
भारत के उच्च शिक्षा क्षेत्र को लेकर केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। सरकार के अनुसार, नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क (NIRF) की शुरुआत के बाद वैश्विक स्तर पर भारतीय विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों की पहचान मजबूत हुई है। इसका असर अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में भी दिखाई दे रहा है। लोकसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक, QS वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग में शामिल भारतीय संस्थानों की संख्या 11 से बढ़कर 52 हो गई है।
शिक्षा राज्य मंत्री सुकांत मजूमदार ने लोकसभा में लिखित जवाब में बताया कि NIRF ने देश के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के बीच गुणवत्ता सुधार और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि रैंकिंग प्रणाली ने संस्थानों को शिक्षण, शोध और नवाचार के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रेरित किया है।
2015 में शुरू हुआ था NIRF
केंद्र सरकार ने वर्ष 2015 में नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क (NIRF) की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य देश के विश्वविद्यालयों, इंजीनियरिंग संस्थानों, प्रबंधन संस्थानों, मेडिकल कॉलेजों और अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों का मूल्यांकन कर उनकी वार्षिक रैंकिंग जारी करना है।
NIRF को भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों के प्रदर्शन को मापने के लिए एक मानक व्यवस्था के रूप में विकसित किया गया। इससे छात्रों और अभिभावकों को संस्थानों की गुणवत्ता का आकलन करने में भी मदद मिलती है।
इन पांच मानकों पर तय होती है रैंकिंग
NIRF रैंकिंग पांच प्रमुख मानकों के आधार पर तैयार की जाती है। इनमें शिक्षण, सीखने की गुणवत्ता और उपलब्ध संसाधन, शोध एवं पेशेवर गतिविधियां, स्नातक परिणाम, पहुंच और समावेशिता तथा संस्थान की सार्वजनिक प्रतिष्ठा शामिल हैं।
इन मानकों के जरिए संस्थानों की शैक्षणिक गुणवत्ता, शोध क्षमता और छात्रों के लिए उपलब्ध अवसरों का मूल्यांकन किया जाता है। यही कारण है कि NIRF को भारत की सबसे महत्वपूर्ण उच्च शिक्षा रैंकिंग प्रणाली माना जाता है।
तेजी से बढ़ रही है संस्थानों की भागीदारी
सरकार के आंकड़ों के अनुसार, NIRF में भाग लेने वाले संस्थानों की संख्या पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है। वर्ष 2021 में NIRF के लिए 6,272 आवेदन प्राप्त हुए थे, जबकि 2025 तक यह संख्या बढ़कर 14,163 पहुंच गई।
इसी तरह NIRF में हिस्सा लेने वाले अलग-अलग संस्थानों की संख्या भी 2021 में 4,030 थी, जो 2025 में बढ़कर 7,692 हो गई। यह वृद्धि दर्शाती है कि देश के अधिक से अधिक विश्वविद्यालय और कॉलेज अपनी गुणवत्ता का मूल्यांकन कराने और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने के लिए आगे आ रहे हैं।
उच्च शिक्षा सुधार के लिए चल रही हैं कई योजनाएं
केंद्र सरकार का कहना है कि उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं लागू की गई हैं। इनमें प्रधानमंत्री उच्चतर शिक्षा अभियान (PM-USHA), राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (RUSA) और मल्टी-डिसिप्लिनरी एजुकेशन एंड रिसर्च यूनिवर्सिटीज (MERU) जैसी पहलें शामिल हैं।
इन योजनाओं के जरिए राज्यों के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, शोध गतिविधियों को बढ़ावा देने और शिक्षण गुणवत्ता में सुधार पर काम किया जा रहा है।
विश्वस्तरीय संस्थान बनाने पर जोर
सरकार ने यह भी बताया कि वर्ष 2017 में शुरू की गई इंस्टीट्यूशंस ऑफ एमिनेंस (IoE) योजना का उद्देश्य चुनिंदा संस्थानों को अधिक अकादमिक, प्रशासनिक और वित्तीय स्वायत्तता प्रदान करना है। इससे संस्थानों को वैश्विक स्तर की शिक्षा और शोध सुविधाएं विकसित करने में मदद मिलती है।
सरकार का मानना है कि इस पहल के जरिए भारतीय विश्वविद्यालयों की अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में स्थिति और मजबूत हो सकती है।
NEP 2020 के तहत हो रहे बदलाव
लोकसभा में दिए गए जवाब में यह भी बताया गया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत उच्च शिक्षा क्षेत्र में व्यापक सुधार किए जा रहे हैं। नीति में बहुविषयक शिक्षा, शोध एवं नवाचार, आधुनिक बुनियादी ढांचे, आलोचनात्मक सोच, डिजिटल शिक्षा और शिक्षक प्रशिक्षण पर विशेष जोर दिया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन सुधारों का प्रभाव आने वाले वर्षों में भारतीय विश्वविद्यालयों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा और शोध क्षमता पर दिखाई देगा। QS जैसी अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में भारतीय संस्थानों की बढ़ती संख्या इसी दिशा में एक सकारात्मक संकेत मानी जा रही है।




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