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From Books to Screens: Is Students' Reading Proficiency Declining?

किताबों से स्क्रीन तक: क्या छात्रों की पढ़ने की क्षमता हो रही है कमजोर?

From Books to Screens: Is Students' Reading Proficiency Declining?

जैसे-जैसे छात्र पारंपरिक किताबों से डिजिटल स्क्रीन की ओर बढ़ रहे हैं, विशेषज्ञ एक नई समस्या को लेकर चिंता जता रहे हैं—‘रीडिंग स्टैमिना’ यानी लंबे समय तक ध्यान देकर पढ़ने की क्षमता में गिरावट। इसका असर न केवल एकाग्रता पर पड़ रहा है, बल्कि समझ, याद रखने की क्षमता और सीखने के परिणामों पर भी साफ दिखाई दे रहा है।

शिक्षकों, प्रकाशकों और स्कूल प्रशासकों का कहना है कि आज के छात्र तेजी से सारांश, नोट्स और क्विक-रेफरेंस सामग्री पर निर्भर होते जा रहे हैं। इससे पढ़ाई तेज जरूर हो रही है, लेकिन गहराई से समझने और विश्लेषण करने की क्षमता कमजोर पड़ रही है।

Koncept Global Books के मैनेजिंग पार्टनर अतिशय जैन के मुताबिक, “छात्र अब पढ़ाई के दौरान ज्यादा से ज्यादा सारांश और शॉर्टकट सामग्री का सहारा ले रहे हैं। ये उन्हें जल्दी पढ़ने में मदद करते हैं, लेकिन इससे उनकी समझने, तर्क करने और लंबे समय तक याद रखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। इसका असर उनके अकादमिक प्रदर्शन और लॉजिकल स्किल्स पर भी पड़ता है।”

विषय के अनुसार बदल रही पढ़ने की आदत

यह बदलाव सभी विषयों में एक जैसा नहीं है। Disha Publication के डायरेक्टर अविनाश अग्रवाल बताते हैं कि छात्रों की पढ़ने की प्राथमिकताएं अब विषय के अनुसार बदल रही हैं। इंजीनियरिंग और मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं जैसे विश्लेषणात्मक विषयों में छात्र अब भी किताबों और विस्तृत अध्ययन सामग्री पर भरोसा करते हैं, क्योंकि इन विषयों में कॉन्सेप्ट की गहराई और अभ्यास जरूरी होता है।

वहीं इतिहास या राजनीति विज्ञान जैसे सैद्धांतिक विषयों में छात्र अब विजुअल या संक्षिप्त सामग्री को ज्यादा पसंद कर रहे हैं। लंबे पाठ पढ़ने के बजाय वे छोटे और आसान फॉर्मेट की ओर झुक रहे हैं। इससे यह साफ है कि किताबें पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं, लेकिन उनकी भूमिका बदल रही है।

‘रीडिंग स्टैमिना’ क्यों बन रहा है मुद्दा?

UNESCO की 2025 की लिटरेसी रिपोर्ट के अनुसार, डिजिटल युग में साक्षरता का मतलब सिर्फ पढ़ना-लिखना नहीं रह गया है, बल्कि डिजिटल सामग्री को सुरक्षित और समझदारी से इस्तेमाल करना भी जरूरी हो गया है। स्कूलों, विश्वविद्यालयों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में अब छात्र किताबों की जगह मोबाइल, टैबलेट और लैपटॉप का ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं।

शिक्षकों का कहना है कि अब असली चुनौती यह नहीं है कि छात्र पढ़ते हैं या नहीं, बल्कि यह है कि वे किसी कठिन पाठ को समझने के लिए उस पर पर्याप्त समय दे पाते हैं या नहीं।

Vikalp Online School के फाउंडर और CEO दिनेश गुप्ता कहते हैं, “छात्रों का ध्यान अवधि कम होती जा रही है और वे जल्दी-जल्दी जानकारी पाने वाले कंटेंट को प्राथमिकता दे रहे हैं। इससे पढ़ाई आसान जरूर होती है, लेकिन गहराई, धैर्य और लगातार ध्यान देने की क्षमता पर असर पड़ता है। किताबें आज भी अनुशासन, धैर्य और आलोचनात्मक सोच विकसित करने में अहम भूमिका निभाती हैं।”

स्क्रीन कैसे बदल रही है पढ़ने का व्यवहार

डिजिटल माध्यम पर पढ़ाई तेज और सुविधाजनक जरूर है, लेकिन यह अक्सर बिखरी हुई होती है। बार-बार आने वाले नोटिफिकेशन ध्यान भंग करते हैं, हाइपरलिंक्स विषय से भटका देते हैं और एक साथ कई टैब खुले होने से एकाग्रता कम हो जाती है। छोटे-छोटे कंटेंट की आदत छात्रों को गहराई से पढ़ने के बजाय सिर्फ स्कैन करने की ओर ले जाती है।

OECD की 2026 डिजिटल एजुकेशन रिपोर्ट में भी कहा गया है कि तकनीक सीखने की गुणवत्ता को बेहतर बना सकती है, लेकिन इसका परिणाम इस बात पर निर्भर करता है कि उसका इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है।

Jaipuria Group of Educational Institutions के स्कूल और आईटी डायरेक्टर हरीश संडूजा के अनुसार, पढ़ने की गुणवत्ता दो चीजों पर निर्भर करती है—गति और समझ। “आज गहराई से पढ़ने की जगह स्किम रीडिंग बढ़ रही है, जहां छात्र लंबे पाठ के बजाय सारांश को प्राथमिकता देते हैं। शिक्षकों की जिम्मेदारी है कि वे पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा दें और छात्रों की समझने की क्षमता को मजबूत करें।”

हाइब्रिड मॉडल ही भविष्य

शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञ मानते हैं कि किताबों की प्रासंगिकता अभी खत्म नहीं हुई है, खासकर उन परीक्षाओं में जहां संरचित तैयारी और स्पष्ट समझ जरूरी होती है।

S Chand Group के CFO सौरभ मित्तल के अनुसार, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में प्रिंट सामग्री अब भी महत्वपूर्ण है, खासकर सरकारी परीक्षाओं में। हालांकि, CUET जैसे नए सेगमेंट में ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों का मिश्रण तेजी से बढ़ रहा है। प्रकाशक अब डिजिटल शिक्षकों और यूट्यूब क्रिएटर्स के साथ मिलकर हाइब्रिड मॉडल अपना रहे हैं।

संतुलन ही समाधान

शिक्षकों का मानना है कि यह बहस किताब बनाम स्क्रीन की नहीं है, बल्कि संतुलन की है। डिजिटल टूल्स जैसे ऑडियोबुक, सर्चेबल कंटेंट और मल्टीलिंगुअल प्लेटफॉर्म पढ़ाई को आसान बना सकते हैं, लेकिन सुविधा के चक्कर में समझौता नहीं होना चाहिए।

छात्रों के लिए जरूरी है कि वे डिजिटल और पारंपरिक दोनों माध्यमों का संतुलित उपयोग करें, ताकि न केवल जानकारी मिले, बल्कि उसे गहराई से समझने और लंबे समय तक याद रखने की क्षमता भी विकसित हो सके।

 

 

 

 

Asmita Sarkar

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