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India's Higher Education in a New Era: The 2035 Target of 50% GER and Mounting Challenges

भारत की उच्च शिक्षा नए दौर में, 2035 तक 50% GER का लक्ष्य और बढ़ती चुनौतियां

India's Higher Education in a New Era: The 2035 Target of 50% GER and Mounting Challenges

भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली एक निर्णायक दौर में प्रवेश कर रही है। National Education Policy (NEP) के तहत 2035 तक सकल नामांकन अनुपात (GER) को 50 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए आने वाले वर्षों में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की क्षमता में बड़े पैमाने पर विस्तार करना होगा। अब चुनौती सिर्फ दाखिले बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि गुणवत्तापूर्ण सीटें, संस्थान और रोजगार से जुड़ी राहें तैयार करना भी उतना ही जरूरी हो गया है।

भारत दुनिया की सबसे युवा बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जहां हर साल लाखों छात्र कॉलेज जाने की उम्र में पहुंचते हैं। इसके बावजूद उच्च शिक्षा में भागीदारी अभी भी क्षेत्रों और आय वर्गों के बीच असमान बनी हुई है।

नामांकन बढ़ा, लेकिन अंतर अभी भी कायम

All India Survey on Higher Education (AISHE) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, देश में उच्च शिक्षा में कुल नामांकन 4.3 करोड़ (43 मिलियन) से अधिक हो चुका है। रिपोर्ट में GER में धीरे-धीरे सुधार का संकेत भी मिला है, लेकिन कई राज्य अभी भी राष्ट्रीय औसत से पीछे हैं।

NEP का 50 प्रतिशत GER का लक्ष्य यह बताता है कि आने वाले वर्षों में लाखों नए छात्रों को उच्च शिक्षा से जोड़ना होगा।

वैश्विक संस्थाओं की भी यही सलाह

UNESCO की ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन देशों में युवा आबादी तेजी से बढ़ रही है, उन्हें उच्च शिक्षा, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और फैकल्टी विकास में लगातार निवेश करना होगा, तभी वे जनसंख्या को आर्थिक अवसर में बदल पाएंगे।

इस संदर्भ में भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार क्षमता का अहम आधार बनती जा रही है।

सरकारी संस्थानों की अहम भूमिका

सरकारी विश्वविद्यालय और कॉलेज आज भी सस्ती और सुलभ शिक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण माध्यम हैं। खासकर पहली पीढ़ी के शिक्षार्थियों और कम आय वाले परिवारों के लिए ये संस्थान उच्च शिक्षा तक पहुंच का मुख्य रास्ता बने हुए हैं।

हालांकि, इन संस्थानों में सीटें बढ़ाने के लिए लंबे समय तक निवेश, नए शिक्षकों की नियुक्ति और इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास जरूरी होता है। कई राज्य विश्वविद्यालय पहले से ही बड़ी संख्या में छात्रों को संभालते हुए गुणवत्ता और संसाधनों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती झेल रहे हैं। ऐसे में सरकारी संस्थानों को आगे बढ़ाने के लिए मजबूत नीतिगत और वित्तीय समर्थन की जरूरत होगी।

निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका

जैसे-जैसे मांग बढ़ेगी, निजी विश्वविद्यालय और सेल्फ-फाइनेंस्ड संस्थानों की हिस्सेदारी भी बढ़ने की संभावना है। कई राज्यों में निजी संस्थानों ने नए कोर्स, इंडस्ट्री से जुड़े प्रोग्राम और नए कैंपस के जरिए तेजी से विस्तार किया है।

इन संस्थानों की खासियत यह है कि वे तेजी से नए कोर्स शुरू कर सकते हैं और इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश कर सकते हैं। हालांकि, फीस ज्यादा होने के कारण सभी छात्रों के लिए इन तक पहुंच आसान नहीं होती। ऐसे में भविष्य की रणनीति में निजी निवेश के साथ स्कॉलरशिप, वित्तीय सहायता और मजबूत नियमन का संतुलन जरूरी होगा।

केवल सीटें बढ़ाना काफी नहीं

बहस अब सिर्फ इस बात की नहीं है कि कितने छात्र कॉलेज में दाखिला लेते हैं, बल्कि इस पर भी है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके पास रोजगार के कितने अवसर हैं।

India Skills Report बार-बार इस बात को सामने लाता रहा है कि डिग्री और रोजगार योग्य कौशल के बीच एक बड़ा अंतर मौजूद है। यही वजह है कि अब शिक्षा संस्थान टेक्नोलॉजी, हेल्थकेयर, डिजाइन, उद्यमिता और प्रैक्टिकल लर्निंग से जुड़े कोर्स पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।

ऑनलाइन और हाइब्रिड शिक्षा मॉडल भी खासकर टियर-2 और टियर-3 शहरों में पहुंच बढ़ाने में मददगार हो सकते हैं।

आने वाला दशक होगा निर्णायक

भारत की उच्च शिक्षा अब केवल पहुंच से आगे बढ़कर विस्तार और गुणवत्ता के चरण में पहुंच चुकी है। देश को अधिक कैंपस, अधिक शिक्षक, मजबूत डिजिटल सिस्टम और बेहतर शैक्षणिक परिणामों की जरूरत है।

सरकारी संस्थान समावेशन के लिए जरूरी रहेंगे, निजी संस्थान क्षमता बढ़ाने में मदद करेंगे और तकनीक शिक्षा की पहुंच को व्यापक बनाएगी। लेकिन असली फर्क वे संस्थान पैदा करेंगे जो सिर्फ सीटें नहीं बढ़ाएंगे, बल्कि छात्रों को बेहतर करियर, रोजगार और भरोसेमंद शिक्षा देंगे।

भारत की अगली विकास यात्रा सिर्फ उद्योगों पर नहीं, बल्कि कक्षाओं पर भी उतनी ही निर्भर करेगी।

 

 

 

 

Asmita Sarkar

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