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Over 80% of students fail Mumbai University's first-year BA-BCom exams; questions raised about the examination system

Mumbai University की BA-BCom प्रथम वर्ष की परीक्षा में 80% से अधिक छात्र असफल, परीक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल

Over 80% of students fail Mumbai University's first-year BA-BCom exams; questions raised about the examination system

मुंबई विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर डिस्टेंस एंड ऑनलाइन एजुकेशन (CDOE) द्वारा जारी प्रथम वर्ष बीए और बीकॉम के परीक्षा परिणामों ने छात्रों और शिक्षाविदों की चिंता बढ़ा दी है। जारी आंकड़ों के अनुसार, दोनों पाठ्यक्रमों में 80 प्रतिशत से अधिक छात्र सफल नहीं हो सके। परिणामों के सामने आने के बाद न केवल परीक्षा प्रणाली बल्कि छात्रों को मिलने वाले शैक्षणिक सहयोग और प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवाल उठने लगे हैं।

मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि परीक्षा संपन्न होने के लगभग चार महीने बाद परिणाम घोषित किए गए हैं। ऐसे में कम पास प्रतिशत और परिणाम जारी करने में हुई देरी दोनों ही मुद्दे छात्रों के बीच असंतोष का कारण बन रहे हैं।

बीकॉम में सिर्फ 18 फीसदी छात्र हुए पास

CDOE द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, प्रथम वर्ष बीकॉम के पहले सेमेस्टर की परीक्षा में कुल 2,543 छात्र शामिल हुए थे। इनमें से केवल 457 छात्र सफल घोषित किए गए, जबकि 2,086 छात्र असफल रहे।

इस प्रकार बीकॉम का कुल पास प्रतिशत लगभग 18 प्रतिशत रहा। यह आंकड़ा दर्शाता है कि परीक्षा में शामिल अधिकांश छात्र एक या अधिक विषयों में अपेक्षित अंक हासिल नहीं कर सके।

बीए का प्रदर्शन भी रहा कमजोर

बीए प्रथम वर्ष के परिणाम भी कुछ खास उत्साहजनक नहीं रहे। परीक्षा में कुल 2,224 छात्र शामिल हुए थे, जिनमें से केवल 460 छात्र पास हुए। वहीं 1,764 छात्र सफल नहीं हो सके।

बीए का पास प्रतिशत 20.68 प्रतिशत दर्ज किया गया, जिसका मतलब है कि पांच में से केवल एक छात्र ही परीक्षा में सफल रहा।

विश्वविद्यालय ने परिणामों का किया बचाव

कम पास प्रतिशत को लेकर उठ रहे सवालों के बीच मुंबई विश्वविद्यालय ने अपने परिणामों का बचाव किया है। विश्वविद्यालय का कहना है कि इस वर्ष के परिणाम पिछले वर्षों के आंकड़ों से बहुत अलग नहीं हैं।

विश्वविद्यालय के अनुसार, बीए का पास प्रतिशत पिछले वर्ष 23.35 प्रतिशत था, जो इस बार घटकर 20.68 प्रतिशत रह गया है। वहीं बीकॉम में पिछले वर्ष पास प्रतिशत 13 प्रतिशत था, जो इस वर्ष बढ़कर 18 प्रतिशत हो गया है। यानी बीकॉम में कुछ सुधार जरूर दर्ज किया गया है।

विश्वविद्यालय ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी छात्र को असफल घोषित किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि वह सभी विषयों में फेल हुआ है। यदि कोई छात्र एक या अधिक पेपर में न्यूनतम अंक प्राप्त नहीं कर पाता, तो उसे परिणाम में असफल श्रेणी में गिना जाता है।

चार महीने बाद घोषित हुए परिणाम

छात्रों और अभिभावकों की नाराजगी का एक बड़ा कारण परिणाम जारी करने में हुई देरी भी है। परीक्षा के करीब चार महीने बाद परिणाम घोषित किए गए, जिससे अगले सेमेस्टर और शैक्षणिक योजना पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

पिछले कुछ वर्षों में भी CDOE को लेकर कई शिकायतें सामने आती रही हैं। इनमें प्रवेश प्रक्रिया में देरी, अध्ययन सामग्री समय पर उपलब्ध नहीं होना, परीक्षा प्रबंधन से जुड़े मुद्दे और परिणाम जारी करने में विलंब जैसे मामले शामिल हैं।

क्या अकादमिक सहयोग की कमी बनी वजह?

कम सफलता दर के बाद विश्वविद्यालय के कुछ सीनेट सदस्यों और छात्र प्रतिनिधियों ने यह सवाल उठाया है कि क्या छात्रों को पर्याप्त शैक्षणिक सहयोग और अध्ययन सामग्री उपलब्ध नहीं कराई गई।

उनका कहना है कि यदि इतने बड़े पैमाने पर छात्र असफल हुए हैं, तो केवल छात्रों की तैयारी को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं होगा। इसके बजाय विश्वविद्यालय को पूरी शैक्षणिक और प्रशासनिक व्यवस्था की समीक्षा करनी चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि डिस्टेंस एजुकेशन में पढ़ने वाले छात्रों के लिए समय पर अध्ययन सामग्री, ऑनलाइन मार्गदर्शन और नियमित शैक्षणिक सहायता बेहद महत्वपूर्ण होती है। इनमें किसी भी प्रकार की कमी सीधे परिणामों को प्रभावित कर सकती है।

युवा सेना ने की समीक्षा की मांग

परिणामों को लेकर राजनीतिक और छात्र संगठनों ने भी प्रतिक्रिया दी है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) की छात्र इकाई युवा सेना के प्रतिनिधिमंडल ने मुंबई विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार डॉ. प्रसाद करांडे से मुलाकात कर परिणामों की समीक्षा की मांग की है।

प्रतिनिधिमंडल में वर्तमान और पूर्व सीनेट सदस्य भी शामिल थे। उनका कहना है कि जब इतने बड़े स्तर पर छात्र असफल हो रहे हैं, तो विश्वविद्यालय को पूरे मामले की जांच कर यह पता लगाना चाहिए कि समस्या छात्रों की तैयारी में है या प्रणालीगत खामियों में।

युवा सेना के सीनेट सदस्य प्रदीप सावंत ने कहा कि इतने कम पास प्रतिशत को सामान्य मानकर नहीं देखा जा सकता। विश्वविद्यालय को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि छात्रों को गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री, समय पर सहायता और पारदर्शी परीक्षा व्यवस्था उपलब्ध हो।

छात्रों के लिए आगे क्या?

फिलहाल छात्र परिणामों की समीक्षा और विश्वविद्यालय की संभावित प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहे हैं। यदि समीक्षा प्रक्रिया शुरू होती है, तो परीक्षा प्रणाली, मूल्यांकन प्रक्रिया और शैक्षणिक सहायता तंत्र से जुड़े कई मुद्दों की जांच हो सकती है।

मुंबई विश्वविद्यालय के डिस्टेंस एजुकेशन कार्यक्रम में पढ़ रहे हजारों छात्रों के लिए यह मामला केवल परिणामों का नहीं, बल्कि उनकी शैक्षणिक प्रगति और भविष्य की योजनाओं से भी जुड़ा हुआ है।

 

 

Asmita Sarkar

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