
उच्च शिक्षा के ढांचे में सुधार की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए मुंबई यूनिवर्सिटी ने 304 पुराने और निष्क्रिय पाठ्यक्रमों की परीक्षाएं बंद करने का निर्णय लिया है। विश्वविद्यालय के परीक्षा एवं मूल्यांकन बोर्ड के अनुसार, इनमें से 125 परीक्षाएं ऐसी थीं जिनमें पिछले दो से तीन शैक्षणिक वर्षों से एक भी छात्र ने पंजीकरण नहीं कराया था। वहीं 179 परीक्षाएं उन पाठ्यक्रमों से जुड़ी थीं जिन्हें बंद हुए दस साल से अधिक समय बीत चुका है।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि जिन 125 परीक्षाओं में लगातार वर्षों तक कोई रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ, उन्हें तत्काल प्रभाव से निष्क्रिय घोषित कर नियमित परीक्षा कैलेंडर से हटा दिया गया है।
किन स्ट्रीम्स पर असर?
बंद की गई परीक्षाओं में कॉमर्स और मैनेजमेंट स्ट्रीम की 23, ह्यूमैनिटीज की 15, इंटर-डिसिप्लिनरी की 42 और साइंस एवं टेक्नोलॉजी से जुड़ी 45 परीक्षाएं शामिल हैं। अधिकारियों का कहना है कि इन पाठ्यक्रमों में छात्र रुचि न के बराबर रह गई थी, जबकि परीक्षा प्रक्रिया के लिए प्रशासनिक ढांचा बनाए रखना पड़ रहा था।
जरूरत पड़ी तो फिर से हो सकती हैं परीक्षाएं
विश्वविद्यालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह फैसला पूरी तरह अंतिम नहीं है। यदि किसी संबद्ध कॉलेज या संस्थान की ओर से इन पाठ्यक्रमों में छात्रों के पंजीकरण का प्रस्ताव आता है, तो नियमानुसार परीक्षा आयोजित की जा सकती है। ऐसी स्थिति में परीक्षा कार्यक्रम, प्रश्नपत्र तैयार करना, परीक्षक नियुक्ति और अन्य प्रक्रिया सामान्य नियमों के तहत पूरी की जाएगी।
सिर्फ कटौती नहीं, सुधार की दिशा
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम केवल प्रशासनिक कटौती नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा में बदलाव का संकेत है। जब किसी कोर्स में लगातार वर्षों तक एक भी छात्र दाखिला नहीं ले रहा हो, तो उसके लिए परीक्षा तंत्र बनाए रखना संसाधनों की बर्बादी माना जाता है।
देश में लागू नई शिक्षा नीतियों और उद्योग की बदलती जरूरतों के बीच विश्वविद्यालयों पर पाठ्यक्रमों को अपडेट करने का दबाव बढ़ा है। स्किल आधारित शिक्षा, रोजगारपरक कोर्स और तकनीकी बदलावों के अनुरूप सिलेबस तैयार करना समय की मांग बन चुका है। ऐसे में अप्रासंगिक और कम मांग वाले पाठ्यक्रमों को हटाना सुधार की स्वाभाविक प्रक्रिया माना जा रहा है।
मुंबई यूनिवर्सिटी का यह निर्णय रजिस्ट्रेशन के आंकड़ों के विश्लेषण के बाद लिया गया है। माना जा रहा है कि इससे विश्वविद्यालय को संसाधनों का बेहतर उपयोग करने और नए, प्रासंगिक कोर्स विकसित करने में मदद मिलेगी।
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में यह कदम अन्य विश्वविद्यालयों के लिए भी एक संकेत है कि बदलते समय के साथ पाठ्यक्रमों की समीक्षा और पुनर्गठन जरूरी है।




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