
Jamia Student Union Election: दिल्ली की Jamia Millia Islamia देश के प्रमुख केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शामिल है। राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ी अपनी विरासत, मजबूत शैक्षणिक पहचान और सक्रिय कैंपस संस्कृति के कारण जामिया का नाम देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में लिया जाता है। लेकिन छात्र राजनीति के मामले में जामिया की व्यवस्था दूसरे कई विश्वविद्यालयों से अलग है। यहां लंबे समय से नियमित छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि जामिया में छात्रों की आवाज या प्रतिनिधित्व की कोई व्यवस्था नहीं है। विश्वविद्यालय के स्तर पर छात्रसंघ का प्रावधान मौजूद है, लेकिन चुनाव और छात्रसंघ की स्थिति लंबे समय से विवाद और कानूनी प्रक्रिया से जुड़ी रही है। विश्वविद्यालय की अपनी एक रिपोर्ट में भी कहा गया है कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया एक्ट में छात्रसंघ बनाने का प्रावधान है, लेकिन संबंधित मामला अदालत में विचाराधीन होने के कारण उस समय सक्रिय छात्रसंघ नहीं था।
जामिया में छात्रसंघ चुनाव क्यों नहीं होते?
जामिया में छात्रसंघ चुनाव न होने की वजह को केवल एक प्रशासनिक आदेश या एक फैसले से समझना सही नहीं होगा। इसका इतिहास कई वर्षों से चले आ रहे प्रशासनिक फैसलों, छात्र राजनीति और अदालत से जुड़े मामलों से जुड़ा है।
पुराने रिकॉर्ड और मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनावों पर लंबे समय से रोक जैसी स्थिति रही है। 2012 में तत्कालीन कुलपति नजीब जंग ने कहा था कि विश्वविद्यालय में छात्रों का चुनाव हो सकता है, लेकिन इसे गैर-राजनीतिक और व्यापक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था के रूप में देखा जाना चाहिए। उस समय विश्वविद्यालय की ओर से यह भी कहा गया था कि छात्रसंघ के प्रशासनिक मामलों में दखल को लेकर विवाद के बाद चुनाव बंद हुए थे। वहीं, एक RTI जवाब में विश्वविद्यालय ने कहा था कि कैंपस में छात्रसंघ चुनाव पर कोई स्थायी प्रतिबंध नहीं है और जब परिसर का माहौल अनुकूल रहा है, तब छात्रसंघ मौजूद रहा है।
इसलिए यह कहना कि जामिया में छात्रसंघ चुनाव हमेशा के लिए प्रतिबंधित हैं, पूरी तस्वीर नहीं बताता। ज्यादा सही बात यह है कि विश्वविद्यालय में नियमित निर्वाचित छात्रसंघ की व्यवस्था लंबे समय से सक्रिय नहीं है और इसके पीछे प्रशासनिक तथा कानूनी दोनों पहलू रहे हैं।
अनुशासन और शैक्षणिक माहौल भी अहम मुद्दा
जामिया प्रशासन के नजरिए से कैंपस में पढ़ाई, अनुशासन और सामान्य शैक्षणिक गतिविधियों को बनाए रखना महत्वपूर्ण रहा है। छात्र राजनीति को लेकर विश्वविद्यालय में समय-समय पर विवाद भी सामने आते रहे हैं।
हाल के वर्षों में भी छात्र संगठनों और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच विरोध-प्रदर्शन और अनुशासन को लेकर टकराव की खबरें सामने आई हैं। 2025 में छात्र प्रदर्शन के दौरान विश्वविद्यालय के नियमों और छात्रों की गतिविधियों को लेकर विवाद हुआ था। इस दौरान छात्र संगठनों ने छात्र अधिकारों और प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाया था।
यही वजह है कि जामिया में छात्र राजनीति पर चर्चा सिर्फ चुनाव कराने तक सीमित नहीं रहती। इसमें यह सवाल भी शामिल होता है कि छात्र संगठनों की गतिविधियों, विरोध-प्रदर्शन और प्रशासन के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
फिर छात्रों की आवाज प्रशासन तक कैसे पहुंचती है?
छात्रसंघ के सक्रिय न होने के बावजूद जामिया में छात्रों के प्रतिनिधित्व के दूसरे तरीके मौजूद हैं। विश्वविद्यालय की रिपोर्ट के अनुसार, अलग-अलग विभागों और कार्यक्रमों में Subject Associations के जरिए छात्रों को अकादमिक और प्रशासनिक स्तर पर प्रतिनिधित्व दिया जाता है। इन एसोसिएशनों के सदस्यों का चयन संबंधित छात्रों के बीच किया जाता है।
जामिया के विभागों में इस तरह के चुनाव भी हुए हैं। उदाहरण के तौर पर, नवंबर 2023 में डिपार्टमेंट ऑफ कॉमर्स एंड बिजनेस स्टडीज में Subject Association का चुनाव कराया गया था। इसमें छात्रों ने क्लास प्रतिनिधियों का चुनाव किया था, जबकि कुछ प्रतिनिधियों का चयन विश्वविद्यालय की व्यवस्था के अनुसार नामांकन से हुआ।
हालांकि, Subject Association को एक पूर्ण छात्रसंघ का विकल्प नहीं माना जा सकता। इनका दायरा मुख्य रूप से विभागीय और अकादमिक गतिविधियों तक रहता है, जबकि निर्वाचित छात्रसंघ पूरे विश्वविद्यालय के छात्रों से जुड़े मुद्दों को व्यापक स्तर पर उठाता है।
छात्रसंघ चुनाव के समर्थकों की क्या दलील है?
छात्रसंघ चुनाव के समर्थकों का कहना है कि विश्वविद्यालय केवल पढ़ाई की जगह नहीं है, बल्कि छात्रों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया समझने और उसमें भाग लेने का अवसर भी मिलना चाहिए। चुने हुए प्रतिनिधि फीस, हॉस्टल, छात्रवृत्ति, परीक्षा, कैंपस सुविधाओं और दूसरे छात्र मुद्दों को प्रशासन के सामने व्यवस्थित तरीके से रख सकते हैं।
उनका यह भी मानना है कि चुनाव से छात्रों में नेतृत्व क्षमता और जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है। खासकर विश्वविद्यालय स्तर पर चुनाव छात्रों को संवाद, बहस और प्रतिनिधित्व की प्रक्रिया से जोड़ सकते हैं।
चुनाव सीमित रखने के पक्ष में क्या तर्क दिए जाते हैं?
दूसरी ओर, छात्रसंघ चुनाव को सीमित रखने के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि बड़े स्तर की छात्र राजनीति से पढ़ाई का माहौल प्रभावित हो सकता है। चुनाव के दौरान गुटबाजी, प्रदर्शन और विवाद की स्थिति बनने की आशंका भी जताई जाती है।
जामिया में भी प्रशासन और छात्र संगठनों के बीच अनुशासन, प्रदर्शन और कैंपस गतिविधियों को लेकर समय-समय पर मतभेद सामने आए हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय के सामने चुनौती यह है कि छात्रों की भागीदारी और कैंपस अनुशासन, दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
क्या जामिया में छात्र राजनीति पूरी तरह खत्म है?
नहीं। छात्रसंघ चुनाव न होने का मतलब यह नहीं है कि जामिया में छात्र राजनीति या छात्र गतिविधियां खत्म हो गई हैं। अलग-अलग छात्र संगठन और छात्र समूह अपने मुद्दों को लेकर सक्रिय रहे हैं। फीस, हॉस्टल, परीक्षा, छात्र सुविधाओं, छात्रवृत्ति और अन्य अकादमिक विषयों को लेकर छात्र अपनी मांगें प्रशासन तक पहुंचाते रहे हैं।
अंतर सिर्फ इतना है कि इन गतिविधियों के लिए पूरे विश्वविद्यालय के स्तर पर नियमित रूप से चुना हुआ छात्रसंघ मौजूद नहीं है। विभागीय स्तर पर Subject Associations और Class Representatives जैसे माध्यम छात्रों को सीमित स्तर पर प्रतिनिधित्व देते हैं।
जामिया में चुनाव की बहस क्यों महत्वपूर्ण है?
जामिया का मामला यह दिखाता है कि छात्रसंघ चुनाव सिर्फ चुनाव कराने का सवाल नहीं है। इसके साथ छात्र अधिकार, प्रशासनिक व्यवस्था, अनुशासन और विश्वविद्यालय में लोकतांत्रिक भागीदारी जैसे कई मुद्दे जुड़े हैं।
विश्वविद्यालय के आधिकारिक दस्तावेज में छात्रसंघ के लिए कानूनी प्रावधान का उल्लेख है, लेकिन सक्रिय छात्रसंघ की स्थिति को लेकर मामला लंबे समय से विवाद में रहा है। इसलिए जामिया में छात्रसंघ चुनाव कब और किस व्यवस्था के तहत होंगे, यह विश्वविद्यालय के प्रशासनिक फैसलों के साथ-साथ संबंधित कानूनी स्थिति पर भी निर्भर करता है।




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