
10 नवंबर 2025 को दिल्ली में हुए धमाके के बाद, फरीदाबाद स्थित अल-फलाह यूनिवर्सिटी (Al-Falah University) अचानक सुर्खियों में आ गई। धमाके की जांच के दौरान पता चला कि इस विश्वविद्यालय से जुड़े कुछ डॉक्टरों का नाम सामने आया। उसी समय, National Assessment and Accreditation Council (NAAC) ने विश्वविद्यालय को उसके मान्यता दावे— विशेषकर ‘ग्रेड A’ एक्रेडिटेशन — के आधार पर स्पष्ट जवाब देने को कहा।
क्या है विवाद- पुरानी एक्रेडिटेशन का गलत दावा
NAAC के अनुसार, अल-फलाह यूनिवर्सिटी ने अपनी वेबसाइट व सार्वजनिक दस्तावज़ों में दिखाया कि इसके कॉलेज— जैसे कि अल-फलाह स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (Al-Falah School of Engineering and Technology) तथा अल-फलाह स्कूल ऑफ एजुकेशन एंड ट्रेनिंग (Al-Falah School of Education and Training) को ‘ग्रेड A’ एक्रेडिटेशन मिला हुआ है। लेकिन जांच में यह सामने आया कि इंजीनियरिंग कॉलेज की NAAC एक्रेडिटेशन 2013–2018 तक वैध थी। एजुकेशन एंड ट्रेनिंग स्कूल की एक्रेडिटेशन 2011–2016 तक ही वैध थी।
दोनों ही कॉलेजों ने समय पर रिन्यूअल या नया आकलन (Cycle-2) नहीं कराया। इसलिए, उन पर अब कोई वैध एक्रेडिटेशन नहीं है। बावजूद इसके, विश्वविद्यालय ने अपने वेबसाइट व प्रमोशनल मटीरियल में NAAC ग्रेड दिखाए रखा — जिसे NAAC ने “गलत और गुमराह करने वाला दावा” करार दिया।
इसके बाद 12 नवंबर 2025 को NAAC ने अल-फलाह यूनिवर्सिटी को ‘शो कॉज़ नोटिस’ भेजा। नोटिस में पूछा गया कि ऐसा क्यों नहीं किया जाना चाहिए कि उसके दायित्वों (action) पर विचार न किया जाए, और तुरंत वेबसाइट से ऐसा दावा हटाने को कहा गया।
विश्वविद्यालय की सफाई — “बस भूल/गलती थी”
अल-फलाह यूनिवर्सिटी ने NAAC को जवाब देते हुए कहा कि पुरानी एक्रेडिटेशन वेबसाइट पर अनजाने में बनी रही — इसे वेबसाइट डिजाइन या ध्यान न देने की भूल बताया गया। उन्होंने कहा कि अब उक्त एक्रेडिटेशन दावे हटा दिए गए हैं। विश्वविद्यालय ने इस बात के लिए माफी भी मांगी है।
हालाँकि NAAC के एक वरिष्ठ अफसर ने कहा कि विश्वविद्यालय ने “स्पष्ट, सीधा जवाब” नहीं दिया। वह सिर्फ यह कह रहे हैं कि “किसी स्टाफ सदस्य की चूक” थी, जिससे पुरानी जानकारी वेबसाइट पर रह गई।
यह अकेला मामला नहीं
भारत में बड़ी संख्या में संस्थाएं बिना वैध एक्रेडिटेशन के चल रही हैं। अल-फलाह यूनिवर्सिटी केवल एक अकेला उदाहरण नहीं है। हाल ही में प्रकाशित रिपोर्ट्स के अनुसार, लगभग 50 प्रतिशत विश्वविद्यालयों के पास वैध NAAC एक्रेडिटेशन नहीं है।
देश के कुल 1,074 विश्वविद्यालय, जिसमें सेंट्रल, स्टेट, प्राइवेट व डीन यूनिवर्सिटीज शामिल हैं— उनमें से केवल 561 के पास 2025 तक तक वैध एक्रेडिटेशन था। इसका मतलब है कि करीब आधी यूनिवर्सिटीज़ अब भी बिना मानक एक्रेडिटेशन के काम कर रही हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है — एक्रेडिटेशन सिर्फ नाम नहीं, भरोसे की गारंटी
NAAC और समान संस्थाएं इसलिए होती हैं ताकि विश्वविद्यालयों की पढ़ाई, संसाधन, फैकल्टी व प्रशासन मानकों पर हो। छात्र, अभिभावक व नियामक संस्था (जैसे University Grants Commission — UGC) भरोसे के साथ निर्णय ले सकें। इलेक्टिव संसाधन, सरकारी मदद, छात्रवृत्ति व मान्यता आदि का आधार तय हो।
अगर कोई संस्था बिना वैध एक्रेडिटेशन के खुद को “ग्रेड A” बताती है, तो यह न सिर्फ धोखा है, बल्कि छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।
क्या हो सकता है अगला कदम
NAAC अब अल-फलाह यूनिवर्सिटी (Al-Falah University) की जवाबी रिपोर्ट की समीक्षा कर सकती है। यदि संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो यह संस्था भविष्य के लिए एक्रेडिटेशन से वंचित हो सकती है।
साथ ही, इस मामले ने भारत के कई उच्च-शिक्षा संस्थानों में एक्रेडिटेशन की विश्वसनीयता पर भरोसा उठा दिया है, इसलिए नियामक संस्थाओं व सरकारों द्वारा समग्र समीक्षा की मांग उठ सकती है।
छात्रों और अभिभावकों को चाहिए कि विश्वविद्यालयों का चयन करते समय सिर्फ नाम या दावे नहीं, बल्कि उनकी वास्तविक मौजूदा मान्यता (accreditation validity) जरूर पूछें।
अल-फलाह यूनिवर्सिटी का मामला दिखाता है कि कितनी आसानी से एक्रेडिटेशन के दावे के नाम पर संस्थाएं धोखाधड़ी कर सकती हैं। यह सिर्फ एक संस्था का विवाद नहीं, बल्कि भारतीय उच्च-शिक्षा व्यवस्था में विश्वसनीयता, पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी का संकेत है। जैसा कि हाल की संख्या दिखाती है — करीब आधी विश्वविद्यालयों के पास वर्तमान में वैध NAAC एक्रेडिटेशन भी नहीं है।
अगर हम गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा व छात्रों के भविष्य के बारे में गंभीर हैं, तो अब समय आ गया है कि सिर्फ नामों पर भरोसा छोड़ें — और सुरक्षा, पारदर्शिता व जिम्मेदारी की मांग करें।




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