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'Vande Mataram' to resonate from the Red Fort upon the completion of 150 years; a historic moment to be created on Independence Day 2026

150 साल पूरे होने पर लाल किले से गूंजेगा ‘वंदे मातरम्’, स्वतंत्रता दिवस 2026 पर बनेगा ऐतिहासिक पल

'Vande Mataram' to resonate from the Red Fort upon the completion of 150 years; a historic moment to be created on Independence Day 2026

भारत के स्वतंत्रता संग्राम की यादों को पिछले 150 वर्षों से संजोए हुए राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ इस स्वतंत्रता दिवस पर एक नए और ऐतिहासिक मुकाम पर पहुंचने जा रहा है। पहली बार 15 अगस्त के आधिकारिक समारोह के दौरान दिल्ली के लाल किले की प्राचीर से वंदे मातरम् का पूर्ण गायन किया जाएगा।

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित और वर्ष 1882 में उपन्यास ‘आनंदमठ’ में प्रकाशित वंदे मातरम् भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक शक्तिशाली प्रेरक गीत बन गया था। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस समारोह में राष्ट्रीय गान से पहले वंदे मातरम् प्रस्तुत किया जाएगा। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले पर तिरंगा फहराएंगे और देश को संबोधित करेंगे।

लाल किले पर वंदे मातरम् क्यों गाया जा रहा है?

स्वतंत्रता दिवस 2026 के समारोह में वंदे मातरम् का शामिल होना एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने हाल ही में राष्ट्रीय सम्मान (संशोधन) विधेयक, 2026 को मंजूरी दी है। इस संशोधन के तहत वंदे मातरम् के गायन में जानबूझकर बाधा डालने या उसे बाधित करने पर भी वही कानूनी संरक्षण लागू होगा जो राष्ट्रीय गान को प्राप्त है।

इस बार समारोह की सबसे खास बात यह होगी कि वंदे मातरम् के केवल शुरुआती हिस्से नहीं, बल्कि इसके सभी छह पद (स्तंभ) गाए जाएंगे। आमतौर पर सार्वजनिक कार्यक्रमों में इसका संक्षिप्त संस्करण ही प्रस्तुत किया जाता रहा है।

पहले लाल किले पर वंदे मातरम् का पूर्ण गायन क्यों नहीं होता था?

कई दशकों तक आधिकारिक समारोहों में वंदे मातरम् के केवल पहले दो पदों का ही उपयोग किया जाता रहा। इसके पीछे ऐतिहासिक और धर्मनिरपेक्षता से जुड़ी चिंताएं थीं। गीत के बाद के पदों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी हिंदू देवियों का उल्लेख मिलता है। कुछ वर्गों को आशंका थी कि पूर्ण संस्करण का गायन राष्ट्रभक्ति की बजाय धार्मिक भावनाओं से जोड़ा जा सकता है।

वर्ष 1937 में कांग्रेस ने राष्ट्रीय उपयोग के लिए वंदे मातरम् के पहले दो पदों को अपनाने का निर्णय लिया था और तब से यही संस्करण अधिकतर सरकारी समारोहों में सुनाई देता रहा।

हालांकि, वर्ष 2026 में यह परंपरा बदल गई। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दिशा-निर्देश जारी कर आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के सभी छह पदों के गायन का प्रावधान किया। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि जब वंदे मातरम् और राष्ट्रीय गान दोनों प्रस्तुत किए जाएं, तो वंदे मातरम् पहले गाया जाएगा।

इसके बाद राष्ट्रीय सम्मान (संशोधन) विधेयक, 2026 के पारित होने से राष्ट्रीय गीत को कानूनी संरक्षण और औपचारिक मान्यता भी मिली। यही वजह है कि स्वतंत्रता दिवस 2026 पर लाल किले से वंदे मातरम् का पूर्ण गायन एक ऐतिहासिक क्षण माना जा रहा है।

छात्रों के लिए क्या महत्व रखता है वंदे मातरम्?

युवा पीढ़ी और विद्यार्थियों के लिए वंदे मातरम् का महत्व केवल स्वतंत्रता दिवस पर इसे गाने तक सीमित नहीं है। यह गीत भारत के इतिहास, साहित्य, संगीत और राष्ट्रीय चेतना की उस शक्ति का प्रतीक है जिसने लाखों लोगों को स्वतंत्रता के लिए एकजुट किया।

वंदे मातरम् की कहानी छात्रों को यह समझने में मदद करती है कि विचार, साहित्य और संस्कृति किस तरह समाज को दिशा दे सकते हैं। राष्ट्रीय प्रतीकों के इतिहास को जानकर विद्यार्थी केवल किसी समारोह या राष्ट्रीय अवकाश का महत्व ही नहीं समझते, बल्कि उन संघर्षों और बलिदानों को भी जान पाते हैं जिनसे आधुनिक भारत का निर्माण हुआ है।

वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे

सरकार पूरे देश में वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित कर रही है। इस वर्ष की शुरुआत में इसके छह पदों वाले पूर्ण संस्करण के लिए दिशा-निर्देश भी जारी किए गए थे। लगभग 3 मिनट 10 सेकंड की अवधि वाले पूर्ण संस्करण का प्रसारण 26 मार्च से आकाशवाणी पर भी किया जा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस समारोह के निमंत्रण पत्र भी वंदे मातरम् की थीम पर आधारित हैं और उनमें गीत के सभी छह पदों के शब्द शामिल किए गए हैं।

स्वतंत्रता दिवस 2026 का एक ऐतिहासिक क्षण

इस बार 15 अगस्त का महत्व केवल तिरंगा फहराने और प्रधानमंत्री के संबोधन तक सीमित नहीं रहेगा। वह गीत जिसने कभी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को ऊर्जा और दिशा दी थी, अब स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े प्रतीकों में से एक लाल किले से गूंजेगा।

यह अवसर देश के छात्रों और युवाओं को यह याद दिलाता है कि इतिहास केवल किताबों के पन्नों तक सीमित नहीं होता। कई बार इतिहास स्वयं लौटकर नई पीढ़ी को उसकी जड़ों, उसके संघर्षों और उसके भविष्य की दिशा से परिचित कराता है।

 

Asmita Sarkar

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