
भारत में ‘परीक्षा का मौसम’ किसी त्यौहार से कम नहीं होता, फर्क सिर्फ इतना है कि इस त्यौहार में उल्लास कम और तनाव ज्यादा होता है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, हर साल लाखों घरों में एक ही दृश्य आम होता है—मेज पर किताबों का ढेर, आँखों में नींद की कमी और भविष्य को लेकर एक अनजाना डर। इसी डर और भागदौड़ को खत्म करने के लिए शिक्षा के गलियारों में एक नए विचार ने जन्म लिया है— “वन नेशन, वन एग्ज़ाम”।
यह प्रस्ताव केवल नियमों का बदलाव नहीं है, बल्कि यह उस छात्र की कहानी बदलने की कोशिश है जो डॉक्टर बनने के लिए NEET देता है, इंजीनियर बनने के लिए JEE और सुरक्षित भविष्य के लिए यूनिवर्सिटी का CUET फॉर्म भरता है।
आखिर क्यों उठी बदलाव की माँग?
इस विचार की जड़ में एक आम भारतीय छात्र की पीड़ा छिपी है। आज की तारीख में, 12वीं कक्षा के बाद एक छात्र को औसतन तीन से चार बड़ी प्रवेश परीक्षाएं देनी पड़ती हैं।
जरा उस छात्र के बारे में सोचिए जो एक परीक्षा के लिए शहर आता है, फिर दूसरी परीक्षा के लिए किसी और तारीख पर यात्रा करता है। यह केवल थकान का मामला नहीं है, यह एक मध्यम वर्गीय पिता की जेब पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ का भी मामला है। अलग-अलग फॉर्म की फीस, आने-जाने का खर्च और हर परीक्षा के लिए अलग कोचिंग का दबाव—यह सब मिलकर शिक्षा को एक ‘महंगा सौदा’ बना देते हैं।
सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) का तर्क है कि अगर हम इन सभी परीक्षाओं (JEE, NEET, CUET) को मिला दें, तो छात्र को केवल एक बार अपनी काबिलियत साबित करनी होगी।
उम्मीदों का नया सवेरा: इसके फायदे
अगर यह व्यवस्था लागू होती है, तो इसके कई मानवीय पहलू सकारात्मक हो सकते हैं:
सुकून के पल: छात्रों को अब पूरे साल अलग-अलग तारीखों और सिलेबस के बीच झूलना नहीं पड़ेगा। ‘एक लक्ष्य, एक परीक्षा’ होने से उनका मानसिक तनाव कम हो सकता है।
समानता का अवसर: गांव देहात में बैठा बच्चा हो या मेट्रो शहर का छात्र—सबको एक ही मंच मिलेगा। कई बार अलग-अलग परीक्षाओं के अलग पैटर्न छात्रों को उलझा देते हैं। एक सामान्य परीक्षा सबको बराबर की रेस में ला सकती है।
संसाधनों की बचत: देश का लॉजिस्टिक्स, सुरक्षा और अभिभावकों का पैसा—सब कुछ बचेगा। जो ऊर्जा बार-बार परीक्षा कराने में खर्च होती है, उसका इस्तेमाल शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने में हो सकेगा।
लेकिन… डर भी कम नहीं है
हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। जहाँ यह प्रस्ताव राहत की उम्मीद जगाता है, वहीं छात्रों और शिक्षाविदों के मन में कुछ गंभीर सवाल भी हैं जो उन्हें सोने नहीं दे रहे।
1. ‘एक मौका’ और जोखिम बड़ा:
सबसे बड़ा डर यह है कि अगर यह ‘एकल परीक्षा’ (Single Exam) वाले दिन छात्र का स्वास्थ्य बिगड़ गया या उसका दिन खराब रहा, तो क्या होगा? अभी उसके पास दूसरे मौके होते हैं—JEE बिगड़ा तो CUET सहारा बन जाता है। लेकिन अगर सब कुछ एक ही परीक्षा पर निर्भर हो गया, तो यह ‘करो या मरो’ (Do or die) वाली स्थिति बन जाएगी। इससे उस एक दिन का तनाव जानलेवा हो सकता है।
2. विषय की गहराई:
क्या एक ही प्रश्नपत्र भावी डॉक्टर की बायोलॉजी की समझ और भावी इंजीनियर की गणितीय तर्कशक्ति को सही से माप पाएगा? विशेषज्ञों को डर है कि कहीं ‘सामान्यीकरण’ (Generalization) के चक्कर में हम गुणवत्ता से समझौता न कर बैठें।
3. तकनीकी चुनौतियाँ:
हम अभी भी पेपर लीक और सर्वर डाउन जैसी खबरों से जूझ रहे हैं। जब करोड़ों छात्र एक साथ एक ही सर्वर पर परीक्षा देंगे, तो क्या हमारा तंत्र (System) इतना मजबूत है कि वह बिना किसी गड़बड़ी के इसे संभाल सके? एक छोटी सी तकनीकी चूक लाखों सपनों पर पानी फेर सकती है।
राह अभी आसान नहीं
‘वन नेशन, वन एग्ज़ाम’ का विचार निस्संदेह क्रांतिकारी है और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की उस भावना के अनुरूप है जो छात्रों को रट्टू तोता बनाने के बजाय उन्हें लचीलापन देना चाहती है। लेकिन, इसे हकीकत में बदलने के लिए केवल ‘इरादा’ काफी नहीं है, ‘तैयारी’ भी पुख्ता होनी चाहिए। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि यह बदलाव छात्रों के लिए सुविधा बने, न कि एक नई भूलभुलैया।
अंततः, यह फैसला सिर्फ शिक्षा मंत्रालय का नहीं, बल्कि देश के भविष्य का है। हमें एक ऐसी व्यवस्था चाहिए जहाँ परीक्षा छात्र के ज्ञान की हो, न कि उसके धैर्य और नसीब की।
-अनन्या अवस्थी




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