ये आंकड़े राज्य में महिलाओं और पुरुषों के बीच शिक्षा, रोजगार और कौशल प्रशिक्षण के अवसरों में बड़े अंतर की ओर इशारा करते हैं।
दिए गए आंकड़ों के अनुसार, हरियाणा में 15 से 21 वर्ष की आयु की पढ़ाई छोड़ चुकी लड़कियों में 61.5 प्रतिशत ने घरेलू कामकाज को इसकी मुख्य वजह बताया। राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा 41.6 प्रतिशत बताया गया है। यानी हरियाणा में यह अनुपात राष्ट्रीय आंकड़े से 19.9 प्रतिशत अंक अधिक है।
यह अंतर बताता है कि लड़कियों की शिक्षा की चुनौती केवल स्कूल या कॉलेज में दाखिला दिलाने और फीस की व्यवस्था करने तक सीमित नहीं है। जब घर के काम और परिवार की देखभाल की जिम्मेदारी मुख्य रूप से बेटियों पर डाल दी जाती है, तो उनकी पढ़ाई, करियर और आर्थिक आत्मनिर्भरता प्रभावित होती है।
लड़कों के लिए आर्थिक तंगी, लड़कियों के लिए घरेलू जिम्मेदारियां बड़ी बाधा
रिपोर्ट से जुड़े आंकड़ों में लड़कों और लड़कियों के पढ़ाई छोड़ने की वजहों में भी अंतर दिखाई देता है। हरियाणा में 15 से 21 वर्ष की आयु के पढ़ाई छोड़ चुके 55.1 प्रतिशत लड़कों ने आर्थिक तंगी को इसकी प्रमुख वजह बताया।
लड़कियों के मामले में घरेलू कामकाज का दबाव सबसे प्रमुख कारणों में शामिल है। यह अंतर परिवारों में जिम्मेदारियों के बंटवारे और लड़के-लड़कियों से जुड़ी सामाजिक अपेक्षाओं पर सवाल खड़े करता है।
अगर किसी लड़की को घर के काम, छोटे भाई-बहनों की देखभाल और परिवार के दूसरे सदस्यों की जरूरतों को पूरा करने के लिए अपनी पढ़ाई से समझौता करना पड़ता है, तो इसका असर केवल उसकी शिक्षा पर नहीं पड़ता। आगे चलकर उसके लिए नौकरी पाने, अपनी आमदनी बढ़ाने और आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनने के अवसर भी सीमित हो सकते हैं।
इसलिए लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए छात्रवृत्ति, स्कूल-कॉलेज तक पहुंच और आर्थिक सहायता के साथ परिवारों में घरेलू जिम्मेदारियों का समान बंटवारा भी जरूरी है।
हरियाणा में करीब आधी युवा महिलाएं शिक्षा, रोजगार और प्रशिक्षण से बाहर
महिलाओं की स्थिति का एक और अहम पहलू NEET श्रेणी से जुड़ा है। NEET का पूरा नाम Not in Education, Employment or Training है। इसमें ऐसे युवा शामिल होते हैं जो न पढ़ाई कर रहे होते हैं, न रोजगार में होते हैं और न ही किसी कौशल प्रशिक्षण से जुड़े होते हैं।
दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, हरियाणा में 15 से 29 वर्ष की 49.9 प्रतिशत महिलाएं इस श्रेणी में हैं। पुरुषों के लिए यह अनुपात 8.7 प्रतिशत बताया गया है। इस तरह दोनों के बीच 41.2 प्रतिशत अंक का अंतर है।
यह अंतर बताता है कि युवा महिलाओं के लिए पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार या कौशल प्रशिक्षण तक पहुंचना भी बड़ी चुनौती है। घरेलू जिम्मेदारियों के कारण अगर कोई महिला शिक्षा या प्रशिक्षण से बाहर रह जाती है, तो उसके लिए नौकरी के अवसर तलाशना और आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल करना और मुश्किल हो सकता है।
इन आंकड़ों में यह भी बताया गया है कि NEET श्रेणी में शामिल 94.1 प्रतिशत महिलाओं ने घरेलू जिम्मेदारियों को इसका कारण बताया, जबकि 2.9 प्रतिशत ने कहा कि वे रोजगार की तलाश कर रही हैं। इन आंकड़ों की सही व्याख्या के लिए यह समझना जरूरी है कि ये प्रतिशत किस आधार पर निकाले गए हैं और रिपोर्ट में कारणों का वर्गीकरण किस तरह किया गया है।
विधानसभा से संसद तक महिलाओं की सीमित भागीदारी
शिक्षा और रोजगार में महिलाओं की कम भागीदारी का व्यापक असर सार्वजनिक जीवन और निर्णय लेने वाली संस्थाओं में भी दिखाई देता है। हरियाणा विधानसभा और संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व इस बहस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
90 सदस्यीय हरियाणा विधानसभा में 13 महिला विधायक होने का मतलब है कि सदन में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 14.4 प्रतिशत है। वहीं, राज्य की 10 लोकसभा सीटों में से एक पर महिला सांसद होने पर यह हिस्सेदारी 10 प्रतिशत बनती है।
राजनीति में महिलाओं की भागीदारी केवल प्रतिनिधित्व का सवाल नहीं है। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, रोजगार और परिवारों से जुड़ी नीतियों में महिलाओं के अनुभवों और जरूरतों को जगह मिलने की संभावना भी बढ़ती है।
हालांकि, विधानसभा और लोकसभा में महिलाओं की कम संख्या को केवल शिक्षा या घरेलू कामकाज से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। राजनीतिक दलों में टिकट वितरण, चुनाव लड़ने के संसाधन, सामाजिक परिस्थितियां और राजनीतिक अवसर भी इसमें भूमिका निभाते हैं। फिर भी शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में आगे बढ़ने के लिए जरूरी आधार प्रदान करते हैं।
योजनाओं के साथ सामाजिक सोच बदलना भी जरूरी
बेटियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सरकारों ने कई योजनाएं शुरू की हैं। लेकिन केवल स्कूलों की उपलब्धता और दाखिले बढ़ाने से यह सुनिश्चित नहीं होता कि लड़कियां अपनी पढ़ाई पूरी कर पाएंगी या आगे रोजगार हासिल कर सकेंगी।
इसके लिए जरूरी है कि परिवारों में बेटियों और बेटों दोनों को शिक्षा और करियर के समान अवसर मिलें। घरेलू काम की जिम्मेदारी केवल लड़कियों पर डालने के बजाय परिवार के सभी सदस्यों के बीच बांटी जानी चाहिए। स्कूल और कॉलेज छोड़ने के जोखिम वाली छात्राओं की पहचान कर उन्हें समय पर सहायता देना भी महत्वपूर्ण है।
इसके साथ व्यावसायिक शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण, करियर परामर्श और रोजगार से जुड़ी योजनाओं तक युवा महिलाओं की पहुंच बढ़ाने की जरूरत है। ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षित परिवहन, पढ़ाई दोबारा शुरू करने के अवसर और कामकाजी महिलाओं के लिए देखभाल संबंधी सुविधाएं भी उनकी भागीदारी बढ़ाने में मदद कर सकती हैं।
हरियाणा के ये आंकड़े एक महत्वपूर्ण सवाल उठाते हैं: अगर लड़कियों की शिक्षा को प्राथमिकता दी जा रही है, तो घर की जिम्मेदारियों का बोझ अब भी मुख्य रूप से उन्हीं पर क्यों है? इसका जवाब केवल सरकारी योजनाओं में नहीं, बल्कि परिवारों की सोच और रोजमर्रा के व्यवहार में बदलाव में भी छिपा है।
बेटियों को शिक्षा, कौशल और करियर चुनने की स्वतंत्रता देना उनके भविष्य के साथ-साथ राज्य की आर्थिक प्रगति के लिए भी जरूरी है। जब महिलाओं को पढ़ाई पूरी करने, अपनी क्षमता के मुताबिक काम चुनने और निर्णय लेने के समान अवसर मिलेंगे, तभी शिक्षा का लाभ वास्तविक रूप से उनके जीवन में दिखाई देगा।




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