
दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में कॉलेज का नाम बदलने को लेकर एक बार फिर विवाद खड़ा हो गया है। दयाल सिंह (ईवनिंग) कॉलेज का नाम सिख योद्धा बंदा सिंह बहादुर के नाम पर रखने की संभावित पहल ने शिक्षकों और कर्मचारियों के बीच गहरा विरोध पैदा कर दिया है। स्टाफ एसोसिएशन का कहना है कि यह कदम ऐतिहासिक विरासत, कानूनी दस्तावेजों और संस्थागत परामर्श—तीनों के खिलाफ है।
स्टाफ को जानकारी सार्वजनिक मंच से मिली
शिक्षकों ने बताया कि उन्हें इस प्रस्ताव के बारे में तब पता चला, जब कुलगुरु प्रो. योगेश सिंह ने 26 दिसंबर को वीर बाल दिवस के समारोह में अपने संबोधन के दौरान इसका सार्वजनिक उल्लेख किया। उन्होंने कहा था कि दयाल सिंह (ईवनिंग) कॉलेज का नाम बंदा सिंह बहादुर के नाम पर रखने का निर्णय अंतिम चरण में है।
शिक्षकों का आरोप है कि न तो स्टाफ काउंसिल से कोई चर्चा हुई, न छात्रों या गैर-शिक्षण कर्मचारियों से सलाह ली गई। इससे असंतोष और बढ़ गया है।
दोनो कॉलेज एक ही परिसर में चलते हैं
इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि दयाल सिंह (मॉर्निंग) और दयाल सिंह (ईवनिंग) कॉलेज एक ही परिसर से संचालित होते हैं। वर्ष 2017 में ईवनिंग कॉलेज को डे कॉलेज का दर्जा मिल गया था, लेकिन दोनों संस्थानों का संचालन अब भी एक ही भवन से होता है।
इसी मुद्दे को उठाते हुए स्टाफ एसोसिएशन ने 8 जनवरी की आपात बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर प्रशासन की प्रक्रिया पर आपत्ति जताई।
कानूनी अड़चनें: 1978 की ट्रांसफर डीड का हवाला
स्टाफ का सबसे बड़ा तर्क 22 जून 1978 की ट्रांसफर डीड है, जिसके आधार पर दयाल सिंह कॉलेज को दिल्ली विश्वविद्यालय को सौंपा गया था। डीड के क्लॉज-12 में स्पष्ट लिखा है कि कॉलेज का नाम ‘दयाल सिंह कॉलेज’ ही रहेगा।
शिक्षकों का कहना है कि यदि इस शर्त का उल्लंघन होता है, तो जमीन देने वाले ट्रस्ट के पास भूमि वापस लेने का अधिकार है। इससे कॉलेज को मौजूदा परिसर खाली करना पड़ सकता है, जो छात्रों और संस्थान—दोनों के लिए बड़ी समस्या बनेगा।
डीयू प्रशासन का पक्ष: दो डे कॉलेज एक नाम से नहीं चल सकते
दिल्ली विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार विकास गुप्ता ने कहा कि यह मुद्दा कार्यकारी परिषद की बैठक में रखा जाएगा। उनके अनुसार, दो डे कॉलेज एक ही नाम से संचालित नहीं हो सकते। उन्होंने देशबंधु और रामलाल आनंद कॉलेजों के पिछले उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा कि वहां भी नाम अलग किए गए थे। हालांकि, अभी इस प्रस्ताव को औपचारिक मंजूरी नहीं मिली है।
2017 में भी हुआ था जोरदार विरोध
यह पहली बार नहीं है जब कॉलेज का नाम बदलने का प्रयास हुआ है। वर्ष 2017 में ‘वंदे मातरम महाविद्यालय’ के नाम से कॉलेज का नया नामकरण प्रस्तावित किया गया था, जिसे व्यापक विरोध के बाद वापस लेना पड़ा था। स्टाफ एसोसिएशन ने उसी उदाहरण को दोहराते हुए मौजूदा प्रस्ताव को तुरंत वापस लेने, स्टाफ काउंसिल की बैठक जल्द बुलाने और सभी कानूनी दस्तावेज सार्वजनिक करने की मांग की है।
“ऐतिहासिक पहचान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता”
शिक्षकों का कहना है कि किसी भी नाम परिवर्तन से पहले संस्थापक दयाल सिंह मजीठिया की विरासत, कॉलेज की ऐतिहासिक पहचान और कानूनी मर्यादाओं को ध्यान में रखना जरूरी है। उनका तर्क है कि बिना पारदर्शिता और बिना संवाद के लिए जा रहा कोई भी कदम न कॉलेज के हित में है और न ही छात्रों के।
दिल्ली विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद की बैठक के बाद ही इस पर अंतिम निर्णय सामने आएगा। लेकिन फिलहाल, नाम बदलने का यह विवाद डीयू के भीतर गंभीर बहस का विषय बना हुआ है।




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