
देश में संचालित विभिन्न स्कूल शिक्षा बोर्डों के बीच पाठ्यक्रम, मूल्यांकन प्रणाली और शैक्षणिक मानकों में मौजूद अंतर को लेकर एक संसदीय समिति ने चिंता जताई है। समिति ने सुझाव दिया है कि नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के अनुरूप देश के सभी 65 शिक्षा बोर्डों के लिए एक समान राष्ट्रीय नियामक ढांचा तैयार किया जाए, ताकि छात्रों को समान गुणवत्ता की शिक्षा और निष्पक्ष मूल्यांकन व्यवस्था मिल सके।
यह सिफारिश संसद की अनुमान समिति (Estimates Committee) की 2026-27 की दसवीं रिपोर्ट में की गई है, जिसे हाल ही में लोकसभा में प्रस्तुत किया गया। रिपोर्ट का विषय देश में सस्ती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने से जुड़े बजटीय और नीतिगत पहलुओं की समीक्षा है, जिसमें केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की कार्यप्रणाली का भी विश्लेषण शामिल है।
65 शिक्षा बोर्ड, लेकिन अलग-अलग मानक
समिति की रिपोर्ट के अनुसार भारत में वर्तमान समय में 65 स्कूल शिक्षा बोर्ड कार्यरत हैं। इनमें राष्ट्रीय स्तर के बोर्ड, राज्य शिक्षा बोर्ड, ओपन स्कूलिंग बोर्ड और अंतरराष्ट्रीय बोर्ड शामिल हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर CBSE, CISCE (Council for the Indian School Certificate Examinations) और राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (NIOS) प्रमुख बोर्ड हैं। इनके अलावा प्रत्येक राज्य का अपना शिक्षा बोर्ड है। वहीं, इंटरनेशनल बैकालॉरिएट (IB) और कैम्ब्रिज असेसमेंट इंटरनेशनल एजुकेशन (CAIE) जैसे अंतरराष्ट्रीय बोर्ड भी भारत में संचालित हो रहे हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जहां CBSE और CISCE जैसे बड़े बोर्डों ने गुणवत्ता नियंत्रण और परीक्षा प्रबंधन के लिए मजबूत व्यवस्थाएं विकसित की हैं, वहीं कई अन्य बोर्डों में पाठ्यक्रम, मूल्यांकन प्रक्रिया और प्रशासनिक दक्षता के स्तर पर काफी अंतर देखने को मिलता है।
छात्रों पर पड़ सकता है असर
समिति का मानना है कि अलग-अलग बोर्डों के बीच मौजूद यह असमानता केवल प्रशासनिक चुनौती नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर छात्रों के भविष्य पर भी पड़ सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जब विभिन्न बोर्डों के छात्र विश्वविद्यालयों और पेशेवर पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं, तब पाठ्यक्रम और मूल्यांकन के अलग-अलग मानक उनके बीच शैक्षणिक तैयारी और ज्ञान के स्तर में अंतर पैदा कर सकते हैं। इससे समान अवसर सुनिश्चित करने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
समिति ने चेतावनी दी है कि यदि इस दिशा में समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो देशभर में माध्यमिक शिक्षा के मानकीकरण की प्रक्रिया और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
नई शिक्षा नीति के अनुरूप एक राष्ट्रीय फ्रेमवर्क की मांग
समिति ने शिक्षा मंत्रालय से आग्रह किया है कि वह नई शिक्षा नीति 2020 के उद्देश्यों के अनुरूप एक एकीकृत राष्ट्रीय नियामक ढांचा तैयार करे। इस ढांचे का उद्देश्य सभी शिक्षा बोर्डों के संचालन, मूल्यांकन मानकों और साझा पाठ्यक्रम से जुड़े प्रमुख पहलुओं में समन्वय स्थापित करना होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसा ढांचा लागू होता है, तो देश के विभिन्न बोर्डों के बीच गुणवत्ता और मूल्यांकन के स्तर पर अधिक समानता लाई जा सकती है। इससे छात्रों को उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं में बेहतर अवसर मिल सकते हैं।
निजी शिक्षा बोर्डों पर भी बढ़ेगी निगरानी
रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण मुद्दे की ओर ध्यान दिलाया गया है। समिति ने कहा कि वर्तमान में निजी शिक्षा बोर्डों की स्थापना और विस्तार को नियंत्रित करने के लिए कोई व्यापक और अनिवार्य राष्ट्रीय नियामक प्रणाली मौजूद नहीं है।
इसे देखते हुए समिति ने सिफारिश की है कि किसी भी नए शिक्षा बोर्ड को मान्यता देने से पहले एक सख्त सिंगल-विंडो क्लीयरेंस सिस्टम लागू किया जाए। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि केवल निर्धारित मानकों को पूरा करने वाले बोर्ड ही संचालन की अनुमति प्राप्त करें।
छात्रों के लिए बनेगा डिजिटल सूचना मंच
छात्रों और अभिभावकों को गैर-मान्यता प्राप्त संस्थानों से बचाने के लिए समिति ने एक सार्वजनिक डिजिटल रिपॉजिटरी बनाने का भी सुझाव दिया है। इस डिजिटल प्लेटफॉर्म पर देश के सभी मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय, राज्य और अंतरराष्ट्रीय शिक्षा बोर्डों की जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी।
समिति का मानना है कि इस तरह की पारदर्शी व्यवस्था छात्रों को सही जानकारी उपलब्ध कराने के साथ-साथ फर्जी या गैर-मान्यता प्राप्त बोर्डों से जुड़े जोखिमों को भी कम करेगी।
शिक्षा व्यवस्था में एकरूपता की दिशा में बड़ा कदम
भारत की स्कूल शिक्षा व्यवस्था तेजी से बदल रही है और नई शिक्षा नीति के तहत पाठ्यक्रम, मूल्यांकन और सीखने के तरीकों में कई सुधार किए जा रहे हैं। ऐसे समय में संसदीय समिति की यह सिफारिश शिक्षा क्षेत्र में एकरूपता और गुणवत्ता सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
यदि केंद्र सरकार इस सुझाव पर आगे बढ़ती है, तो आने वाले वर्षों में देश के विभिन्न शिक्षा बोर्डों के बीच मौजूद अंतर कम हो सकता है और छात्रों को अधिक समान, पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी शैक्षणिक वातावरण मिल सकता है।




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