
देश के सबसे प्रतिष्ठित उच्च शिक्षण संस्थानों में गिने जाने वाले आईआईटी और आईआईएम में छात्रों की आत्महत्या के मामले एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। सरकार और संस्थानों की ओर से मानसिक स्वास्थ्य और छात्र कल्याण के लिए कई कदम उठाए जाने के बावजूद हाल की घटनाओं ने कैंपस में छात्रों की सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं और शिकायतों के समाधान की व्यवस्था पर बहस तेज कर दी है।
जनवरी 2021 से दिसंबर 2025 के बीच देश के आईआईटी में कम से कम 65 छात्रों की आत्महत्या से मौत का आंकड़ा सामने आया है। यह आंकड़ा ग्लोबल आईआईटी एलुमनाई सपोर्ट ग्रुप की ओर से जुटाई गई जानकारी पर आधारित है। इनमें 30 मामले 2024 और 2025 में सामने आए थे। हालांकि, यह आधिकारिक सरकारी आंकड़ा नहीं है, इसलिए इसे उपलब्ध रिपोर्टों और संगठन द्वारा जुटाए गए आंकड़ों के रूप में देखना जरूरी है।
2026 में भी जारी है चिंता
नए शैक्षणिक सत्र में भी देश के प्रमुख संस्थानों से छात्रों की मौत की घटनाएं सामने आई हैं। अगस्त 2026 में आईआईटी दिल्ली में 31 वर्षीय एमएससी फिजिक्स छात्र की कैंपस में मौत हुई। पुलिस के अनुसार छात्र ने 22 अगस्त को लेक्चर हॉल कॉम्प्लेक्स की छठी मंजिल से छलांग लगाई थी। मौके से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला और पुलिस घटना के कारणों की जांच कर रही है। 26 अगस्त को पुलिस ने इस मामले में अज्ञात लोगों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया है।
आईआईटी दिल्ली की घटना से पहले मार्च 2026 में भी संस्थान में एक छात्र की मौत हुई थी। हालिया घटनाओं के बाद छात्रों ने प्रदर्शन कर स्वतंत्र जांच और छात्र कल्याण व्यवस्था में सुधार की मांग की। संस्थान ने मामले की जांच के लिए पांच सदस्यीय बाहरी समिति बनाने की घोषणा की है।
इसी बीच बेंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) में 15 दिनों के भीतर दो छात्रों की मौत की घटनाएं सामने आईं। 22 अगस्त की रिपोर्ट के अनुसार, 22 वर्षीय एमटेक छात्र की मौत दूसरी ऐसी घटना थी। पुलिस दोनों मामलों की जांच कर रही है।
आईआईएम में भी ऐसी घटनाएं चिंता बढ़ा रही हैं। अगस्त 2026 में आईआईएम सिरमौर के धौला कुआं कैंपस में 19 वर्षीय बीएमएस छात्र की मौत का मामला सामने आया। पुलिस ने इसे आत्महत्या का मामला बताया और जांच शुरू की। बाद में मामले की जांच के लिए पांच सदस्यीय एसआईटी बनाई गई।
सरकार ने बनाई थी तीन सदस्यीय समिति
आईआईटी में लगातार सामने आ रही घटनाओं के बीच केंद्र सरकार ने जनवरी 2026 में तीन सदस्यीय समिति गठित की थी। इसका उद्देश्य आईआईटी कानपुर में छात्रों की आत्महत्या के मामलों की समीक्षा करना और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के उपाय सुझाना था। समिति को उच्च शिक्षण संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य और छात्रों की भलाई से जुड़ी व्यवस्थाओं को मजबूत करने पर भी सुझाव देने थे।
इसके अलावा, छात्र आत्महत्या के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित नेशनल टास्क फोर्स ने देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों में बड़े स्तर पर सर्वे और संस्थानों का अध्ययन किया। शिक्षा मंत्रालय के अनुसार, इस प्रक्रिया में लाखों छात्रों, शिक्षकों और अन्य पक्षों से जानकारी जुटाई गई।
मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में बड़ी कमी
सुप्रीम कोर्ट की टास्क फोर्स से जुड़े सर्वे के आंकड़े भी उच्च शिक्षण संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर सवाल उठाते हैं। 2,119 संस्थानों से मिले जवाबों में केवल 35 प्रतिशत संस्थानों ने बताया कि छात्रों को मानसिक स्वास्थ्य सेवा देने वाले विशेषज्ञों तक पहुंच उपलब्ध है। करीब 65 प्रतिशत संस्थानों में ऐसी सुविधा उपलब्ध नहीं थी। वहीं, 73 प्रतिशत यानी 1,573 संस्थानों में कोई पूर्णकालिक मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ नहीं था।
इससे यह सवाल उठता है कि केवल काउंसलिंग सेंटर या हेल्पलाइन शुरू करना पर्याप्त है या छात्रों को नियमित और भरोसेमंद मानसिक स्वास्थ्य सहायता देने के लिए कैंपस में प्रशिक्षित विशेषज्ञों की स्थायी व्यवस्था भी जरूरी है।
34 फीसदी छात्रों ने खुद को कैंपस में ‘बाहरी’ माना
देशभर में छात्रों की मानसिक स्थिति को लेकर किए गए बड़े सर्वे में भी चिंताजनक संकेत सामने आए हैं। 2.4 लाख से अधिक छात्रों के जवाबों में 34 फीसदी ने कहा कि वे अपने कैंपस में खुद को बाहरी महसूस करते हैं। केवल 56 फीसदी छात्रों ने माना कि गंभीर समस्याओं से निपटने में उन्हें अपने संस्थान के प्रशासन पर भरोसा है।
सर्वे में करीब 15 फीसदी छात्रों ने पिछले छह महीनों में लंबे समय तक तनाव, चिंता या उदासी जैसी स्थिति से गुजरने की बात कही। वहीं, 9 फीसदी छात्रों ने बताया कि पिछले एक साल में उन्हें अक्सर या बहुत ज्यादा आत्महत्या के विचार आए थे।
ये आंकड़े बताते हैं कि समस्या केवल पढ़ाई के दबाव तक सीमित नहीं है। कैंपस का माहौल, अकेलापन, भेदभाव, आर्थिक परेशानी, सामाजिक अलगाव और संस्थान से मदद मिलने का भरोसा भी छात्रों की मानसिक स्थिति को प्रभावित कर सकता है।
भाषा, जाति और आर्थिक स्थिति से जुड़ी चुनौतियां भी अहम
आईआईटी जैसे संस्थानों में देश के अलग-अलग राज्यों और सामाजिक पृष्ठभूमि से छात्र पहुंचते हैं। ऐसे में भाषा, सामाजिक पृष्ठभूमि, जाति और आर्थिक स्थिति से जुड़े अंतर भी कुछ छात्रों के लिए चुनौती बन सकते हैं। अगर किसी छात्र को लगातार यह महसूस हो कि वह बाकी छात्रों से अलग है या उसे पर्याप्त स्वीकार्यता नहीं मिल रही, तो उसका अकेलापन और तनाव बढ़ सकता है।
हालांकि, किसी एक घटना को केवल भेदभाव, पढ़ाई या किसी एक कारण से जोड़ना सही नहीं होगा। आत्महत्या के पीछे कई व्यक्तिगत और सामाजिक कारण हो सकते हैं और हर मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए किसी छात्र की मौत के कारणों पर अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही निकाला जाना चाहिए।
केवल काउंसलिंग नहीं, भरोसे का माहौल जरूरी
आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों में दाखिला हासिल करना छात्रों के लिए बड़ी उपलब्धि होती है। लेकिन प्रवेश के बाद तेज पढ़ाई, लगातार मूल्यांकन, प्रतियोगिता, भविष्य और नौकरी को लेकर चिंता कई छात्रों के लिए दबाव बढ़ा सकती है। ऐसे में संस्थानों के लिए यह जरूरी है कि छात्र मदद मांगने में डरें नहीं और उन्हें यह भरोसा हो कि उनकी परेशानी को गंभीरता से सुना जाएगा।
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की स्थायी उपलब्धता, गोपनीय काउंसलिंग, शिक्षकों और वार्डन की संवेदनशील भूमिका, शिकायतों का समय पर समाधान और भेदभाव के खिलाफ प्रभावी व्यवस्था इस दिशा में अहम हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट की टास्क फोर्स ने भी पाया कि कई संस्थानों में छात्र कल्याण से जुड़ी समितियां और व्यवस्थाएं कागज पर मौजूद थीं, लेकिन वे हमेशा प्रभावी, पारदर्शी या छात्र-अनुकूल नहीं थीं।
आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों की सफलता केवल अच्छे प्लेसमेंट और बेहतर रैंकिंग से नहीं मापी जा सकती। छात्रों के लिए सुरक्षित, सहयोगी और भरोसेमंद कैंपस बनाना भी उतना ही जरूरी है। हाल की घटनाएं यही सवाल सामने रखती हैं कि बनाई गई नीतियां और समितियां जमीन पर छात्रों तक कितनी पहुंच रही हैं और जरूरत के समय उन्हें वास्तविक मदद मिल रही है या नहीं।




Add comment