
भारत में हर साल लाखों युवा कॉलेज और यूनिवर्सिटी से डिग्री लेकर रोजगार की तलाश में निकलते हैं। उच्च शिक्षा तक पहुंच बढ़ने के बावजूद डिग्री और नौकरी के बीच का अंतर अभी भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। कई युवाओं के पास शैक्षणिक योग्यता तो है, लेकिन नौकरी में सीधे काम आने वाली स्किल, प्रैक्टिकल अनुभव और इंडस्ट्री की समझ की कमी है।
नीति आयोग की अगस्त 2026 में जारी रिपोर्ट “Reimagining Skilling for Viksit Bharat@2047” ने देश के स्किलिंग सिस्टम की मौजूदा स्थिति और उसकी चुनौतियों का विस्तृत आकलन किया है। रिपोर्ट में शिक्षा, स्किल ट्रेनिंग और रोजगार के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत पर जोर दिया गया है।
डिग्री और नौकरी के बीच कितना बड़ा अंतर?
रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बड़ी संख्या में युवा सामान्य स्नातक पाठ्यक्रमों में पढ़ रहे हैं। करीब 3.4 करोड़ छात्र अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम में दाखिल हैं। इनमें लगभग 1.13 करोड़ छात्र बीए कर रहे हैं, जबकि बीए, बीएससी और बीकॉम में कुल मिलाकर 2 करोड़ से ज्यादा विद्यार्थी पढ़ रहे हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि इन सामान्य डिग्री कोर्सों का रोजगार से जुड़ाव कई मामलों में कमजोर है।
स्थिति की गंभीरता इस बात से भी समझी जा सकती है कि रिपोर्ट में दिए गए एक आंकड़े के अनुसार, केवल 8.25 फीसदी ग्रेजुएट ही ऐसी नौकरियों में काम कर रहे हैं, जो उनकी शैक्षणिक योग्यता से सीधे जुड़ी हैं। यह आंकड़ा शिक्षा और नौकरी के बीच मौजूद अंतर की ओर इशारा करता है।
इसका मतलब यह नहीं है कि बीए, बीकॉम या बीएससी जैसी डिग्रियां उपयोगी नहीं हैं। समस्या यह है कि इन डिग्रियों के साथ छात्रों को नौकरी के लिए जरूरी व्यावहारिक कौशल और काम का अनुभव पर्याप्त रूप से नहीं मिल पाता।
80 फीसदी छात्रों ने बताई प्रैक्टिकल अनुभव की कमी
नौकरी की तलाश के दौरान छात्रों को सबसे बड़ी परेशानी प्रैक्टिकल अनुभव और इंडस्ट्री एक्सपोजर की कमी से होती है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार करीब 80 फीसदी छात्रों ने प्रैक्टिकल अनुभव और इंडस्ट्री एक्सपोजर की कमी को बड़ी समस्या बताया।
इसके अलावा करीब 34 फीसदी छात्रों ने स्किल गैप, जबकि 18 फीसदी ने इंटरव्यू की तैयारी की कमी को रोजगार पाने में बाधा बताया।
इन आंकड़ों से साफ है कि सिर्फ परीक्षा पास करके डिग्री हासिल करना नौकरी के लिए पर्याप्त नहीं है। कंपनियों को ऐसे उम्मीदवारों की जरूरत होती है जो पढ़ाई में सीखी बातों को वास्तविक काम में इस्तेमाल कर सकें।
इसी वजह से कॉलेज के दौरान इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप, प्रोजेक्ट वर्क और इंडस्ट्री से जुड़े प्रशिक्षण की भूमिका बढ़ जाती है। नीति आयोग ने भी शिक्षा और काम के बीच मजबूत संबंध बनाने तथा अप्रेंटिसशिप के अवसर बढ़ाने पर जोर दिया है।
बीए, बीकॉम और बीएससी छात्रों को किन स्किल पर ध्यान देना चाहिए?
बीए, बीकॉम और बीएससी जैसे सामान्य डिग्री प्रोग्राम बड़ी संख्या में युवाओं को उच्च शिक्षा का अवसर देते हैं। लेकिन डिग्री के साथ अतिरिक्त रोजगार योग्य स्किल हासिल करना छात्रों के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है।
डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल, कम्युनिकेशन, डेटा से जुड़ी बुनियादी समझ, ऑफिस सॉफ्टवेयर, प्रेजेंटेशन, रिपोर्ट तैयार करना और इंटरव्यू की तैयारी जैसी क्षमताएं एंट्री-लेवल नौकरियों में उपयोगी हो सकती हैं। कॉमर्स के छात्रों के लिए अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर और वित्तीय कामकाज की समझ, जबकि आर्ट्स और साइंस के छात्रों के लिए डिजिटल काम, रिसर्च, कंटेंट, डेटा और कम्युनिकेशन से जुड़ी स्किल रोजगार के विकल्प बढ़ा सकती हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि हर छात्र को एक ही तरह की स्किल सीखनी चाहिए। बेहतर तरीका यह है कि छात्र अपनी डिग्री और जिस क्षेत्र में करियर बनाना चाहते हैं, उसके हिसाब से अतिरिक्त कौशल चुनें।
सरकारी नौकरी के लिए इतनी भीड़ क्यों?
नीति आयोग की रिपोर्ट ने सरकारी नौकरियों के प्रति युवाओं के भारी रुझान को भी रेखांकित किया है। नवंबर 2024 से जुलाई 2025 के बीच करीब 1.86 करोड़ आवेदन लगभग 55 हजार सरकारी पदों के लिए मिले।
यह आंकड़ा सरकारी रोजगार की मांग और उपलब्ध पदों के बीच बड़े अंतर को दिखाता है। बड़ी संख्या में युवा सरकारी नौकरी को स्थिरता और सुरक्षित करियर से जोड़कर देखते हैं। वहीं, उपलब्ध सरकारी पद सीमित होने के कारण प्रतियोगिता बेहद कड़ी है।
रिपोर्ट के अनुसार समाधान केवल सरकारी नौकरियों की संख्या बढ़ाना नहीं है। शिक्षा और स्किलिंग व्यवस्था को इस तरह तैयार करने की जरूरत है कि युवा निजी नौकरी, उद्यमिता, स्वरोजगार और दूसरे करियर विकल्पों के लिए भी तैयार हो सकें।
स्कूल स्तर से ही रोजगार वाली स्किल पर जोर
नीति आयोग ने स्किलिंग को केवल कॉलेज तक सीमित रखने के बजाय इसे स्कूल स्तर से मजबूत करने का सुझाव दिया है। रिपोर्ट में कक्षा 6 से रोजगार और उद्यमिता से जुड़ी सामान्य स्किल विकसित करने तथा कक्षा 9 से व्यवस्थित वोकेशनल ट्रैक को बढ़ाने की बात कही गई है। कक्षा 11 और 12 में General Employability and Entrepreneurship Skills को अलग विषय के रूप में जारी रखने का भी सुझाव दिया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार अभी स्कूली स्तर पर वोकेशनल शिक्षा की पहुंच भी सीमित है। इसलिए पढ़ाई और कौशल विकास को अलग-अलग व्यवस्था के बजाय एक-दूसरे से जोड़ने की जरूरत है।
शिक्षा को इंडस्ट्री की जरूरत से जोड़ना जरूरी
नीति आयोग ने स्किलिंग व्यवस्था में कई बड़े बदलावों का सुझाव दिया है। इनमें शिक्षा और इंडस्ट्री के बीच बेहतर तालमेल, अप्रेंटिसशिप को बढ़ावा देना, रोजगार के नतीजों पर आधारित स्किल प्रोग्राम और छात्रों को सही करियर विकल्प चुनने में बेहतर मार्गदर्शन शामिल हैं। रिपोर्ट में Digital Skills Passport और National Credit Framework जैसे सिस्टम को भी भविष्य की स्किलिंग व्यवस्था का हिस्सा बनाने की बात कही गई है।
भारत में उच्च शिक्षा हासिल करने वाले युवाओं की संख्या बढ़ना निश्चित रूप से सकारात्मक बदलाव है। लेकिन केवल डिग्री की संख्या बढ़ने से रोजगार की समस्या हल नहीं होगी। असली चुनौती यह है कि कॉलेज से निकलने वाला युवा काम की वास्तविक जरूरतों के लिए कितना तैयार है।
युवाओं के लिए संदेश साफ है—डिग्री जरूरी है, लेकिन डिग्री के साथ काम करने की क्षमता और प्रैक्टिकल अनुभव भी उतना ही जरूरी है। वहीं शिक्षण संस्थानों और इंडस्ट्री के बीच मजबूत सहयोग ही उस अंतर को कम कर सकता है, जो आज पढ़ाई और नौकरी के बीच दिखाई दे रहा है।




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