गुजरात के प्राथमिक शिक्षा तंत्र में शिक्षकों की कमी को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की UDISE+ 2025-26 रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के 2,335 स्कूलों में केवल एक-एक शिक्षक तैनात है। इन स्कूलों में करीब 80,053 बच्चे पढ़ रहे हैं। रिपोर्ट सामने आने के बाद गुजरात शिक्षा विभाग ने जिला प्राथमिक शिक्षा अधिकारियों (DPEOs) और प्रशासनिक अधिकारियों (AOs) को कारण बताओ नोटिस जारी किए। अब अधिकारियों ने जवाब दिया है कि शिक्षकों की नियुक्ति और तबादले से जुड़े फैसले लेने का अधिकार उनके पास नहीं है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब स्कूलों में शिक्षकों की कमी दूर करने की जिम्मेदारी तय की जा रही है, तो उसे पूरा करने के लिए जरूरी अधिकार किसके पास हैं।
शिक्षकों की कमी पर अधिकारियों को नोटिस
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, शिक्षा विभाग ने अगस्त 2026 में राज्य के जिला प्राथमिक शिक्षा अधिकारियों और प्रशासनिक अधिकारियों को नोटिस जारी किए थे। विभाग ने उन पर प्रशासनिक विफलता, लापरवाही और कर्तव्य का ठीक से पालन नहीं करने के आरोप लगाए।
नोटिस में शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 25(1) और गुजरात सिविल सेवा (अनुशासन एवं अपील) नियम, 1971 का हवाला दिया गया। विभाग का कहना था कि प्राथमिक स्कूलों में निर्धारित छात्र-शिक्षक अनुपात बनाए रखना जरूरी है। अधिकारियों को स्कूलों में शिक्षकों की व्यवस्था करने और इस संबंध में प्रमाणपत्र जमा करने के निर्देश भी दिए गए थे।
नोटिस में लापरवाही के लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई और वार्षिक वेतन वृद्धि रोकने जैसे कदम उठाने की चेतावनी दी गई थी।
अधिकारियों का जवाब: शिक्षकों के तबादले का अधिकार नहीं
कारण बताओ नोटिस के जवाब में जिला स्तर के अधिकारियों ने कहा कि उनके पास शिक्षकों का तबादला करने या उनकी जगह दूसरे शिक्षक तैनात करने का अधिकार नहीं है। एक अधिकारी ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि इस तरह के फैसले राज्य सरकार के स्तर पर लिए जाते हैं।
अधिकारियों का तर्क है कि जब उन्हें शिक्षकों की नियुक्ति या तबादले का अधिकार ही नहीं दिया गया है, तो वे अपने जिलों के स्कूलों में शिक्षकों की कमी कैसे दूर कर सकते हैं। इस जवाब के बाद मामला केवल स्कूलों में शिक्षकों की कमी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि प्रशासनिक अधिकारों और जवाबदेही को लेकर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
शिक्षा निदेशक ने क्या कहा?
गुजरात के प्राथमिक शिक्षा निदेशक प्रकाश त्रिवेदी ने पुष्टि की है कि संबंधित अधिकारियों ने नोटिस के जवाब और अपना स्पष्टीकरण जमा कर दिया है। उनके मुताबिक, फिलहाल किसी भी अधिकारी के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई है।
त्रिवेदी ने यह भी कहा कि जिन स्कूलों में शिक्षक नहीं होने की बात UDISE+ के आंकड़ों में दर्ज है, वहां कुछ जगह अस्थायी व्यवस्था की गई है। ऐसी व्यवस्था का विवरण आधिकारिक आंकड़ों में दर्ज नहीं है, क्योंकि इन शिक्षकों की नियुक्ति और वेतन का रिकॉर्ड नियमित नियुक्तियों की तरह नहीं है।
उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने जारी भर्ती प्रक्रिया के तहत एक-शिक्षक और शून्य-शिक्षक वाले स्कूलों में स्थायी शिक्षक नियुक्त करने का फैसला किया है। वहीं, जिन स्कूलों में एक भी छात्र नामांकित नहीं है, उन्हें बंद करने की प्रक्रिया भी शुरू की गई है।
UDISE+ रिपोर्ट में गुजरात की शिक्षा व्यवस्था की तस्वीर
केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की UDISE+ 2025-26 रिपोर्ट में राज्य के स्कूलों को लेकर कई अहम आंकड़े सामने आए हैं।
- 2,335 स्कूलों में केवल एक-एक शिक्षक तैनात है।
- 80,053 बच्चे इन एक-शिक्षक वाले स्कूलों में पढ़ रहे हैं।
- 58 स्कूलों में कोई छात्र नामांकित नहीं है, जबकि वहां कुल 74 शिक्षक तैनात बताए गए हैं।
- गुजरात में सरकारी और निजी स्कूलों की कुल संख्या 53,425 दर्ज की गई है।
- राज्य में प्रति स्कूल औसतन 7 शिक्षक और 217 छात्र हैं।
इन आंकड़ों से पता चलता है कि राज्य में स्कूलों के बीच शिक्षकों और छात्रों का वितरण एक समान नहीं है। जहां कुछ स्कूल एक ही शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं, वहीं कुछ ऐसे स्कूल भी हैं जहां नामांकन शून्य होने के बावजूद शिक्षक तैनात हैं।
बच्चों की पढ़ाई पर क्या असर पड़ सकता है?
एक शिक्षक पर कई कक्षाओं और अलग-अलग स्तर के विद्यार्थियों को पढ़ाने की जिम्मेदारी होने से नियमित पढ़ाई, व्यक्तिगत ध्यान और सीखने के स्तर को बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। खासकर प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों को पढ़ने, लिखने और गणित की बुनियादी समझ विकसित करने के लिए पर्याप्त शिक्षक और समय चाहिए।
हालांकि, केवल एक-शिक्षक वाले स्कूलों की संख्या से हर स्कूल में पढ़ाई की गुणवत्ता का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए स्कूलों में वास्तविक उपस्थिति, कक्षाओं की व्यवस्था, शिक्षकों के कार्यभार और बच्चों के सीखने के स्तर की जानकारी भी जरूरी है।
गुजरात का यह मामला इस बात की ओर ध्यान दिलाता है कि स्कूलों में शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ-साथ नियुक्ति और तबादले की प्रक्रिया भी प्रभावी होनी चाहिए। अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के साथ यह स्पष्ट होना जरूरी है कि शिक्षकों की कमी दूर करने के लिए किस स्तर पर फैसले लिए जा सकते हैं।
फिलहाल, विभाग अधिकारियों के जवाब मिलने की पुष्टि कर चुका है और किसी दंडात्मक कार्रवाई की जानकारी नहीं दी गई है। अब यह देखना अहम होगा कि भर्ती प्रक्रिया के जरिए इन स्कूलों में स्थायी शिक्षक कब तक पहुंचते हैं और शून्य नामांकन वाले स्कूलों को लेकर सरकार क्या अंतिम निर्णय लेती है।




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