
NCERT ने कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ विषय को लेकर उठे विवाद के बाद अपनी राष्ट्रीय पाठ्यक्रम एवं शिक्षण-सामग्री समिति (NSTC) का पुनर्गठन कर दिया है। यह कदम Supreme Court of India की सख्त टिप्पणी और हस्तक्षेप के बाद उठाया गया है।
नई समिति में 20 सदस्य, कई प्रमुख नाम शामिल
पुनर्गठन के बाद NSTC में अब कुल 20 सदस्य रह गए हैं, जबकि पहले इसकी संख्या 22 थी। नई समिति में शिक्षा और शोध क्षेत्र के कई प्रमुख नामों को शामिल किया गया है। इनमें V Kamakoti, Raghvendra Tanwar, R Venkata Rao और Amrendra Prasad Behera जैसे शिक्षाविद शामिल हैं।
यह बदलाव ऐसे समय में किया गया है, जब स्कूली पाठ्यक्रम को लेकर देशभर में बहस तेज है और शैक्षणिक सामग्री की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
तीन सदस्यों को हटाया गया
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद समिति से तीन सदस्यों को बाहर कर दिया गया है। इनमें Michel Danino, M D Srinivas और Bibek Debroy शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि Bibek Debroy का हाल ही में निधन भी हो चुका है।
क्या करती है यह समिति?
NSTC की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। यह समिति कक्षा 3 से 12 तक के छात्रों के लिए पाठ्यक्रम और शिक्षण सामग्री तैयार करती है। जरूरत पड़ने पर यह कक्षा 1 और 2 की किताबों में भी बदलाव कर सकती है, ताकि छोटे बच्चों के लिए पढ़ाई का संक्रमण सहज बनाया जा सके।
नई शिक्षा नीति और बदलते शैक्षणिक ढांचे के बीच इस समिति की जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है।
क्या था पूरा विवाद?
मामला फरवरी 2026 का है, जब Supreme Court of India ने कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ विषय को लेकर स्वतः संज्ञान लिया था। कोर्ट ने इस सामग्री को लेकर गंभीर आपत्ति जताई और किताब के प्रिंट व ऑनलाइन दोनों संस्करणों पर अस्थायी रूप से पूरी तरह रोक लगा दी थी।
इस फैसले के बाद शिक्षा क्षेत्र में कंटेंट की गुणवत्ता और संवेदनशील विषयों के चयन को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई थी।
क्यों किया गया पुनर्गठन?
NCERT के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, समिति का पुनर्गठन इसे और प्रभावी और मजबूत बनाने के उद्देश्य से किया गया है। साथ ही, यह सुनिश्चित करने की कोशिश है कि भविष्य में पाठ्यक्रम से जुड़े फैसले अधिक संतुलित और जिम्मेदार तरीके से लिए जाएं।
पाठ्यक्रम समिति में यह बदलाव सिर्फ एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में भरोसा बनाए रखने की दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि नई समिति किस तरह से पाठ्यपुस्तकों को तैयार करती है और विवादों से बचते हुए संतुलित सामग्री छात्रों तक पहुंचाती है।




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