
केरल साहित्य महोत्सव (KLF) के नौवें संस्करण में प्रख्यात इतिहासकार रोमिला थापर ने इतिहास को लेकर चल रही मौजूदा बहसों पर स्पष्ट और मजबूत संदेश दिया। उन्होंने कहा कि इतिहास को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर पढ़ाना न तो वैज्ञानिक दृष्टि से सही है और न ही शिक्षा के हित में। उनके अनुसार, इतिहास किसी स्थिर तथ्य का संग्रह नहीं, बल्कि एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसमें समाज, संस्कृति, सोच और व्यवहार समय के साथ विकसित होते हैं।
थापर केरल साहित्य महोत्सव के ऑनलाइन सत्र में बोल रही थीं। उन्होंने सोशल मीडिया पर ‘पॉपुलर हिस्ट्री’ के बढ़ते चलन, नारीवादी इतिहास के महत्व और जिज्ञासा आधारित शिक्षा की जरूरत जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया ने इतिहास की जानकारी को लोकप्रिय तो बनाया है, लेकिन अक्सर ये जानकारियां आधी-अधूरी या सच से दूर होती हैं। ऐसे में इतिहास को समझने के लिए गंभीर अध्ययन और भरोसेमंद स्रोतों की भूमिका और भी बढ़ जाती है।
उन्होंने पाठ्यपुस्तकों में बदलावों पर भी अपनी बात रखी। थापर ने कहा, “आज जो हो रहा है—जैसे पाठ्यक्रम से इतिहास के कुछ हिस्सों को हटाना, या यह कहना कि कुछ अध्याय पढ़ने की जरूरत नहीं है—ये सब बेतुकी बातें हैं। इतिहास को काट-छांटकर समझा नहीं जा सकता। यह एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें लोगों, संस्कृतियों और सोच के तरीकों का विकास शामिल है।”
उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी राजवंश, खासकर मुगलों जैसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दौर, को किताबों से हटाना इतिहास को कमजोर करने जैसा है। थापर के अनुसार, इतिहास का हर कालखंड आने वाली पीढ़ियों को यह समझने में मदद करता है कि समाज कैसे बदलता है और किन वजहों से नई प्रणालियाँ, विचार और संरचनाएँ सामने आती हैं।
KLF के इस सत्र में थापर ने यह संदेश भी दिया कि शिक्षा का मूल उद्देश्य सवाल पूछने की क्षमता को बढ़ाना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब छात्र सवाल पूछते हैं, तो वे केवल इतिहास ही नहीं, बल्कि ज्ञान के हर क्षेत्र को बेहतर और गहराई से समझ पाते हैं।
उनके विचारों ने न केवल कार्यक्रम में मौजूद प्रतिभागियों, बल्कि ऑनलाइन जुड़े दर्शकों पर भी गहरी छाप छोड़ी। थापर के अनुसार, इतिहास को समझने के लिए उसके हर कालखंड को पूरी तरह देखना जरूरी है, न कि उसे मनमाने तरीके से छांटकर प्रस्तुत करना।




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