
भाजपा नेता सुजीत कुमार ने राज्यसभा में सरकार से अपील की कि स्कूल की पाठ्यपुस्तकों, एनसीईआरटी की किताबों, सरकारी दस्तावेजों और आधिकारिक वेबसाइटों में ब्रिटिश वायसरायों और गवर्नर जनरलों के लिए इस्तेमाल होने वाली ‘लॉर्ड’ की उपाधि को हटाया जाए। उनका कहना है कि यह प्रथा आज़ादी के 75 साल बाद भी औपनिवेशिक सोच को बढ़ावा देती है और अब समय है कि इस मानसिकता से बाहर निकला जाए।
“75 साल बाद भी बनी हुई है औपनिवेशिक भाषा”
शून्यकाल के दौरान सुजीत कुमार ने बताया कि स्कूली किताबों और सरकारी वेबसाइटों की आकस्मिक समीक्षा के दौरान उन्होंने पाया कि अभी भी कई जगह ब्रिटिश अधिकारियों को ‘लॉर्ड’ संबोधन से उल्लेखित किया जा रहा है। कुमार ने कहा कि यह शब्द उस दौर का प्रतीक है जब अंग्रेजी शासन भारतीयों पर अपनी श्रेष्ठता थोपता था।
उन्होंने बताया कि कक्षा 8 और कक्षा 12 की एनसीईआरटी इतिहास पुस्तकों में लॉर्ड कर्जन, लॉर्ड माउंटबेटन, लॉर्ड डलहौजी, लॉर्ड लिटन समेत अन्य औपनिवेशिक प्रशासकों का उल्लेख इसी उपाधि के साथ किया गया है। यही नहीं, संस्कृति मंत्रालय, प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB), भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और अब लोक भवन कहलाने वाले राजभवन जैसी कई संस्थाओं की वेबसाइटों पर भी यही संबोधन उपयोग में है।
“भारतीयों के खिलाफ अपराध करने वालों को ‘लॉर्ड’ क्यों?”
सांसद ने कहा कि ब्रिटिश शासन में उपाधियां सत्ता का दुरुपयोग थीं, जिन्हें नस्लीय श्रेष्ठता के भ्रम को बढ़ाने के लिए गढ़ा गया था। ऐसे में भारत को उन अधिकारियों को आज भी देवता समान पद देने जैसा सम्मान क्यों देना चाहिए, जिन्होंने भारतीयों के खिलाफ “कठोर और अमानवीय अत्याचार” किए?
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि जब देश अपने स्वतंत्रता सेनानियों को ऐसी उपाधि नहीं देता तो फिर उपनिवेशवादियों को यह सम्मान क्यों बने रहना चाहिए?
‘औपनिवेशिक मानसिकता’ के सफाए की मांग
सुजीत कुमार का कहना है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को ऐसी परंपराओं को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए, क्योंकि यह सामाजिक समानता और संवैधानिक मूल्यों के विरोध में जाती हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ करने का उल्लेख करते हुए कहा कि यह बदलाव सिर्फ नाम नहीं, बल्कि मानसिकता बदलने की दिशा में बड़ा कदम था।
‘गुलामी की सोच’ से मुक्ति जरूरी
कुमार ने प्रधानमंत्री मोदी के 76वें स्वतंत्रता दिवस के भाषण का उल्लेख किया, जिसमें पीएम ने ‘पंच प्रण’ यानी 2047 तक भारत के भविष्य के पांच संकल्पों की चर्चा की थी। इनमें दूसरा संकल्प—गुलामी की मानसिकता से पूरी तरह मुक्ति—विशेष रूप से इस मुद्दे की ओर इशारा करता है।
सांसद ने कहा, “हमारे जीवन, हमारी आदतों और हमारी व्यवस्थाओं में जहाँ कहीं भी गुलामी की मानसिकता के चिन्ह मौजूद हैं, उन्हें समाप्त करना ज़रूरी है। अब हमें उन प्रतीकों और शब्दों को त्याग देना चाहिए जो हमें उस दौर की याद दिलाते हैं।”
देश में बढ़ती इस मांग ने एक बार फिर औपनिवेशिक विरासत पर व्यापक बहस छेड़ दी है। क्या इतिहास को उसी स्वरूप में छोड़ दिया जाए, या फिर औपनिवेशिक प्रतीकों से जुड़े शब्दों को बदला जाए? आने वाले दिनों में सरकार के निर्णय से साफ होगा कि भारत अपनी शैक्षिक और आधिकारिक भाषा से ‘लॉर्ड’ जैसे संबोधनों को हटाकर क्या नया अध्याय शुरू करता है।




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